चंडीगढ़। हरियाणा वन विभाग में पदोन्नति प्रक्रिया को लेकर सामने आए कथित घोटाले ने विभागीय प्रशासन और भर्ती-पदोन्नति व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि विभाग के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने नियमों और निर्धारित प्रक्रियाओं को दरकिनार करते हुए अपने चहेते कर्मचारियों को लाभ पहुंचाया तथा अनिवार्य प्रशिक्षण पूरा किए बिना ही उन्हें उच्च पदों पर पदोन्नत कर दिया। मामले की शिकायत वन मंत्री कार्यालय तक पहुंचने के बाद सरकार ने इसकी जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन कर दिया है। इस घटनाक्रम के बाद पूरे विभाग में हलचल मच गई है और कई पुराने पदोन्नति आदेशों की भी समीक्षा की संभावना जताई जा रही है।
मामले का खुलासा एक सेवानिवृत्त भारतीय वन सेवा (आईएफएस) अधिकारी जी. रमन द्वारा की गई शिकायत के बाद हुआ। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि विभाग के कुछ अधिकारियों ने कथित मिलीभगत के जरिए कई डिप्टी रेंज अधिकारियों को पहले रेंज ऑफिसर और बाद में हरियाणा वन सेवा (एचएफएस) में पदोन्नत कर दिया, जबकि उन्होंने पदोन्नति के लिए आवश्यक प्रशिक्षण पूरा नहीं किया था। शिकायतकर्ता का दावा है कि यह पूरी प्रक्रिया विभागीय नियमों और सेवा शर्तों के विपरीत थी।
शिकायत के अनुसार पवन कुमार और अनिल कुमार को ऐसे समय में पदोन्नति का लाभ दिया गया, जब प्रशिक्षण शाखा के रिकॉर्ड में उनके अनिवार्य प्रशिक्षण का कोई उल्लेख नहीं था। आरोप है कि प्रशिक्षण पूरा किए बिना ही उन्हें पात्र मान लिया गया और पदोन्नति आदेश जारी कर दिए गए। शिकायतकर्ता का कहना है कि यदि प्रशिक्षण संबंधी रिकॉर्ड का सही ढंग से परीक्षण किया जाता तो ऐसे आदेश जारी नहीं किए जा सकते थे।
मामला केवल दो अधिकारियों तक सीमित नहीं बताया गया है। शिकायत में तरुण गागत, देवेंद्र राणा और संजीव कुमार सहित कई अन्य कर्मचारियों के नाम भी शामिल किए गए हैं। आरोप है कि इन अधिकारियों को भी निर्धारित पात्रता मानकों को पूरा किए बिना पदोन्नति का लाभ मिला। शिकायतकर्ता का कहना है कि यह कोई अलग-थलग घटना नहीं, बल्कि एक सुनियोजित प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है, जिसकी गहन जांच आवश्यक है।
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इस विवाद ने विभाग के शीर्ष स्तर पर बैठे अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। शिकायत में तत्कालीन प्रधान मुख्य वन संरक्षक विनीत कुमार गर्ग, एपीसीसीएफ घनश्याम शुक्ला और आईएफएस अधिकारी नवदीप सिंह की भूमिका को भी जांच के योग्य बताया गया है। आरोप है कि वरिष्ठ स्तर पर तथ्यों को छिपाने, पदोन्नति प्रक्रिया को प्रभावित करने और रिकॉर्ड में कथित हेरफेर के जरिए वास्तविक स्थिति को छिपाया गया। हालांकि इन आरोपों की अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
शिकायत में यह भी दावा किया गया है कि मामले में नामित कुछ अधिकारी जांच प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं। शिकायतकर्ता के अनुसार जांच समिति के सदस्यों पर कथित तौर पर दबाव बनाने और रिपोर्ट की दिशा बदलने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि इन आरोपों को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक टिप्पणी सामने नहीं आई है और जांच पूरी होने के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
मामले की गंभीरता को देखते हुए वन मंत्री कार्यालय की ओर से तत्काल कार्रवाई की गई है। आधिकारिक आदेश के तहत तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की गई है, जिसमें आईएफएस अधिकारी अतुल सिरसिकर, आर. आनंद और सुंदर लाल को शामिल किया गया है। समिति को पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर 15 दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट मुख्यालय को सौंपने का निर्देश दिया गया है।
सूत्रों के अनुसार जांच समिति पदोन्नति से संबंधित फाइलों, प्रशिक्षण रिकॉर्ड, सेवा पुस्तिकाओं और विभागीय आदेशों की विस्तृत समीक्षा करेगी। साथ ही शिकायत में नामित अधिकारियों और संबंधित कर्मचारियों के बयान भी दर्ज किए जा सकते हैं। जांच का दायरा केवल पदोन्नति आदेशों तक सीमित न रहकर निर्णय प्रक्रिया और प्रशासनिक जवाबदेही तक भी बढ़ सकता है।
शिकायतकर्ता ने सरकार से मांग की है कि यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो कथित रूप से नियमों के विरुद्ध पदोन्नत किए गए अधिकारियों को तत्काल उनके मूल पदों पर वापस भेजा जाए और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ विभागीय तथा कानूनी कार्रवाई की जाए। फिलहाल पूरे मामले पर विभाग, सरकार और कर्मचारियों की नजर बनी हुई है। अब सभी की निगाहें जांच समिति की रिपोर्ट पर टिकी हैं, जिससे यह स्पष्ट होगा कि पदोन्नति प्रक्रिया में वास्तव में अनियमितताएं हुई थीं या नहीं, और यदि हुईं तो उसके लिए जिम्मेदार कौन था।
