इंदौर में लोकायुक्त पुलिस की बड़ी कार्रवाई में महिला एवं बाल विकास विभाग के एक संयुक्त निदेशक के ठिकानों पर छापेमारी के दौरान लगभग 11 करोड़ रुपये की बेनामी संपत्ति का खुलासा हुआ है। जांच एजेंसियों के अनुसार, यह संपत्ति उनकी घोषित आय से कई गुना अधिक पाई गई है, जिससे आय के स्रोतों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। पूछताछ के दौरान अधिकारी ने अपनी पत्नी द्वारा किए जाने वाले सिलाई-बुनाई के काम को भी परिवार की अतिरिक्त आय का स्रोत बताकर बचाव करने की कोशिश की।
लोकायुक्त की प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि अधिकारी की लगभग 30 वर्षों की सेवा अवधि में कुल वैध आय करीब 2.80 करोड़ रुपये रही है, जिसमें सरकारी वेतन और कृषि आय शामिल है। इसके बावजूद उनके और परिजनों के नाम पर 10.83 करोड़ रुपये से अधिक की चल और अचल संपत्तियां पाई गई हैं। जांच में यह भी सामने आया कि करीब 9.76 करोड़ रुपये जमीन, मकान निर्माण और अन्य संपत्तियों पर खर्च किए गए हैं।
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छापेमारी के दौरान टीम को कई महत्वपूर्ण दस्तावेज, महंगे घरेलू सामान, सोने-चांदी के आभूषण, बैंक लॉकर से जुड़ी सामग्री और अन्य परिसंपत्तियां मिली हैं। इसके अलावा एक डिपार्टमेंटल स्टोर और निजी जिम में लगे उपकरणों की भी जांच की जा रही है, जिनकी कीमत लाखों रुपये में आंकी गई है। अधिकारियों के अनुसार, सभी संपत्तियों के स्रोतों की फॉरेंसिक जांच की जा रही है और बैंक खातों की लेन-देन डिटेल खंगाली जा रही है।
इसी बीच हैदराबाद पुलिस ने एक अंतरराज्यीय स्तर पर फैले मनी सर्कुलेशन और धोखाधड़ी नेटवर्क का भंडाफोड़ किया है, जो डायरेक्ट सेलिंग और मल्टी लेवल मार्केटिंग (MLM) की आड़ में अवैध निवेश स्कीम चला रहा था। इस मामले में पुलिस ने छह लोगों को गिरफ्तार किया है, जिनके देश के विभिन्न राज्यों से संबंध सामने आए हैं।
जांच में पता चला है कि यह नेटवर्क एक विदेशी कंपनी के नाम पर सक्रिय था और निवेशकों को ऊंचे और निश्चित रिटर्न का लालच देकर बड़ी रकम एकत्र कर रहा था। प्रारंभिक जांच में यह भी सामने आया है कि यह पूरा मॉडल पहले से विवादित और प्रतिबंधित एमएलएम कंपनियों के पुराने नेटवर्क से जुड़ा हुआ है, जो समय-समय पर नाम बदलकर दोबारा सक्रिय हो जाते हैं।
पुलिस के अनुसार, आरोपी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और डिजिटल विज्ञापनों के जरिए बड़े पैमाने पर प्रचार कर रहे थे। निवेशकों को जल्दी अमीर बनने का सपना दिखाकर उन्हें इस स्कीम में जोड़ा जाता था। बाद में लोगों से अलग-अलग शुल्क, रजिस्ट्रेशन और निवेश के नाम पर पैसे वसूले जाते थे, जिससे हजारों लोगों को आर्थिक नुकसान हुआ है।
जांच में यह भी सामने आया कि आरोपी ठगी की रकम को कई बैंक खातों में ट्रांसफर कर उसे ट्रेस होने से बचाने की कोशिश करते थे। फिलहाल पुलिस ने कई बैंक खातों को फ्रीज कर दिया है और डिजिटल लेनदेन की जांच जारी है।
लोकायुक्त टीम ने संकेत दिए हैं कि यदि जांच में आय से अधिक संपत्ति की पुष्टि होती है, तो संबंधित अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी। वहीं हैदराबाद पुलिस इस पूरे नेटवर्क के मास्टरमाइंड और अन्य सहयोगियों की पहचान में जुटी हुई है।
साइबर और आर्थिक अपराध विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे एमएलएम मॉडल तेजी से फैलकर आम लोगों को आकर्षित करते हैं, लेकिन वास्तव में ये पोंजी स्कीम की तरह काम करते हैं, जिनमें शुरुआती निवेशकों को भुगतान नए निवेशकों के पैसे से किया जाता है।
अधिकारियों ने नागरिकों से अपील की है कि वे किसी भी निवेश योजना में शामिल होने से पहले उसकी वैधता, पंजीकरण और सरकारी मान्यता की पूरी तरह जांच करें। बिना सत्यापन के किसी भी ऑनलाइन या ऑफलाइन स्कीम में पैसा लगाना गंभीर आर्थिक जोखिम पैदा कर सकता है।
दोनों मामलों ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि जहां एक ओर सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार और अवैध संपत्ति का खतरा बना हुआ है, वहीं दूसरी ओर डिजिटल युग में संगठित वित्तीय धोखाधड़ी के नए-नए तरीके तेजी से फैल रहे हैं, जिससे आम जनता की आर्थिक सुरक्षा पर गंभीर चुनौती खड़ी हो रही है।
