नई दिल्ली: देश में मादक पदार्थों की तस्करी का स्वरूप तेजी से बदल रहा है और अब ड्रग तस्कर अत्याधुनिक तकनीकों का सहारा लेकर कानून प्रवर्तन एजेंसियों को चुनौती दे रहे हैं। केंद्र सरकार ने बुधवार को राज्यसभा में बताया कि सीमा पार सक्रिय ड्रग सिंडिकेट अब बड़े पैमाने पर ड्रोन, एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म, जीपीएस आधारित डिलीवरी, वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (VPN) और क्रिप्टोकरेंसी का इस्तेमाल कर भारत में नशीले पदार्थों की तस्करी कर रहे हैं। सरकार के अनुसार, इस उभरते खतरे से सबसे अधिक प्रभावित सीमावर्ती राज्य पंजाब है।
गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने राज्यसभा में लिखित उत्तर में बताया कि ड्रोन की मदद से मादक पदार्थों की तस्करी की घटनाओं में “तेजी से वृद्धि” दर्ज की गई है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2025 के दौरान देशभर में ड्रोन से जुड़े मादक पदार्थ तस्करी के 305 मामले सामने आए, जिनमें से 298 घटनाएं केवल पंजाब सीमा पर दर्ज की गईं। इन मामलों में करीब 460 किलोग्राम मादक पदार्थ जब्त किए गए, जिनमें लगभग 448 किलोग्राम हेरोइन, 9 किलोग्राम मेथामफेटामाइन और 3 किलोग्राम अफीम शामिल थी।
सरकार के अनुसार, सीमा पार सक्रिय तस्करी नेटवर्क अब ड्रोन के माध्यम से न केवल हेरोइन और सिंथेटिक ड्रग्स, बल्कि हथियार और गोला-बारूद भी भारत में भेजने का प्रयास कर रहे हैं। इसके लिए जीपीएस आधारित कंसाइनमेंट, स्थानीय रिसीवर नेटवर्क और एन्क्रिप्टेड संचार माध्यमों का उपयोग किया जा रहा है, जिससे तस्करी के पूरे नेटवर्क को संचालित किया जा सके और एजेंसियों की निगरानी से बचा जा सके।
गृह राज्य मंत्री ने एक अन्य जवाब में बताया कि संगठित ड्रग सिंडिकेट व्हाट्सएप, टेलीग्राम, स्नैपचैट, जांगी और विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल खरीद, परिवहन, छिपाने, वितरण और भुगतान के समन्वय के लिए कर रहे हैं। इन प्लेटफॉर्मों के जरिए तस्कर वाहकों की भर्ती, लाइव लोकेशन साझा करने, खेप की तस्वीरें और वीडियो भेजने तथा सप्लायर और रिसीवर के बीच संपर्क बनाए रखने का काम करते हैं।
सरकार ने यह भी स्वीकार किया कि तस्करी में शामिल लोग अपनी पहचान छिपाने के लिए वीपीएन का उपयोग कर रहे हैं। इसके अलावा, ड्रग्स से अर्जित धन को छिपाने और ट्रांसफर करने के लिए क्रिप्टोकरेंसी तथा अन्य वर्चुअल डिजिटल एसेट्स का भी इस्तेमाल बढ़ा है। विशेष रूप से विदेशी क्रिप्टो एक्सचेंज और गोपनीयता आधारित डिजिटल मुद्राएं जांच एजेंसियों के लिए वास्तविक प्रेषक और प्राप्तकर्ता की पहचान करना कठिन बना देती हैं।
जांच एजेंसियों के अनुसार, जेलों में बंद कुछ तस्कर भी मोबाइल फोन के माध्यम से अपने सहयोगियों के जरिए बाहर बैठकर पूरे नेटवर्क का संचालन कर रहे हैं। ऐसे मामलों में जब्त मोबाइल फोन, लैपटॉप और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की डिजिटल फॉरेंसिक जांच कर नेटवर्क, वित्तीय लेनदेन और अंतरराज्यीय तथा अंतरराष्ट्रीय कड़ियों की पहचान की जा रही है।
प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, संगठित अपराध नेटवर्क अब पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़कर ड्रोन, एन्क्रिप्टेड संचार, क्रिप्टोकरेंसी और डार्कनेट जैसी तकनीकों का व्यापक उपयोग कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में केवल ड्रग्स की बरामदगी पर्याप्त नहीं है, बल्कि डिजिटल फॉरेंसिक, वित्तीय जांच, ब्लॉकचेन विश्लेषण और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के साथ समन्वय के जरिए पूरे नेटवर्क को ध्वस्त करना आवश्यक है।
सरकार ने बताया कि इस चुनौती से निपटने के लिए संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों में एंटी-ड्रोन सिस्टम, उन्नत निगरानी कैमरे, पैन-टिल्ट-ज़ूम (PTZ) कैमरे, नाइट विजन डिवाइस, आधुनिक सीमा बाड़ और फ्लडलाइट जैसी व्यवस्थाएं मजबूत की जा रही हैं। इसके साथ ही नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) डिजिटल फॉरेंसिक, वित्तीय जांच और तकनीकी खुफिया सूचनाओं का एकीकृत उपयोग कर तस्करी नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है। डार्कनेट और क्रिप्टोकरेंसी आधारित तस्करी की जांच को मजबूत करने के लिए साइबर विशेषज्ञों की मदद ली जा रही है तथा विभिन्न केंद्रीय और राज्य एजेंसियों के बीच समन्वय बढ़ाने के लिए विशेष तंत्र भी स्थापित किए गए हैं।
