इटावा और औरैया में स्वास्थ्य विभाग के भीतर कथित भ्रष्टाचार का बड़ा मामला सामने आया है। कानपुर विजिलेंस टीम द्वारा बुधवार को डिप्टी सीएमओ डॉ. श्रीनिवास यादव को 55 हजार रुपये की रिश्वत लेते रंगे हाथों गिरफ्तार किए जाने के बाद पूरे विभाग में हड़कंप मच गया है। गिरफ्तारी के बाद अब कई पीड़ित सामने आकर उनके खिलाफ गंभीर आरोप लगा रहे हैं और कथित वसूली तंत्र की परतें खुलने लगी हैं।
मामले में सबसे चौंकाने वाला खुलासा एक निजी क्लीनिक संचालक द्वारा किया गया है, जिन्होंने आरोप लगाया है कि डिप्टी सीएमओ लंबे समय से हर महीने 20 से 30 हजार रुपये की अवैध वसूली की मांग करते थे। पीड़ित रेश यादव के अनुसार, यह रकम उनके क्लीनिक को बिना किसी बाधा के चलाने के एवज में ली जाती थी। उन्होंने दावा किया कि अलग-अलग तारीखों पर उनसे 50-50 हजार रुपये की वसूली भी की गई।
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आरोपों के मुताबिक, वर्ष 2019, 2020, 2022 और 2025 में कई बार पैसे लिए गए। जब उन्होंने आगे भुगतान करने से इनकार किया, तो क्लीनिक बंद कराने की धमकी दी गई। पीड़ित का कहना है कि यह दबाव केवल प्रत्यक्ष रूप से नहीं बल्कि एक संगठित तरीके से बनाया जाता था।
सबसे गंभीर आरोप यह है कि डिप्टी सीएमओ सीधे तौर पर वसूली में शामिल नहीं होते थे, बल्कि अपने कार्यालय में तैनात एक लिपिक और एक आशा कार्यकर्ता के माध्यम से यह पूरा नेटवर्क संचालित किया जाता था। आरोप है कि ये दोनों लोग पैसे एकत्र कर उच्च अधिकारियों तक पहुंचाते थे। पीड़ित के अनुसार, कुछ मामलों में डिप्टी सीएमओ ने स्वयं अपने सरकारी आवास पर बुलाकर भी पैसे लिए थे।
इस कथित वसूली प्रणाली को लेकर कई बार उच्च अधिकारियों से शिकायत की गई, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं होने से पीड़ितों में निराशा बढ़ती रही। अब विजिलेंस की गिरफ्तारी के बाद लोग खुलकर सामने आ रहे हैं और पूरे सिस्टम पर सवाल उठा रहे हैं।
इसी बीच स्वास्थ्य विभाग में पहले से चल रहे एक बड़े घोटाले की भी चर्चा तेज हो गई है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, पूर्व सीएमओ और डिप्टी सीएमओ समेत कुल 18 अधिकारियों के खिलाफ उप लोकायुक्त के समक्ष एक मामला पहले से लंबित है। यह शिकायत वर्ष 2024 में प्रमोद गुप्ता द्वारा दर्ज कराई गई थी।
इस शिकायत में आरोप लगाया गया है कि शहर में खोले गए हेल्थ एंड वेलनेस सेंटरों में भारी अनियमितताएं की गईं। इन सेंटरों को तय मानकों की अनदेखी कर निजी घरों और गैराजों में खोला गया, और विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत से इन्हें वैध दिखाया गया।
आरोपों में यह भी कहा गया है कि इन सेंटरों के नाम पर प्रति माह 42 हजार से 45 हजार रुपये तक का फर्जी किराया निकाला जा रहा था, जिससे सरकारी धन का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग हुआ। इस मामले में पूर्व सीएमओ, एसीएमओ, डिप्टी सीएमओ और कई लिपिकों सहित 18 लोगों को नामजद किया गया है।
शिकायतकर्ता के अनुसार, उन्होंने इस पूरे मामले की जानकारी प्रधानमंत्री कार्यालय, मुख्यमंत्री कार्यालय, डीजी हेल्थ, एडीजी हेल्थ और जिला प्रशासन तक भेजी थी। प्रारंभिक जांच में आरोपों को सही पाया गया था और बयान भी दर्ज किए जा चुके हैं, लेकिन कार्रवाई लंबित थी।
अब विजिलेंस द्वारा डिप्टी सीएमओ की गिरफ्तारी के बाद इस पूरे नेटवर्क पर जांच तेज होने की उम्मीद है। माना जा रहा है कि यह कार्रवाई स्वास्थ्य विभाग में वर्षों से चल रहे कथित भ्रष्टाचार और वसूली तंत्र पर बड़ा खुलासा कर सकती है।
अधिकारियों का कहना है कि जांच पूरी होने के बाद और भी नाम सामने आ सकते हैं, क्योंकि यह मामला केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं बल्कि एक संगठित प्रणाली से जुड़ा प्रतीत होता है। फिलहाल विभाग में हड़कंप की स्थिति है और आगे की कार्रवाई पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।
