हैदराबाद। रियल एस्टेट सेक्टर से जुड़े एक बड़े कथित धोखाधड़ी मामले में जांच ने अहम मोड़ ले लिया है। एक हाउसिंग प्रोजेक्ट के नाम पर निवेशकों से करोड़ों रुपये जुटाने और फिर फंड के दुरुपयोग के आरोपों के बीच करीब ₹17.97 करोड़ की संपत्तियों को अस्थायी रूप से अटैच किया गया है। मामला ऐसे समय सामने आया है जब प्रोजेक्ट में निवेश करने वाले सैकड़ों लोगों को अपने पैसे और घर दोनों के भविष्य को लेकर अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है।
जांच के दायरे में आए इस मामले में बिल्डर फर्म से जुड़े आरोपियों—मुल्पुरी शिवराम कृष्णा, दुपति नागा राजू और डोड्डाकुला नरसिम्हा राव उर्फ पोननारी—पर गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगाए गए हैं। आरोप है कि इन्होंने मिलकर ‘प्री-लॉन्च’ स्कीम के तहत ‘भारती लेक व्यू टावर्स’ नामक प्रोजेक्ट का प्रचार किया और बड़ी संख्या में निवेशकों को आकर्षित किया।
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प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि इस प्रोजेक्ट के लिए आवश्यक वैधानिक अनुमतियां हासिल नहीं की गई थीं, बावजूद इसके निवेशकों के साथ फ्लैट बिक्री के समझौते किए गए। इतना ही नहीं, जिस जमीन पर प्रोजेक्ट प्रस्तावित था, वह पहले से ही कर्ज के लिए गिरवी रखी जा चुकी थी। इस महत्वपूर्ण तथ्य को निवेशकों से छिपाया गया, जिससे पूरे प्रोजेक्ट की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो गए हैं।
जांच एजेंसियों के अनुसार, इस योजना के तहत 450 से अधिक होमबायर्स और निवेशकों से करीब ₹75 करोड़ की राशि जुटाई गई। इसमें लगभग ₹17 करोड़ नकद लेनदेन भी शामिल बताया जा रहा है। आरोप है कि इस धनराशि का उपयोग प्रोजेक्ट निर्माण के बजाय अन्य उद्देश्यों के लिए किया गया, जिनमें पुराने कर्जों का भुगतान, ब्याज चुकाना और व्यक्तिगत संपत्तियों की खरीद शामिल है।
मामले की एक और गंभीर परत तब सामने आई जब यह पता चला कि प्रोजेक्ट से जुड़ी कुछ जमीनें तीसरे पक्ष को बेच दी गई थीं। यह जानकारी भी निवेशकों से छिपाई गई, जबकि उनसे लगातार अग्रिम राशि ली जाती रही। इससे यह संकेत मिलता है कि निवेशकों को लंबे समय तक गुमराह कर धन जुटाने की प्रक्रिया जारी रखी गई।
इस पूरे प्रकरण की शुरुआत एक आपराधिक मामला दर्ज होने के बाद हुई, जिसमें आरोपियों पर धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात और संबंधित कानूनों के तहत आरोप लगाए गए। चूंकि मामला वित्तीय अनियमितताओं और कथित मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ा पाया गया, इसलिए आगे की जांच के तहत संपत्तियों की कुर्की की कार्रवाई की गई।
जांच के दौरान यह भी सामने आया कि निवेशकों से जुटाई गई राशि को विभिन्न खातों और माध्यमों के जरिए इधर-उधर किया गया, जिससे वास्तविक फंड फ्लो को ट्रैक करना चुनौतीपूर्ण हो गया। इसके बावजूद एजेंसियों ने प्रारंभिक स्तर पर उन संपत्तियों की पहचान की है, जिनका संबंध कथित रूप से इस घोटाले से है।
रियल एस्टेट सेक्टर के जानकारों का कहना है कि इस तरह के मामलों में निवेशकों को प्रोजेक्ट की वैधता, भूमि की स्थिति और अनुमतियों की जांच स्वयं भी करनी चाहिए। साथ ही, नियामक स्तर पर भी ऐसे प्रोजेक्ट्स की निगरानी मजबूत करने की जरूरत है, ताकि इस प्रकार की धोखाधड़ी को समय रहते रोका जा सके।
फिलहाल, मामले में आगे की जांच जारी है और आने वाले समय में और खुलासों की संभावना से इनकार नहीं किया जा रहा है। यदि आरोप साबित होते हैं, तो इसमें शामिल लोगों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
यह मामला एक बार फिर इस बात को रेखांकित करता है कि रियल एस्टेट निवेश में पारदर्शिता और जवाबदेही कितनी जरूरी है। अन्यथा, घर के सपने दिखाकर बड़े पैमाने पर आर्थिक नुकसान पहुंचाने वाली ऐसी घटनाएं निवेशकों के भरोसे को गहरा आघात पहुंचाती रहेंगी।
