अदालत ने कहा, आधुनिक साइबर अपराधों की समझ बढ़ाए बिना जांच एजेंसियों से अर्थव्यवस्था और नागरिकों की सुरक्षा पर खतरा

साइबर अपराध जांच में पुलिस की अयोग्यता या ज्ञान की कमी पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

Team The420
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हरियाणा की उच्च न्यायालय ने साइबर ठगी और ऑनलाइन धोखाधड़ी से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर चिंता जताई। अदालत ने कहा कि इस तरह के मामलों में पुलिस अधिकारी या तो अक्षम हैं या उन्हें आधुनिक साइबर अपराधों के तरीकों की पर्याप्त जानकारी नहीं है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इस दिशा में प्रभावी कानून और तकनीकी उपायों के बिना केवल अदालतें इस समस्या का समाधान नहीं कर सकतीं।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि साइबर अपराधों की जटिल प्रकृति और लगातार बदलती तकनीकी रणनीतियों के कारण जांच एजेंसियों को अपने कर्मियों की क्षमता और प्रशिक्षण पर विशेष ध्यान देना होगा। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि जांच एजेंसियां आधुनिक साइबर अपराधों के स्वरूप और डिजिटल लेनदेन के तरीके नहीं समझतीं, तो इससे न केवल आम नागरिकों को नुकसान होगा बल्कि देश की अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है।

मामले की पृष्ठभूमि नारनौल के साइबर थाना क्षेत्र में दर्ज एक ठगी मामले से जुड़ी है। आरोपी मोहित ने एडवोकेट आदित्य सांघी के माध्यम से नियमित जमानत याचिका दाखिल की थी। सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से अदालत को बताया गया कि आरोपी के कब्जे से 33 एटीएम कार्ड, 28 बैंक पासबुक और 12 चेक बुक बरामद हुई थीं। इसके अलावा, लगभग 1.14 करोड़ रुपये की राशि विभिन्न खातों में जमा पाई गई थी।

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हालांकि, अदालत ने पाया कि जांच एजेंसी यह स्पष्ट नहीं कर सकी कि उक्त राशि वर्तमान में कहां है या उसका आगे क्या हुआ। राज्य की ओर से कहा गया कि रकम संभवतया क्रिप्टोकरेंसी (यूएसडीटी) के माध्यम से किसी अन्य खाते में भेजी गई होगी, लेकिन अदालत ने इसे संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं माना। अदालत ने इस संबंध में कहा कि इस तरह के डिजिटल लेनदेन का सही तरीके से पता लगाने के लिए एजेंसियों को तकनीकी उपकरणों और विशेषज्ञ ज्ञान की आवश्यकता है।

अदालत ने आगे कहा कि यदि जांच अधिकारी आधुनिक साइबर अपराधों की तकनीकी पेचीदगियों को समझने में विफल रहते हैं, तो यह न केवल जमानत और गिरफ्तारी की प्रक्रिया को प्रभावित करता है, बल्कि व्यापक आर्थिक और सामाजिक नुकसान भी कर सकता है। न्यायालय ने यह सुझाव दिया कि राज्य और केंद्रीय स्तर पर साइबर अपराध प्रशिक्षण और डिजिटल फॉरेंसिक तकनीक में निवेश बढ़ाया जाए।

मामले के तथ्यों का विश्लेषण करते हुए अदालत ने आरोपी को पहले दी गई अंतरिम जमानत को स्थायी कर दिया और उसे नियमित जमानत पर रिहा करने के आदेश दिए। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि जांच एजेंसियों की अयोग्यता और तकनीकी ज्ञान की कमी के कारण ही मामले में पर्याप्त सबूतों का अभाव था।

साइबर अपराध विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में डिजिटल अपराध लगातार बढ़ रहे हैं और इनके पीछे अक्सर अंतरराज्यीय या अंतरराष्ट्रीय गिरोह काम कर रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, साइबर ठगी, फर्जी निवेश, बैंकिंग धोखाधड़ी और क्रिप्टोकरेंसी आधारित अपराधों की जटिलता के कारण पुलिस और अन्य जांच एजेंसियों को डिजिटल तकनीक और साइबर फॉरेंसिक में नियमित प्रशिक्षण की आवश्यकता है।

उच्च न्यायालय की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब देश में डिजिटल लेनदेन और ऑनलाइन वित्तीय गतिविधियों में तेजी से वृद्धि हो रही है। अदालत ने जोर दिया कि केवल कानूनी ढांचे पर निर्भर रहने के बजाय एजेंसियों को तकनीकी दक्षता और साइबर अपराधों के आधुनिक तरीकों की जानकारी में सुधार करना होगा।

निष्कर्ष: हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि साइबर अपराधों की जांच में अयोग्यता और तकनीकी जानकारी की कमी गंभीर खतरा है। अदालत ने सरकार और संबंधित एजेंसियों को निर्देश दिए कि वे इस दिशा में आवश्यक प्रशिक्षण, तकनीकी उपकरण और विशेषज्ञता बढ़ाएं ताकि नागरिकों और अर्थव्यवस्था की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

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