कन्नौज से लखनऊ तक फैला मनी रूट, 24 आरोपियों की तलाश में पांच टीमें सक्रिय; फर्जी खातों और जीएसटी फर्मों का बड़ा जाल उजागर

“बैंकिंग सिस्टम में सेंध: ठगी के पैसों को ‘सफेद’ करने वाले 13 और कर्मचारी बेनकाब”

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By Roopa
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कानपुर। साइबर ठगी, हवाला और सट्टेबाजी से जुड़े एक बड़े नेटवर्क का खुलासा करते हुए जांच एजेंसियों को अब 13 और बैंक अधिकारियों व कर्मचारियों की संलिप्तता के संकेत मिले हैं। इन पर आरोप है कि इन्होंने ठगी की रकम को ठिकाने लगाने और संदिग्ध खातों के जरिए उसे अलग-अलग परतों में घुमाने में अहम भूमिका निभाई। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने जांच का दायरा बढ़ा दिया है और कई जिलों में एक साथ छापेमारी तेज कर दी गई है।

सूत्रों के अनुसार, जिन 13 बैंककर्मियों के नाम सामने आए हैं, उनमें छह शाखा प्रबंधक, उप प्रबंधक और अन्य विभागों के अधिकारी शामिल हैं। जांच में एक सरकारी बैंक की महिला अधिकारी की भूमिका भी संदिग्ध पाई गई है, जिन्हें जल्द नोटिस देकर पूछताछ के लिए बुलाया जा सकता है। अधिकारियों का मानना है कि यह नेटवर्क केवल एक शहर तक सीमित नहीं, बल्कि कई जिलों और राज्यों में फैला हुआ संगठित तंत्र है।

इससे पहले बर्रा क्षेत्र की पुलिस ने साइबर ठगी की रकम को विभिन्न खातों में ट्रांसफर करने के आरोप में बैंक अधिकारी और कर्मचारियों समेत आठ लोगों को गिरफ्तार कर न्यायालय के आदेश पर जेल भेजा था। इन आरोपियों की भूमिका संदिग्ध खातों को संचालित करने, पैसे निकालने और उसे आगे ट्रांसफर करने में बताई गई है।

कार्रवाई के दौरान पुलिस ने आरोपियों के पास से आठ बैंकों से जुड़े दस्तावेज, 24 फर्जी जीएसटी फर्मों के कागजात, 16 म्यूल खाते, 22 फर्जी सिम कार्ड और नौ मोबाइल फोन बरामद किए थे। यह बरामदगी इस बात की पुष्टि करती है कि ठगी का यह नेटवर्क बेहद संगठित और सुनियोजित तरीके से काम कर रहा था, जिसमें अलग-अलग स्तर पर लोग अपनी-अपनी जिम्मेदारी निभा रहे थे।

जांच की शुरुआत एक संदिग्ध बैंक खाते से हुई, जिसकी जानकारी भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) द्वारा जारी अलर्ट के जरिए मिली थी। यह खाता बर्रा क्षेत्र के एक युवक के नाम पर था, जिसमें देश के विभिन्न हिस्सों से हुई ठगी की 17 घटनाओं की रकम ट्रांसफर की गई थी। पुलिस ने उसे गवाह बनाकर आगे की जांच शुरू की, जिससे पूरे नेटवर्क की परतें धीरे-धीरे खुलती चली गईं।

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जांच में यह भी सामने आया कि पिछले वर्ष नवंबर में नवी मुंबई के एक 72 वर्षीय कारोबारी को “डिजिटल अरेस्ट” के नाम पर ₹58 लाख की ठगी का शिकार बनाया गया था। इस मामले में करीब ₹2.5 करोड़ की रकम इसी नेटवर्क के खातों के जरिए घुमाई गई थी। पूछताछ के दौरान यह भी खुलासा हुआ कि ऐसे लगभग 250 संदिग्ध बैंक खाते सक्रिय हैं, जो कानपुर और आसपास के जिलों के विभिन्न सरकारी और निजी बैंकों में खोले गए हैं।

सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि इन संदिग्ध खातों को फ्रीज करने के निर्देश दिए जाने के बावजूद कुछ खातों से सात दिनों तक लगातार पैसे निकाले जाते रहे। इससे बैंकिंग सिस्टम की निगरानी व्यवस्था और आंतरिक नियंत्रण पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि इन खातों से पैसे निकालने में किन-किन लोगों की भूमिका रही।

मामले में पांच विशेष टीमें गठित की गई हैं, जो अलग-अलग जिलों में आरोपियों की तलाश कर रही हैं। इनमें से दो टीमें कन्नौज, फर्रुखाबाद, लखनऊ और आगरा में सक्रिय हैं, जहां इस नेटवर्क से जुड़े कई संदिग्धों के छिपे होने की आशंका है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि जल्द ही और गिरफ्तारियां हो सकती हैं और नेटवर्क के अन्य हिस्सों का भी खुलासा होने की संभावना है।

जांच अधिकारियों के अनुसार, इस तरह के साइबर अपराध अब केवल तकनीकी ठगी तक सीमित नहीं रहे, बल्कि इसमें बैंकिंग सिस्टम के अंदरूनी लोगों की भूमिका भी सामने आ रही है। म्यूल खातों, फर्जी सिम और शेल कंपनियों के जरिए ठगी की रकम को तेजी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजा जाता है, जिससे जांच एजेंसियों के लिए ट्रैकिंग करना मुश्किल हो जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि साइबर अपराध अब एक संगठित आर्थिक अपराध का रूप ले चुका है, जिसमें वित्तीय संस्थानों की जवाबदेही और निगरानी तंत्र को और मजबूत करना बेहद जरूरी हो गया है। यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो ऐसे नेटवर्क भविष्य में और बड़े स्तर पर नुकसान पहुंचा सकते हैं।

फिलहाल, पुलिस और जांच एजेंसियां इस पूरे नेटवर्क को जड़ से खत्म करने के लिए लगातार कार्रवाई कर रही हैं। आने वाले दिनों में इस मामले में और बड़े खुलासे होने की उम्मीद है, जिससे साइबर ठगी के इस जटिल और बहुस्तरीय तंत्र की पूरी तस्वीर सामने आ सकती है।

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