फर्जी दिल्ली पुलिस अधिकारी बनकर दो सप्ताह तक 73 वर्षीय कारोबारी को रखा 'डिजिटल अरेस्ट' में; जांच में पांच राज्यों के करीब 200 म्यूल बैंक खाते सामने आए

‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर बढ़ रही साइबर ठगी, फर्जी पुलिस और सरकारी अधिकारी बनकर लोगों से वसूली; विशेषज्ञों ने जारी की चेतावनी

Roopa
By Roopa
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नई दिल्ली: देशभर में तथाकथित “डिजिटल अरेस्ट” के नाम पर होने वाली साइबर ठगी के मामलों में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है। साइबर अपराधी खुद को पुलिस अधिकारी, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI), प्रवर्तन निदेशालय (ED), दूरसंचार विभाग या अन्य सरकारी एजेंसियों का अधिकारी बताकर लोगों को डराने-धमकाने और बड़ी रकम ठगने का प्रयास कर रहे हैं। विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि भारतीय कानून में “डिजिटल अरेस्ट” जैसी कोई कानूनी व्यवस्था नहीं है और किसी भी सरकारी एजेंसी को वीडियो कॉल पर किसी व्यक्ति को हिरासत में रखने या निर्दोष साबित करने के लिए धन जमा कराने का अधिकार नहीं है।

साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, इस प्रकार की ठगी आमतौर पर एक फोन कॉल से शुरू होती है। कॉल करने वाला व्यक्ति दावा करता है कि पीड़ित का आधार कार्ड किसी आपराधिक मामले में इस्तेमाल हुआ है, उसके नाम से भेजे गए पार्सल में अवैध वस्तुएं मिली हैं या उसका बैंक खाता मनी लॉन्ड्रिंग में उपयोग किया जा रहा है। इसके बाद गिरफ्तारी, कानूनी कार्रवाई और जेल भेजने की धमकी देकर पीड़ित पर तत्काल निर्णय लेने का दबाव बनाया जाता है।

विश्वास पैदा करने के लिए अपराधी अक्सर पीड़ित का नाम, मोबाइल नंबर, आधार या पैन जैसी कुछ व्यक्तिगत जानकारी पहले से जानते हैं। कई मामलों में वे वीडियो कॉल पर फर्जी पहचान पत्र दिखाते हैं, सरकारी लोगो वाले नकली दस्तावेज भेजते हैं और पीड़ित को घंटों तक वीडियो कॉल पर बने रहने के लिए मजबूर करते हैं। कुछ मामलों में यह भी कहा जाता है कि यदि पीड़ित ने परिवार, वकील या किसी अन्य व्यक्ति से संपर्क किया तो उसके खिलाफ कार्रवाई और कठोर हो जाएगी।

ठगी का सबसे महत्वपूर्ण चरण तब आता है जब पीड़ित को कथित “जांच” पूरी होने तक अपनी रकम किसी तथाकथित “सुरक्षित खाते” में जमा कराने के लिए कहा जाता है। कई लोगों को फिक्स्ड डिपॉजिट तुड़वाने, निवेश बेचने या व्यक्तिगत ऋण (Personal Loan) लेकर भी पैसा ट्रांसफर करने के लिए कहा जाता है। अपराधी भरोसा दिलाते हैं कि जांच पूरी होने के बाद पूरी राशि वापस कर दी जाएगी, लेकिन अधिकांश मामलों में धन वापस नहीं मिलता।

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विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी पुलिस, सीबीआई, ईडी या अन्य सरकारी एजेंसी द्वारा फोन या वीडियो कॉल पर बैंकिंग विवरण, ओटीपी, यूपीआई पिन, पासवर्ड या धनराशि ट्रांसफर करने की मांग नहीं की जाती। यदि कोई व्यक्ति इस प्रकार की मांग करता है, तो उसे संभावित साइबर ठगी मानकर तुरंत कॉल समाप्त कर देनी चाहिए। यदि किसी कॉल की सत्यता पर संदेह हो, तो संबंधित विभाग की आधिकारिक हेल्पलाइन या वेबसाइट के माध्यम से स्वतंत्र रूप से पुष्टि करनी चाहिए। कॉल करने वाले द्वारा दिए गए नंबर पर वापस संपर्क करने से बचना चाहिए।

यदि किसी व्यक्ति से गलती से धनराशि ट्रांसफर हो जाती है, तो उसे बिना देरी किए अपने बैंक को सूचित करना चाहिए और 1930 हेल्पलाइन या राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायत दर्ज करनी चाहिए। शुरुआती चरण में शिकायत दर्ज होने पर संदिग्ध लेनदेन को फ्रीज कराने और धनराशि की रिकवरी की संभावना अपेक्षाकृत अधिक रहती है।

प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने कहा कि डिजिटल अरेस्ट पूरी तरह से सोशल इंजीनियरिंग आधारित साइबर ठगी है, जिसमें अपराधी कानून का भय पैदा कर पीड़ित की निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करते हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी सरकारी एजेंसी द्वारा फोन या वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी की सूचना देकर पैसे जमा कराने का कोई प्रावधान नहीं है। यदि कोई व्यक्ति स्वयं को पुलिस, सीबीआई, ईडी या किसी अन्य जांच एजेंसी का अधिकारी बताकर धन ट्रांसफर करने का दबाव बनाए, तो तुरंत कॉल समाप्त करें, परिवार के किसी सदस्य से चर्चा करें और संबंधित एजेंसी से आधिकारिक माध्यम से सत्यापन करें। उन्होंने सलाह दी कि घबराहट में कोई वित्तीय निर्णय न लें, ओटीपी, बैंकिंग जानकारी या रिमोट एक्सेस किसी के साथ साझा न करें और किसी भी संदिग्ध कॉल की तुरंत साइबर पुलिस को सूचना दें, क्योंकि समय पर की गई कार्रवाई वित्तीय नुकसान को सीमित करने और धनराशि की रिकवरी की संभावना बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

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