टास्क-बेस्ड स्कैम और फर्जी इन्वेस्टमेंट प्लेटफॉर्म के जरिए देशभर में लोगों को बनाया शिकार; म्यूल बैंक अकाउंट्स से पैसे घुमाने का नेटवर्क उजागर

“इंटरस्टेट साइबर ठगी गिरोह का पर्दाफाश: ऑनलाइन निवेश के नाम पर ठगी, 5 आरोपी गिरफ्तार”

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By Roopa
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नई दिल्ली। ऑनलाइन निवेश और टास्क-बेस्ड स्कीम के नाम पर लोगों को ठगने वाले एक इंटरस्टेट साइबर फ्रॉड गिरोह का भंडाफोड़ हुआ है। इस मामले में पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जो देशभर में सक्रिय रहकर लोगों को झांसे में लेकर उनसे पैसे ऐंठते थे। जांच में सामने आया है कि यह गिरोह न केवल लोगों को फर्जी निवेश योजनाओं में फंसाता था, बल्कि ठगी की रकम को छिपाने के लिए म्यूल बैंक अकाउंट्स का इस्तेमाल भी करता था।

मामले की शुरुआत एक शिकायत से हुई, जिसमें दिल्ली के एक निवासी ने बताया कि उसे व्हाट्सऐप ग्रुप में जोड़कर डिजिटल मार्केटिंग और ऑनलाइन टास्क के नाम पर कमाई का लालच दिया गया। शुरुआत में छोटे-छोटे टास्क पूरे करने पर कुछ पैसे देकर भरोसा जीता गया, जिसके बाद उसे बड़ी रकम निवेश करने के लिए प्रेरित किया गया। आरोपियों के झांसे में आकर पीड़ित ने कई ट्रांजैक्शन के जरिए ₹1,01,869 ट्रांसफर कर दिए, लेकिन बाद में उसे कोई रिटर्न नहीं मिला।

शिकायत मिलने के बाद साइबर पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की। डिजिटल ट्रांजैक्शन, बैंक डिटेल्स और तकनीकी डेटा का विश्लेषण करने पर पता चला कि ठगी की रकम अलग-अलग बैंक खातों में ट्रांसफर की गई थी। जांच के दौरान ₹3,40,877 की संदिग्ध रकम का लिंक कई शिकायतों से जुड़ा पाया गया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि यह कोई एकल घटना नहीं बल्कि एक संगठित नेटवर्क है।

जांच में यह भी सामने आया कि गिरोह के सदस्य म्यूल अकाउंट्स का उपयोग कर रहे थे। ये ऐसे बैंक खाते होते हैं, जिन्हें असली अपराधी सीधे इस्तेमाल नहीं करते, बल्कि दूसरे लोगों के नाम पर खुलवाकर या किराए पर लेकर उसमें ठगी की रकम जमा करते हैं। इससे पैसों के असली स्रोत को छिपाना आसान हो जाता है।

पुलिस की टीम ने तकनीकी निगरानी और स्थानीय सूचना के आधार पर उत्तराखंड के उधम सिंह नगर क्षेत्र में छापेमारी कर पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया। जांच में पता चला कि इनमें से कुछ आरोपी छात्र हैं, जो म्यूल अकाउंट उपलब्ध कराने और ट्रांजैक्शन के बदले कमीशन लेते थे। बाकी आरोपी इन खातों की व्यवस्था कर उन्हें साइबर अपराधियों तक पहुंचाने का काम करते थे।

पूछताछ में यह भी सामने आया कि गिरोह का काम करने का तरीका बेहद सुनियोजित था। सबसे पहले सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के जरिए लोगों को टारगेट किया जाता था। फिर उन्हें फर्जी वेबसाइट या ऐप पर ले जाकर पर्सनल डिटेल्स भरवाई जाती थीं। इसके बाद उनसे निवेश के नाम पर पैसे जमा कराए जाते थे, जिन्हें अलग-अलग खातों के जरिए घुमाकर ट्रेसिंग मुश्किल बना दी जाती थी।

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विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के मामलों में “सोशल इंजीनियरिंग” का व्यापक इस्तेमाल किया जाता है। प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, ठग पहले पीड़ित का भरोसा जीतते हैं और फिर उसे लालच या दबाव के जरिए निवेश के लिए प्रेरित करते हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि किसी भी ऐसी योजना से सावधान रहना चाहिए जो कम समय में ज्यादा मुनाफे का वादा करती हो।

जांच एजेंसियों ने आरोपियों के पास से मोबाइल फोन और अन्य डिजिटल सबूत भी बरामद किए हैं, जिनका विश्लेषण किया जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि इस गिरोह के अन्य सदस्यों की पहचान कर उन्हें भी जल्द गिरफ्तार किया जाएगा।

इस घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि साइबर अपराधी लगातार नए तरीके अपनाकर लोगों को निशाना बना रहे हैं। खासकर ऑनलाइन निवेश और टास्क-बेस्ड कमाई के नाम पर चल रहे स्कैम तेजी से बढ़ रहे हैं।

प्रशासन ने आम लोगों से अपील की है कि किसी भी अनजान लिंक पर क्लिक न करें, संदिग्ध वेबसाइट्स पर अपनी जानकारी साझा न करें और बिना सत्यापन के पैसे ट्रांसफर करने से बचें। यदि कोई व्यक्ति साइबर ठगी का शिकार होता है, तो उसे तुरंत 1930 हेल्पलाइन या नेशनल साइबर क्राइम पोर्टल पर शिकायत दर्ज करनी चाहिए।

फिलहाल, इस मामले की जांच जारी है और एजेंसियां पूरे नेटवर्क का खुलासा करने में जुटी हैं। यह केस न केवल एक आपराधिक घटना है, बल्कि डिजिटल जागरूकता की कमी और लालच के चलते बढ़ते साइबर जोखिमों की भी एक गंभीर चेतावनी है।

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