डेटा ब्रोकर्स से नागरिकों की लोकेशन और ऑनलाइन गतिविधियों की खरीद; प्राइवेसी और संवैधानिक अधिकारों पर गहराया विवाद

‘AI के बिना भी निगरानी’: खरीदे गए डेटा से बड़े पैमाने पर सर्विलांस चला रही FBI

Roopa
By Roopa
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वॉशिंगटन। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और निगरानी को लेकर दुनिया भर में चल रही बहस के बीच एक चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है। अमेरिका की प्रमुख जांच एजेंसी Federal Bureau of Investigation (FBI) बिना AI के भी बड़े पैमाने पर निगरानी करने में सक्षम है। हालिया संसदीय सुनवाई में यह पुष्टि हुई कि एजेंसी नागरिकों का लोकेशन डेटा और अन्य डिजिटल जानकारी निजी डेटा ब्रोकर्स से खरीद रही है, जिससे प्राइवेसी और संवैधानिक अधिकारों को लेकर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं।

डेटा खरीदकर कैसे चल रहा सर्विलांस सिस्टम

अमेरिकी कानून के तहत आमतौर पर किसी व्यक्ति की लोकेशन या फोन रिकॉर्ड तक पहुंचने के लिए कानून प्रवर्तन एजेंसियों को अदालत से वारंट लेना होता है। लेकिन डेटा ब्रोकर्स से जानकारी खरीदकर एजेंसियां इस प्रक्रिया को दरकिनार कर सकती हैं।

ये डेटा ब्रोकर्स मोबाइल ऐप्स, वेबसाइट्स और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के जरिए बड़ी मात्रा में यूजर डेटा इकट्ठा करते हैं। इसमें लोकेशन हिस्ट्री, ब्राउजिंग पैटर्न, व्यक्तिगत पसंद और अन्य संवेदनशील जानकारियां शामिल होती हैं। बाद में यही डेटा बड़े पैमाने पर बेचा जाता है, जिसे सरकारी एजेंसियां बिना सीधे न्यायिक अनुमति के इस्तेमाल कर सकती हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह तरीका उन कानूनी सुरक्षा उपायों को कमजोर करता है, जो नागरिकों की निजता की रक्षा के लिए बनाए गए हैं। ऐसे में यह प्रथा संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन के रूप में देखी जा रही है।

AI से पहले से मौजूद हैं निगरानी की क्षमताएं

अक्सर यह माना जाता है कि आधुनिक निगरानी का मुख्य आधार AI है, लेकिन यह मामला दिखाता है कि सरकारों के पास पहले से ही व्यापक सर्विलांस क्षमता मौजूद है। डेटा ब्रोकर्स से प्राप्त जानकारी इतनी विस्तृत होती है कि किसी व्यक्ति की दैनिक दिनचर्या, सामाजिक संबंध और पहचान तक का अनुमान लगाया जा सकता है।

कई अध्ययनों में यह भी सामने आ चुका है कि तथाकथित “अनाम” डेटा को अन्य स्रोतों से जोड़कर आसानी से व्यक्तियों की पहचान की जा सकती है।

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AI जुड़ने पर और बढ़ सकता है खतरा

विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि इस तरह के डेटा को AI तकनीकों के साथ जोड़ा गया, तो निगरानी की क्षमता और भी अधिक शक्तिशाली हो सकती है। AI बड़े डेटा सेट को तेजी से प्रोसेस कर विभिन्न स्रोतों की जानकारी को जोड़कर किसी व्यक्ति की विस्तृत प्रोफाइल तैयार कर सकता है।

इसी चिंता के चलते कई टेक कंपनियों ने अपनी AI सेवाओं के इस्तेमाल को लेकर सख्त शर्तें लागू की हैं, ताकि उन्हें घरेलू निगरानी के लिए इस्तेमाल न किया जा सके।

कानूनी और नैतिक बहस तेज

इस खुलासे के बाद अमेरिका में कानूनों की व्याख्या और संवैधानिक अधिकारों को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। अदालतें बिना वारंट डेटा एक्सेस पर रोक लगा चुकी हैं, लेकिन निजी कंपनियों से डेटा खरीदने पर स्पष्ट प्रतिबंध नहीं है। यही कानूनी ‘ग्रे एरिया’ एजेंसियों को निगरानी का वैकल्पिक रास्ता देता है।

प्राइवेसी विशेषज्ञों का कहना है कि यह तरीका कानून की भावना के विपरीत है और उचित कानूनी प्रक्रिया को परोक्ष रूप से दरकिनार करता है।

आगे क्या? नियमों की मांग तेज

इन खुलासों के बाद डेटा ब्रोकर्स पर कड़े नियमन और निगरानी से जुड़े स्पष्ट कानून बनाने की मांग तेज हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि पारदर्शिता और जवाबदेही के बिना इस तरह की गतिविधियां लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए गंभीर खतरा बन सकती हैं।

यह मामला साफ करता है कि डिजिटल युग में सिर्फ AI ही नहीं, बल्कि डेटा का संग्रह और उसका उपयोग भी एक बड़ा मुद्दा बन चुका है। अब सरकारों के सामने चुनौती है कि वे राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिकों की स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनाए रखें, ताकि निगरानी तंत्र जवाबदेह और पारदर्शी बना रहे।

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