ज्वेलरी चोरी केस में आरोपी की अग्रिम जमानत रद्द; कोर्ट ने कहा—मिसरिप्रेजेंटेशन न्याय प्रक्रिया के साथ धोखा

‘धोखे से मिली जमानत रद्द’: गुवाहाटी हाईकोर्ट का सख्त संदेश—गलत जानकारी देकर राहत नहीं मिलेगी

Roopa
By Roopa
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गुवाहाटी। जमानत को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसले में गुवाहाटी हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई आरोपी धोखे या गलत जानकारी देकर जमानत हासिल करता है, तो उसे किसी भी समय रद्द किया जा सकता है। अदालत ने यह टिप्पणी एक ज्वेलरी चोरी से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की, जहां आरोपी पर तथ्यों को छिपाकर अग्रिम जमानत लेने का आरोप था।

मामले के अनुसार, एक निजी कंपनी के डायरेक्टर ने शिकायत दर्ज कराई थी कि उनके ज्वेलरी शोरूम में कार्यरत स्टोर मैनेजर ने करीब ₹1.34 करोड़ के आभूषणों की चोरी की और इसके बाद फरार हो गया। आरोप है कि घटना के बाद आरोपी ने यह दावा करते हुए अग्रिम जमानत हासिल कर ली कि उसने घटना से पहले ही अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया था।

हालांकि, बाद में जब मामला हाईकोर्ट पहुंचा, तो याचिकाकर्ता की ओर से यह दलील दी गई कि आरोपी का इस्तीफा फर्जी था और उसे गलत ईमेल आईडी पर भेजा गया था। इसके साथ ही कई दस्तावेज और रिकॉर्ड पेश किए गए, जिनसे यह संकेत मिला कि आरोपी घटना के समय भी शोरूम से जुड़ा हुआ था और उसकी गतिविधियां जारी थीं।

अदालत ने केस डायरी और उपलब्ध साक्ष्यों का अवलोकन करने के बाद पाया कि आरोपी के इस्तीफे का दावा प्रथम दृष्टया गलत प्रतीत होता है। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि चोरी हुए आभूषण अभी तक बरामद नहीं हुए हैं और आरोपी ने जांच में अपेक्षित सहयोग भी नहीं किया है। ऐसे में अदालत ने माना कि मामले में कस्टोडियल इंटरोगेशन (हिरासत में पूछताछ) आवश्यक है।

सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि आरोपी ने कथित तौर पर चोरी किए गए आभूषणों के आधार पर गोल्ड लोन लिया और उस राशि को शेयर बाजार में निवेश कर दिया, जहां उसे नुकसान हुआ। इस पहलू को भी अदालत ने गंभीरता से लिया और इसे आरोपी के खिलाफ परिस्थितिजन्य साक्ष्य के रूप में देखा।

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कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जमानत केवल एक कानूनी राहत नहीं, बल्कि न्यायिक विश्वास का प्रतीक होती है। यदि कोई व्यक्ति इस प्रक्रिया का दुरुपयोग करते हुए गलत जानकारी देता है, तो यह न केवल न्यायालय को गुमराह करने के बराबर है, बल्कि कानून के मूल सिद्धांतों का भी उल्लंघन है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि इस तरह के मामलों में जमानत रद्द करना पूरी तरह न्यायोचित है। कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपी द्वारा प्रस्तुत इस्तीफे की कहानी एक ‘बनावटी बचाव’ (fabricated defence) प्रतीत होती है, जिसका उद्देश्य केवल आपराधिक जिम्मेदारी से बचना था।

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा दी गई अग्रिम जमानत को रद्द करते हुए कहा कि आरोपी ने तथ्यों को गलत तरीके से पेश कर राहत प्राप्त की, जो कानूनन स्वीकार्य नहीं है। कोर्ट ने यह भी दोहराया कि जमानत रद्द करने का अधिकार न केवल ट्रायल कोर्ट के पास होता है, बल्कि हाईकोर्ट भी अपने अंतर्निहित अधिकारों के तहत इस पर निर्णय ले सकता है।

यह फैसला उन मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है, जहां आरोपी जमानत पाने के लिए तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करते हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता को बनाए रखने की दिशा में एक सख्त संदेश देता है।

फिलहाल, मामले में आगे की कार्रवाई जारी है और आरोपी के खिलाफ जांच को तेज करने के संकेत दिए गए हैं। इस फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि अदालतें अब जमानत के मामलों में प्रस्तुत तथ्यों की गहनता से जांच कर रही हैं और किसी भी प्रकार के धोखे को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

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