ट्रांसयूनियन रिपोर्ट में बड़ा खुलासा; 2025 में भारत में संदिग्ध डिजिटल धोखाधड़ी दर 7.1% पहुंची, लॉजिस्टिक्स, टेलीकॉम और बीमा क्षेत्र सबसे अधिक निशाने पर

₹5.85 करोड़ डिजिटल अरेस्ट घोटाले में बड़ा खुलासा: मछली कारोबारी निकला साइबर नेटवर्क की अहम कड़ी, फोन में मिले ₹40 लाख के क्रिप्टो सुराग

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By Roopa
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नई दिल्ली। देश के चर्चित ₹5.85 करोड़ डिजिटल अरेस्ट घोटाले की जांच में एक नया और चौंकाने वाला मोड़ सामने आया है। गुरुग्राम पुलिस की विशेष जांच टीम (एसआईटी) ने जिस व्यक्ति को इस मामले में अहम कड़ी और कथित मध्यस्थ के रूप में गिरफ्तार किया है, उसकी पृष्ठभूमि ने जांच एजेंसियों को भी हैरान कर दिया है। आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी जिले का रहने वाला 45 वर्षीय स्वामी अयप्पा नरावुला कभी सेना में हवलदार था, लेकिन समय के साथ वह मछली कारोबार से जुड़ा और अब उस पर करोड़ों रुपये के साइबर धोखाधड़ी नेटवर्क से संबंध रखने के आरोप लगे हैं।

पुलिस के अनुसार, अयप्पा को 25 मई को हैदराबाद से गिरफ्तार किया गया। जांचकर्ताओं का दावा है कि वह उस डिजिटल अरेस्ट गिरोह की महत्वपूर्ण कड़ी था जिसने एक प्रमुख निजी क्षेत्र की कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी को कथित रूप से निशाना बनाकर ₹5.85 करोड़ की ठगी की थी। अधिकारियों का मानना है कि आरोपी विभिन्न साइबर अपराधियों, बैंक खातों, धन हस्तांतरण नेटवर्क और क्रिप्टोकरेंसी चैनलों के बीच संपर्क स्थापित करने का काम करता था।

जांच में सामने आया है कि अयप्पा लगभग एक दशक पहले सेना से समयपूर्व सेवानिवृत्त हुआ था। इसके बाद उसने मछली व्यापार शुरू किया और सामान्य कारोबारी जीवन व्यतीत करता दिखाई देता था। हालांकि, जांच एजेंसियों का आरोप है कि इसी दौरान वह साइबर अपराध नेटवर्क से जुड़ गया और वित्तीय लेनदेन को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगा।

सूत्रों के अनुसार, आरोपी का नाम पहले भी साइबर अपराध से जुड़े मामलों में सामने आ चुका है। जांचकर्ताओं ने दावा किया है कि वह गुजरात में दर्ज एक साइबर धोखाधड़ी मामले में पहले जेल भी जा चुका है। इसी वजह से उसकी गतिविधियां अब कई राज्यों की एजेंसियों के रडार पर हैं। अधिकारियों का मानना है कि उसके खिलाफ सामने आए पुराने मामलों और वर्तमान जांच के बीच महत्वपूर्ण कड़ियां हो सकती हैं।

सबसे अहम खुलासा आरोपी के मोबाइल फोन और डिजिटल उपकरणों की जांच के दौरान हुआ। जांच अधिकारियों के अनुसार, उसके फोन में लगभग ₹40 लाख मूल्य की क्रिप्टोकरेंसी से जुड़े विवरण मिले हैं। एजेंसियां अब यह पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि यह डिजिटल संपत्ति वैध निवेश का हिस्सा है या फिर साइबर अपराध से अर्जित धन को छिपाने और स्थानांतरित करने का माध्यम बनी।

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मामले की जांच कर रही टीम का मानना है कि डिजिटल अरेस्ट और अन्य साइबर ठगी नेटवर्क अब पारंपरिक बैंकिंग प्रणाली के साथ-साथ क्रिप्टोकरेंसी का भी उपयोग कर रहे हैं। इससे धन के वास्तविक स्रोत और अंतिम लाभार्थियों तक पहुंचना और अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाता है। यही कारण है कि इस मामले में वित्तीय फॉरेंसिक जांच को विशेष महत्व दिया जा रहा है।

जांच के दौरान कंबोडिया कनेक्शन भी सामने आया है। अधिकारियों के अनुसार, दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ क्षेत्रों में सक्रिय साइबर स्कैम परिसरों और भारतीय नेटवर्कों के बीच संभावित संबंधों की भी पड़ताल की जा रही है। हाल के वर्षों में कंबोडिया, म्यांमार और लाओस जैसे देशों में संचालित साइबर धोखाधड़ी केंद्रों का नाम कई अंतरराष्ट्रीय जांचों में सामने आ चुका है।

प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, डिजिटल अरेस्ट और निवेश आधारित साइबर अपराधों में अब बहुस्तरीय नेटवर्क काम कर रहे हैं। इनमें म्यूल बैंक खाते, क्रिप्टोकरेंसी चैनल, सोशल इंजीनियरिंग विशेषज्ञ और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संचालित साइबर ठगी केंद्र शामिल होते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में केवल एक आरोपी की गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं होती, बल्कि पूरे वित्तीय और डिजिटल इकोसिस्टम की जांच आवश्यक होती है।

फिलहाल गुरुग्राम पुलिस और अन्य एजेंसियां आरोपी के डिजिटल रिकॉर्ड, बैंक खातों, क्रिप्टो लेनदेन और संभावित अंतरराष्ट्रीय संपर्कों की गहन जांच कर रही हैं। अधिकारियों का मानना है कि जांच आगे बढ़ने के साथ इस नेटवर्क से जुड़े अन्य व्यक्तियों और वित्तीय मार्गों का भी खुलासा हो सकता है। यह मामला एक बार फिर दर्शाता है कि साइबर अपराध अब स्थानीय सीमाओं से आगे बढ़कर संगठित, तकनीक-संचालित और अंतरराष्ट्रीय स्वरूप ग्रहण कर चुके हैं।

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