युवाओं पर सोशल मीडिया के प्रभाव को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई में Google और Meta Platforms को बड़ा झटका लगा है। कैलिफोर्निया की एक अदालत ने उन दोनों कंपनियों की नई सुनवाई (न्यू ट्रायल) की मांग खारिज कर दी है, जिन्हें एक जूरी पहले ही युवाओं के लिए हानिकारक साबित हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म डिजाइन करने का दोषी ठहरा चुकी है। अदालत के इस फैसले के साथ 60 लाख डॉलर (करीब ₹51 करोड़) के हर्जाने का आदेश फिलहाल बरकरार रहेगा।
यह मामला अमेरिका में सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी और किशोरों पर डिजिटल प्लेटफॉर्म के प्रभाव को लेकर चल रही व्यापक बहस के केंद्र में माना जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में बच्चों और किशोरों में बढ़ती सोशल मीडिया निर्भरता, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं और ऑनलाइन व्यवहार पर इसके प्रभाव को लेकर कई मुकदमे दायर किए गए हैं।
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अदालती दस्तावेजों और मामले से परिचित सूत्रों के अनुसार, लॉस एंजिलिस सुपीरियर कोर्ट की न्यायाधीश कैरोलीन कूल ने Meta और Google के स्वामित्व वाले YouTube द्वारा दायर उन याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिनमें जूरी के फैसले को रद्द कर नई सुनवाई कराने की मांग की गई थी। न्यायाधीश ने मंगलवार को यह आदेश पारित किया। हालांकि आदेश के विस्तृत कारणों वाला लिखित निर्णय तत्काल सार्वजनिक नहीं किया गया।
इस वर्ष मार्च में आए जूरी के फैसले में निष्कर्ष निकाला गया था कि संबंधित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों का डिजाइन लापरवाहीपूर्ण था और उससे युवा उपयोगकर्ताओं को नुकसान पहुंचा। जूरी ने प्रभावित पक्षों के पक्ष में 60 लाख डॉलर का हर्जाना भी निर्धारित किया था।
मुकदमे में आरोप लगाया गया था कि प्लेटफॉर्मों की कई प्रमुख विशेषताएं इस तरह विकसित की गई थीं कि वे बच्चों और किशोरों को अधिक समय तक ऑनलाइन बनाए रखें। शिकायतकर्ताओं का कहना था कि कंपनियों ने उपयोगकर्ताओं की सहभागिता बढ़ाने के उद्देश्य से ऐसे तंत्र तैयार किए जो बार-बार प्लेटफॉर्म का उपयोग करने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करते हैं और समय के साथ निर्भरता जैसी स्थिति पैदा कर सकते हैं।
सुनवाई के दौरान प्रभावित परिवारों की ओर से दलील दी गई कि एल्गोरिदम आधारित सिफारिश प्रणाली, लगातार आने वाली नोटिफिकेशन, ऑटोमेटेड कंटेंट सुझाव और अन्य एंगेजमेंट-केंद्रित फीचर युवाओं को लंबे समय तक स्क्रीन से जोड़े रखने के लिए बनाए गए थे। उनके अनुसार, ये सुविधाएं केवल तकनीकी विकल्प नहीं थीं बल्कि उपयोगकर्ताओं का ध्यान अधिक समय तक बनाए रखने की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा थीं।
जूरी ने इन दलीलों से सहमति जताते हुए माना कि कंपनियों ने अपने उत्पादों के डिजाइन और संचालन में पर्याप्त सावधानी नहीं बरती। यह फैसला सोशल मीडिया की लत और युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर उसके प्रभाव से जुड़े मुकदमों में परिवारों की सबसे महत्वपूर्ण कानूनी जीतों में से एक माना गया।
फैसले के बाद Meta और Google ने नई सुनवाई की मांग करते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। ऐसे पोस्ट-ट्रायल आवेदन आम तौर पर इस आधार पर दायर किए जाते हैं कि मुकदमे की प्रक्रिया, प्रस्तुत साक्ष्यों, जूरी को दिए गए निर्देशों या कानूनी निष्कर्षों में कोई गंभीर त्रुटि हुई है।
हालांकि न्यायाधीश कूल द्वारा इन याचिकाओं को खारिज किए जाने का अर्थ है कि जूरी का मूल फैसला फिलहाल प्रभावी रहेगा। अब कंपनियों के पास अपील जैसे अन्य कानूनी विकल्प उपलब्ध हैं, लेकिन जब तक किसी उच्च अदालत से राहत नहीं मिलती, तब तक जूरी के निष्कर्ष और हर्जाने का आदेश कायम रहेगा।
यह फैसला ऐसे समय आया है जब अमेरिका में नीति-निर्माता, शिक्षा विशेषज्ञ, चिकित्सक और अभिभावक सोशल मीडिया के युवाओं पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर लगातार चिंता जता रहे हैं। अत्यधिक स्क्रीन समय, ऑनलाइन निर्भरता, साइबर बुलिंग, नींद में बाधा, चिंता और अवसाद जैसी समस्याओं को लेकर बहस तेज हुई है।
तकनीकी कंपनियां लंबे समय से यह कहती रही हैं कि वे सुरक्षा सुविधाओं, पैरेंटल कंट्रोल, कंटेंट मॉडरेशन और उपयोगकर्ता कल्याण से जुड़े उपायों पर भारी निवेश कर रही हैं। उनका तर्क है कि सोशल मीडिया संवाद, शिक्षा, रचनात्मकता और समुदाय निर्माण के महत्वपूर्ण अवसर भी उपलब्ध कराता है।
फिर भी, युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य और कथित सोशल मीडिया लत से जुड़े मुकदमों की संख्या लगातार बढ़ रही है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य के उन मामलों पर असर डाल सकता है जिनमें यह प्रश्न उठाया जा रहा है कि क्या तकनीकी कंपनियों को ऐसे उत्पाद डिजाइनों के लिए कानूनी रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है जो युवाओं में बाध्यकारी या अत्यधिक उपयोग की प्रवृत्ति को बढ़ावा देते हैं।
