चंडीगढ़/पंचकूला: हरियाणा में सामने आए बहुचर्चित ₹590 करोड़ के बैंक घोटाले ने अब बड़ा मोड़ ले लिया है। राज्य सरकार ने इस मामले की जांच केंद्रीय जांच एजेंसी को सौंपने की सिफारिश की है। यह फैसला तब लिया गया जब शुरुआती जांच में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताओं और संगठित धोखाधड़ी के संकेत मिले। इसी बीच राज्य में एक और करीब ₹150 करोड़ के बैंक फ्रॉड का मामला सामने आने से प्रशासनिक और वित्तीय तंत्र में हलचल मच गई है।
सूत्रों के अनुसार, ₹590 करोड़ का यह घोटाला सरकारी फंड्स के दुरुपयोग से जुड़ा है, जिसमें फर्जी कंपनियों और बैंक खातों के जरिए रकम को इधर-उधर किया गया। यह मामला फरवरी में दर्ज प्राथमिकी के बाद से जांच के दायरे में था, लेकिन अब इसके कई पहलुओं—खासकर आर्थिक अपराध और बैंकिंग सिस्टम की भूमिका—को देखते हुए इसे CBI को सौंपने का निर्णय लिया गया है।
जांच में यह सामने आया है कि मुख्य आरोपियों ने कई फर्जी फर्म और कंपनियां बनाई थीं, जिनके जरिए सरकारी योजनाओं के तहत जमा धन को अलग-अलग खातों में ट्रांसफर किया गया। अब तक इस मामले में 15 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है, जिनमें बैंक कर्मचारी और सरकारी विभाग से जुड़े लोग शामिल हैं। सभी आरोपियों को न्यायिक हिरासत में भेजा जा चुका है।
प्रवर्तन कार्रवाई के दौरान जांच एजेंसियों ने आरोपियों से जुड़ी छह लग्जरी गाड़ियां भी जब्त की हैं, जिनमें तीन टोयोटा फॉर्च्यूनर, दो इनोवा और एक मर्सिडीज शामिल हैं। माना जा रहा है कि ये वाहन अवैध कमाई से खरीदे गए थे। इसके अलावा 100 से अधिक बैंक खातों को फ्रीज करने की प्रक्रिया भी शुरू की गई है, जिनका संबंध संदिग्ध लेन-देन से बताया जा रहा है।
इस पूरे मामले की शुरुआत तब हुई जब एक सरकारी विभाग ने बैंक में जमा ₹50 करोड़ की राशि निकालने की कोशिश की, लेकिन खाते में पर्याप्त धनराशि नहीं पाई गई। इसके बाद विभागीय जांच शुरू हुई, जिसने बड़े स्तर पर गड़बड़ी का खुलासा किया। जांच के दौरान सामने आया कि सरकारी योजनाओं के तहत जमा राशि को व्यवस्थित तरीके से दूसरे खातों में ट्रांसफर किया गया था।
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इसी दौरान एक और मामला सामने आया, जिसमें पंचकूला नगर निगम के फिक्स्ड डिपॉजिट में करीब ₹150 करोड़ की गड़बड़ी पाई गई। इस केस में एक निजी बैंक के डिप्टी वाइस प्रेसिडेंट पुष्पेंद्र सिंह का नाम सामने आया है। इस मामले में अब तक दो लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है, जिनमें एक रिलेशनशिप मैनेजर भी शामिल है।
बैंक की ओर से सफाई देते हुए कहा गया है कि नगर निगम के खातों और फिक्स्ड डिपॉजिट से जुड़े मामलों में कुछ विसंगतियां सामने आई हैं, जिनकी जांच जारी है। साथ ही बैंक ने एहतियात के तौर पर ₹127 करोड़ की राशि नगर निगम को वापस भी कर दी है, ताकि वित्तीय संतुलन बनाए रखा जा सके।
जांच एजेंसियों का कहना है कि यह मामला बेहद जटिल है और इसमें कई स्तरों पर साजिश रची गई है। फर्जी दस्तावेज, बैंकिंग सिस्टम की कमजोरियों और आंतरिक मिलीभगत के जरिए इस पूरे घोटाले को अंजाम दिया गया। ऐसे में मामले की गहराई से जांच के लिए केंद्रीय एजेंसी की जरूरत महसूस की गई।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के बैंकिंग फ्रॉड न केवल सरकारी संसाधनों को नुकसान पहुंचाते हैं, बल्कि आम जनता के विश्वास को भी कमजोर करते हैं। ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई और पारदर्शी जांच बेहद जरूरी है, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं पर रोक लगाई जा सके।
अब CBI जांच की सिफारिश के बाद उम्मीद की जा रही है कि इस मामले में और बड़े खुलासे हो सकते हैं। साथ ही यह भी देखा जा रहा है कि क्या इस घोटाले की जड़ें अन्य राज्यों या वित्तीय संस्थानों तक भी फैली हुई हैं।
