अदालत ने माना कि हिरासत में पूछताछ से रकम के लेनदेन, डिजिटल साक्ष्य और कथित साइबर नेटवर्क की पूरी संरचना का पता लगाने में मदद मिलेगी; आरोपी की कंपनी के खाते में करीब ₹8.20 करोड़ आने का दावा

दिल्ली में ₹34.88 लाख साइबर ठगी मामले में आरोपी को अग्रिम जमानत नहीं, कोर्ट ने कहा- मनी ट्रेल और डिजिटल सबूत की जांच जरूरी

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By Roopa
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नई दिल्ली: दिल्ली की एक अदालत ने ₹34.88 लाख की कथित साइबर ठगी के मामले में आरोपी अजय शर्मा को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि मामले में आरोपी से हिरासत में पूछताछ जरूरी है, क्योंकि जांच एजेंसी को ठगी की रकम का मनी ट्रेल पता लगाने, डिजिटल साक्ष्य बरामद करने और कथित साइबर ठगी नेटवर्क की पूरी संरचना का खुलासा करने की जरूरत है। अदालत ने यह भी माना कि ऑनलाइन निवेश धोखाधड़ी, कई बैंक खातों के जरिए रकम घुमाने और कंपनियों के इस्तेमाल से जुड़े साइबर अपराधों में विस्तृत वित्तीय और डिजिटल जांच आवश्यक है।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश समर विशाल ने 11 अगस्त को अजय शर्मा की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए उसे खारिज कर दिया। मामला उस शिकायत से जुड़ा है, जिसमें एक व्यक्ति को कथित तौर पर Facebook और WhatsApp के जरिए निवेश के लिए संपर्क किया गया था। शिकायतकर्ता को निवेश पर काफी अधिक रिटर्न का भरोसा दिलाया गया और इसी प्रक्रिया में उससे ₹34.88 लाख की कथित ठगी की गई।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, जांच में सामने आया कि ठगी गई रकम का एक हिस्सा कई बैंक खातों के माध्यम से ट्रांसफर किया गया। बाद में यह रकम M/s Aerobott Ventures Pvt Ltd के एक बैंक खाते तक पहुंची, जिसमें अजय शर्मा निदेशकों में से एक था। जांच एजेंसी ने दावा किया कि इस कंपनी का बैंक खाता अलग-अलग राज्यों में दर्ज कम से कम नौ साइबर ठगी की शिकायतों में सामने आया है।

अभियोजन ने अदालत को बताया कि शर्मा से जुड़े एक बैंक खाते में करीब ₹8.20 करोड़ जमा होने की जानकारी सामने आई है। हालांकि इस रकम का वास्तविक स्रोत, इसे आगे भेजे जाने की दिशा, अंतिम लाभार्थियों और आरोपी तथा उसके कथित सहयोगियों की भूमिका की जांच अभी जारी है। जांच एजेंसी का कहना है कि इन वित्तीय लेनदेन की पूरी कड़ी सामने आने के बाद ही नेटवर्क में शामिल अन्य लोगों और उनकी भूमिकाओं का पता लगाया जा सकेगा।

अदालत ने सुनवाई के दौरान आरोपी की ओर से कंपनी में उसकी भूमिका को लेकर दिए गए स्पष्टीकरण पर भी विचार किया। शर्मा के वकील ने दलील दी कि वह कंपनी में केवल कर्मचारी था और उसकी सहमति के बिना उसे निदेशक बना दिया गया। हालांकि अदालत ने इस दलील को प्रथम दृष्टया भरोसेमंद नहीं माना।

अदालत ने कहा कि करीब पांच वर्षों तक किसी कंपनी से जुड़े रहने और उसके निदेशकों में शामिल होने वाले व्यक्ति के लिए कंपनी के कारोबार की प्रकृति से पूरी तरह अनजान होने की बात स्वीकार करना कठिन है। अदालत ने आरोपी की भूमिका को लेकर जांच एजेंसी के आरोपों को गंभीर माना और कहा कि इस स्तर पर उसकी हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता।

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि शर्मा पहले एक अन्य साइबर अपराध मामले में भी जांच का सामना कर चुका है और उस मामले में उसके खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि पिछला मामला वर्तमान मामले में उसकी दोषसिद्धि का आधार नहीं है, लेकिन हिरासत में पूछताछ की जरूरत और जांच में प्रभावी सहयोग की संभावना का आकलन करते समय इस तथ्य को पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।

जांच एजेंसी के मुताबिक, आरोपी को जांच में शामिल होने के लिए नोटिस दिया गया था, लेकिन उसने कथित तौर पर जांच में सहयोग नहीं किया। अदालत ने इस पहलू को भी महत्वपूर्ण माना। न्यायाधीश ने कहा कि इस चरण में गिरफ्तारी से सुरक्षा देने पर जांच एजेंसी के लिए धन के प्रवाह का पता लगाना और डिजिटल साक्ष्य बरामद करना मुश्किल हो सकता है।

अदालत ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि ऑनलाइन निवेश धोखाधड़ी में अपराधी अक्सर कई बैंक खातों, कंपनियों और layered transactions का इस्तेमाल करते हैं। ऐसी व्यवस्था में केवल शिकायतकर्ता से रकम लेने वाले व्यक्ति तक जांच सीमित रखने के बजाय पूरे वित्तीय और डिजिटल नेटवर्क की पहचान करना जरूरी होता है।

प्रसिद्ध साइबर क्राइम विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, ऑनलाइन निवेश ठगी के मामलों में आरोपी तक पहुंचने के लिए केवल बैंक खाते की पहचान पर्याप्त नहीं होती। रकम किस खाते से आई, किन खातों में गई, किसने खाते संचालित किए और डिजिटल संचार किसके बीच हुआ, इन सभी कड़ियों को जोड़ना जरूरी होता है। ऐसे मामलों में डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित करना भी जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

अदालत ने अंततः अजय शर्मा की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। आदेश से स्पष्ट है कि फिलहाल जांच एजेंसी को आरोपी से हिरासत में पूछताछ करने और कथित ₹34.88 लाख की ठगी से जुड़े वित्तीय तथा डिजिटल नेटवर्क की आगे जांच करने का अवसर मिलेगा। मामले में अब जांच एजेंसी की कार्रवाई से यह स्पष्ट होगा कि ₹8.20 करोड़ के कथित लेनदेन का इस साइबर ठगी नेटवर्क से क्या संबंध है और इसमें अन्य आरोपियों की क्या भूमिका रही।

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