ऑपरेशन 'तूफान' के दौरान पुलिस को कॉल सेंटर से संचालित कथित ऑनलाइन लोन ऐप गिरोह का मिला सुराग; विदेशी नागरिकों समेत बड़ी संख्या में लोगों को बनाया गया निशाना, डिजिटल साक्ष्यों की जांच जारी

फर्जी शैक्षिक प्रमाणपत्र और मार्कशीट बनाने वाले संगठित गिरोह का भंडाफोड़: तीन गिरफ्तार, लैपटॉप-प्रिंटर समेत बड़ी मात्रा में नकली दस्तावेज बरामद

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By Roopa
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नई दिल्ली: दिल्ली पुलिस की शाहदरा जिला स्पेशल स्टाफ टीम ने फर्जी शैक्षिक प्रमाणपत्र और मार्कशीट तैयार कर बेचने वाले एक संगठित गिरोह का पर्दाफाश करते हुए तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया है। पुलिस के अनुसार, आरोपी बंद हो चुके एक शैक्षिक संस्थान के पुराने लेटरहेड, मुहर और प्रारूप का इस्तेमाल कर 10वीं और 12वीं की नकली मार्कशीट तथा प्रमाणपत्र तैयार करते थे। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि इन दस्तावेजों का उपयोग कथित तौर पर नौकरी, प्रवेश और अन्य आधिकारिक कार्यों में किया जाना था। पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से फर्जी मार्कशीट, लैपटॉप, प्रिंटर और दस्तावेज तैयार करने में प्रयुक्त अन्य उपकरण बरामद किए हैं।

गिरफ्तार आरोपियों की पहचान 53 वर्षीय नवनीत त्यागी निवासी शाहदरा, 41 वर्षीय सबाब आलम निवासी गाजियाबाद और 49 वर्षीय फहीद अहमद सैफी निवासी मौजपुर, दिल्ली के रूप में हुई है। पुलिस का कहना है कि तीनों कथित तौर पर अलग-अलग जिम्मेदारियां संभालते थे। कोई ग्राहकों से संपर्क करता था, कोई डिजिटल रूप से दस्तावेज तैयार करता था, जबकि अन्य आरोपी उनकी छपाई और वितरण का काम संभालते थे। पुलिस अब यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि इस नेटवर्क में और कौन-कौन लोग शामिल थे।

पुलिस के अनुसार, पूरे मामले का खुलासा 30 जून को मिली एक गुप्त सूचना के बाद हुआ। सूचना में बताया गया था कि शाहदरा निवासी नवनीत त्यागी फर्जी शैक्षिक दस्तावेज तैयार कर ग्राहकों को उपलब्ध करा रहा है। इसके बाद पुलिस ने एक डिकॉय ग्राहक तैयार कर आरोपी से संपर्क कराया। जांच के दौरान सौदा तय होने के बाद 17 जुलाई को जीटी रोड स्थित मिराज सिनेमा के पास कार्रवाई कर नवनीत त्यागी को कथित रूप से फर्जी दस्तावेज सौंपते समय गिरफ्तार कर लिया गया। पूछताछ और आगे की जांच के आधार पर अन्य दो आरोपियों को भी गिरफ्तार किया गया।

जांच में सामने आया कि आरोपी एक ऐसे संस्थान ‘ग्रामीण मुक्त विद्यालय शिक्षा संस्थान’ के नाम का इस्तेमाल कर रहे थे, जिसका पंजीकरण पहले ही समाप्त हो चुका था। पुलिस के अनुसार, गिरोह के सदस्य संस्थान के पुराने लेटरहेड, मुहर और प्रारूप का उपयोग कर पुरानी तिथियों वाले प्रमाणपत्र तैयार करते थे, ताकि दस्तावेज पहली नजर में वास्तविक प्रतीत हों और सामान्य सत्यापन के दौरान आसानी से संदेह के दायरे में न आएं। अधिकारियों का मानना है कि यह तरीका जांच एजेंसियों को भ्रमित करने के उद्देश्य से अपनाया गया था।

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पुलिस का आरोप है कि गिरोह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और व्हाट्सएप के माध्यम से ग्राहकों तक पहुंच बनाता था। इच्छुक व्यक्ति अपनी फोटो, आधार कार्ड और पुरानी शैक्षिक जानकारी डिजिटल माध्यम से भेजता था, जिसके आधार पर कुछ ही घंटों में कथित तौर पर नई फर्जी 10वीं या 12वीं की मार्कशीट तैयार कर दी जाती थी। प्रत्येक दस्तावेज के लिए ग्राहकों से ₹5,000 से ₹10,000 तक वसूले जाते थे। पुलिस अब आरोपियों के मोबाइल फोन, चैट रिकॉर्ड, डिजिटल फाइलों और ऑनलाइन लेनदेन का विश्लेषण कर यह पता लगाने में जुटी है कि अब तक कितने लोगों को ऐसे दस्तावेज उपलब्ध कराए गए।

जांच एजेंसियां बरामद लैपटॉप, प्रिंटर, डिजिटल टेम्पलेट, दस्तावेजों की सॉफ्ट कॉपी और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की फॉरेंसिक जांच कर रही हैं। इसके साथ ही यह भी जांच की जा रही है कि क्या इन फर्जी प्रमाणपत्रों का उपयोग सरकारी या निजी नौकरियों, शैक्षिक संस्थानों में प्रवेश अथवा अन्य कानूनी प्रक्रियाओं में किया गया था। पुलिस उन लोगों की पहचान भी कर रही है जिन्होंने इन दस्तावेजों को तैयार कराया या उनका उपयोग किया।

Future Crime Research Foundation के विशेषज्ञों के अनुसार, डिजिटल डिजाइन सॉफ्टवेयर, उच्च गुणवत्ता वाले प्रिंटर और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के बढ़ते उपयोग ने फर्जी दस्तावेज तैयार करने वाले गिरोहों के लिए नए अवसर पैदा किए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी विभागों, शैक्षिक संस्थानों और निजी नियोक्ताओं को केवल कागजी प्रमाणपत्रों पर निर्भर रहने के बजाय डिजिटल सत्यापन प्रणाली, सुरक्षित दस्तावेज प्रमाणीकरण और मूल रिकॉर्ड से क्रॉस-वेरिफिकेशन को अनिवार्य बनाना चाहिए। साथ ही नौकरी या प्रवेश के लिए आवेदन करने वाले लोगों को किसी भी परिस्थिति में फर्जी प्रमाणपत्र बनवाने या इस्तेमाल करने से बचना चाहिए, क्योंकि ऐसा करना गंभीर कानूनी कार्रवाई का कारण बन सकता है।

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