साइबर फ्रॉड के बाद शुरुआती 60 मिनट बेहद अहम; 1930 पर तत्काल शिकायत से रकम को आगे जाने से रोकने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है, जबकि चैट, कॉल और भुगतान से जुड़े डिजिटल सबूत जांच की कड़ी मजबूत कर सकते हैं

₹12 लाख में सरकारी नौकरी की परीक्षा में ‘हाईटेक नकल’, दिल्ली में अंतरराज्यीय गिरोह का भंडाफोड़

Roopa
By Roopa
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नई दिल्ली: सरकारी नौकरी हासिल करने के लिए अभ्यर्थियों से लाखों रुपये वसूलकर हाईटेक तरीके से नकल कराने वाले एक अंतरराज्यीय गिरोह का दिल्ली पुलिस ने भंडाफोड़ किया है। जनकपुरी थाना पुलिस ने गिरोह के कथित सरगना समेत सात आरोपियों को गिरफ्तार किया है। पुलिस के अनुसार, गिरोह के सदस्य अभ्यर्थियों से ₹10 लाख से ₹12 लाख तक की रकम लेते थे और परीक्षा केंद्र के भीतर बैठे उम्मीदवारों को इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के जरिए बाहर से उत्तर उपलब्ध कराते थे। पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से कस्टमाइज्ड मोबाइल फोन, ब्लूटूथ डिवाइस, सिम कार्ड और नैनो ईयरबड समेत कई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बरामद किए हैं।

गिरफ्तार आरोपियों की पहचान सोनू कुमार उर्फ सोनू मान, सनी, दीपक, वीरेंद्र, रिंकू, हेमंत और आरती के रूप में हुई है। पुलिस के अनुसार, सोनू कुमार उर्फ सोनू मान गिरोह का कथित सरगना है और वह चंडीगढ़ फायर विभाग में फायरमैन के पद पर कार्यरत बताया गया है। जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि सरकारी सेवा में रहते हुए वह इस नेटवर्क से कब और किस तरह जुड़ा तथा उसकी भूमिका कितनी परीक्षाओं तक रही।

मामले का खुलासा 26 जुलाई को आयोजित लोअर डिवीजन क्लर्क भर्ती परीक्षा के दौरान हुआ। यह परीक्षा केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय की ओर से जनकपुरी स्थित केंद्रीय विद्यालय में आयोजित की गई थी। परीक्षा के दौरान दो अभ्यर्थियों द्वारा अनुचित साधनों का इस्तेमाल किए जाने की शिकायत पुलिस को मिली। शिकायत के बाद जनकपुरी थाना पुलिस ने परीक्षा केंद्र पर पहुंचकर दोनों संदिग्ध अभ्यर्थियों की जांच की और उनके पास मौजूद इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को कब्जे में लिया।

जांच के दौरान आरोपी आरती के पास से विशेष रूप से तैयार किया गया मोबाइल फोन बरामद हुआ। वहीं हेमंत के पास से ब्लूटूथ डिवाइस, सिम कार्ड और नैनो ईयरबड मिले। पुलिस को शुरुआती जांच में संदेह हुआ कि इन उपकरणों का इस्तेमाल परीक्षा केंद्र के बाहर मौजूद लोगों से संपर्क कर उत्तर हासिल करने के लिए किया जा रहा था। इसके बाद संबंधित धाराओं में प्राथमिकी दर्ज कर दोनों को गिरफ्तार किया गया।

पूछताछ में हेमंत से मिली जानकारी ने पुलिस को कथित नकल नेटवर्क की अगली कड़ियों तक पहुंचाया। हेमंत ने पुलिस को बताया कि उसके भाई रिंकू ने वीरेंद्र के माध्यम से ₹12 लाख में ब्लूटूथ डिवाइस और सिम कार्ड की व्यवस्था कराई थी। आरोप है कि इन उपकरणों की मदद से परीक्षा केंद्र के बाहर मौजूद सहयोगी अभ्यर्थी तक सवालों के जवाब पहुंचाने वाले थे। इस जानकारी के बाद पुलिस ने नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की तलाश शुरू की।

जांच में सनी और दीपक की भूमिका भी सामने आई। पुलिस के अनुसार, सनी लेडी इरविन कॉलेज में लैब अटेंडेंट है और वह अभ्यर्थियों को गिरोह से जोड़ने का काम करता था। वहीं दीपक कथित तौर पर एजेंट की भूमिका निभाता था और उम्मीदवारों की व्यवस्था करने के साथ सिम कार्ड तथा अन्य तकनीकी संसाधन उपलब्ध कराने में मदद करता था। पुलिस अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि गिरोह ने कितने अभ्यर्थियों से संपर्क किया और किन-किन परीक्षाओं में नकल कराने की कोशिश की।

गिरोह की कथित कार्यप्रणाली में आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का इस्तेमाल महत्वपूर्ण था। पुलिस के मुताबिक, सामान्य मोबाइल फोन के बजाय ऐसे कस्टमाइज्ड उपकरण तैयार किए जाते थे जिन्हें परीक्षा केंद्र में छिपाना आसान हो। नैनो ईयरबड और ब्लूटूथ डिवाइस के जरिए अभ्यर्थी और बाहर मौजूद सहयोगियों के बीच संपर्क स्थापित करने की कोशिश की जाती थी। विदेशी WhatsApp अकाउंट से जुड़े टैबलेट का इस्तेमाल भी कथित तौर पर नेटवर्क के संचार और समन्वय में किया जाता था।

पुलिस अब गिरफ्तार आरोपियों के मोबाइल फोन, सिम कार्ड, टैबलेट और अन्य डिजिटल उपकरणों की जांच कर रही है। इसके अलावा बैंक खातों और वित्तीय लेनदेन का विश्लेषण किया जा रहा है, ताकि अभ्यर्थियों से वसूली गई रकम और उसके आगे के लेनदेन का पता लगाया जा सके। पुलिस उन उम्मीदवारों की भी पहचान करने का प्रयास कर रही है, जिन्होंने गिरोह को लाखों रुपये दिए होंगे।

जांच का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि गिरोह ने परीक्षा केंद्रों की सुरक्षा व्यवस्था में मौजूद किसी कमी का फायदा उठाया या नहीं। पुलिस को आशंका है कि नेटवर्क केवल 26 जुलाई की परीक्षा तक सीमित नहीं हो सकता। गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ और डिजिटल साक्ष्यों के विश्लेषण के आधार पर पूर्व में आयोजित सरकारी भर्ती परीक्षाओं में उनकी संभावित भूमिका की भी जांच की जा रही है।

पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि गिरोह का नेटवर्क किन राज्यों तक फैला था, कितने एजेंट इससे जुड़े थे और परीक्षा में नकल कराने के लिए बाहर से उत्तर उपलब्ध कराने वाले लोगों की भूमिका क्या थी। अधिकारियों का मानना है कि इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, डिजिटल संचार और वित्तीय लेनदेन की कड़ियों को जोड़ने से नेटवर्क के अन्य सदस्यों और संभावित लाभार्थियों तक पहुंचने में मदद मिल सकती है। मामले में आगे की जांच जारी है।

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