CUET-PG 2026 के इतिहास विषय में HUQP09 पेपर कोड के तहत दो अलग प्रश्नपत्र और आंसर-की उपलब्ध होने के दावे से परीक्षा की पारदर्शिता और मेरिट प्रक्रिया पर सवाल उठे हैं।

CUET-PG में नया विवाद: एक ही पेपर कोड पर दो परीक्षाएं, अभ्यर्थियों ने उठाए पारदर्शिता और मेरिट पर सवाल

Team The420
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वाराणसी। कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट पोस्ट ग्रेजुएट (CUET-PG) 2026 के परिणाम जारी होने और विभिन्न केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रवेश प्रक्रिया शुरू होने के बीच एक नया विवाद सामने आया है। इतिहास विषय के एक पेपर कोड से जुड़ी जानकारी ने अभ्यर्थियों, शिक्षकों और प्रवेश परीक्षाओं के विशेषज्ञों के बीच गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) की वेबसाइट पर एक ही पेपर कोड के तहत दो अलग-अलग प्रश्नपत्र और उनकी उत्तर कुंजियां उपलब्ध हैं, जबकि अधिकांश अभ्यर्थियों को केवल एक ही परीक्षा की जानकारी और प्रवेश पत्र जारी किए गए थे।

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मामला इतिहास विषय के पेपर कोड HUQP09 से जुड़ा है, जिसके माध्यम से केंद्रीय विश्वविद्यालयों में एमए इतिहास पाठ्यक्रमों में प्रवेश दिया जाता है। अभ्यर्थियों के अनुसार इस विषय की परीक्षा 13 मार्च को आयोजित की गई थी और इसके लिए जारी आधिकारिक अधिसूचना में भी यही तिथि दर्ज थी। लेकिन परिणाम घोषित होने के बाद जब कुछ छात्रों ने एनटीए की वेबसाइट पर उपलब्ध दस्तावेजों की समीक्षा की, तो उन्हें एक और चौंकाने वाली जानकारी मिली।

छात्रों का दावा है कि वेबसाइट पर इसी पेपर कोड से संबंधित 29 मार्च की एक अन्य परीक्षा का प्रश्नपत्र और उसकी आंसर-की भी अपलोड की गई है। इससे यह सवाल उठने लगा कि एक ही पेपर कोड के लिए दो अलग-अलग परीक्षाएं कैसे आयोजित हुईं और यदि दूसरी परीक्षा हुई थी तो उसकी सार्वजनिक सूचना क्यों जारी नहीं की गई। छात्रों का कहना है कि उन्हें दूसरी परीक्षा के संबंध में न तो कोई सूचना मिली और न ही किसी प्रकार का प्रवेश पत्र उपलब्ध कराया गया।

विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू नॉर्मलाइजेशन प्रक्रिया को लेकर सामने आया है। प्रवेश परीक्षाओं में जब किसी विषय के लिए अलग-अलग तिथियों या शिफ्टों में प्रश्नपत्र आयोजित किए जाते हैं, तो प्रश्नपत्रों के कठिनाई स्तर में संभावित अंतर को संतुलित करने के लिए नॉर्मलाइजेशन प्रक्रिया अपनाई जाती है। इसी आधार पर अंतिम मेरिट सूची तैयार की जाती है। अभ्यर्थियों का आरोप है कि यदि दो अलग-अलग प्रश्नपत्र आयोजित हुए हैं, तो उनके अंकों का नॉर्मलाइजेशन किया जाना चाहिए था। फिलहाल उपलब्ध जानकारी में ऐसी किसी प्रक्रिया का स्पष्ट उल्लेख नहीं दिखाई देता।

छात्रों का कहना है कि दोनों प्रश्नपत्रों के स्तर में भी अंतर दिखाई दे रहा है। कुछ अभ्यर्थियों का दावा है कि 29 मार्च के प्रश्नपत्र में अपेक्षाकृत आसान प्रश्न पूछे गए थे। यदि ऐसा है और नॉर्मलाइजेशन नहीं किया गया, तो दूसरी परीक्षा में शामिल अभ्यर्थियों को मेरिट सूची में अनुचित लाभ मिल सकता है। इससे 13 मार्च को परीक्षा देने वाले छात्रों के विश्वविद्यालय चयन और प्रवेश अवसरों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

इस पूरे घटनाक्रम के बाद कई अभ्यर्थियों ने एनटीए को ईमेल भेजकर स्पष्टीकरण मांगा है। छात्रों ने यह जानना चाहा है कि दूसरी परीक्षा किन परिस्थितियों में आयोजित की गई, उसमें कितने अभ्यर्थी शामिल हुए, क्या वह किसी विशेष श्रेणी के उम्मीदवारों के लिए थी, और दोनों परीक्षाओं के परिणाम तैयार करते समय कौन-सी मूल्यांकन प्रक्रिया अपनाई गई। छात्रों ने नॉर्मलाइजेशन संबंधी जानकारी सार्वजनिक करने की भी मांग की है।

इतिहास विषय के शिक्षकों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने वाले संस्थानों से जुड़े विशेषज्ञ भी इस मामले को गंभीरता से देख रहे हैं। उनका कहना है कि किसी भी राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षा की विश्वसनीयता उसके संचालन की पारदर्शिता पर निर्भर करती है। यदि परीक्षा प्रक्रिया से जुड़ी जानकारी स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं कराई जाती, तो इससे अभ्यर्थियों के बीच भ्रम और असंतोष पैदा हो सकता है।

फिलहाल अभ्यर्थी एनटीए की आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार कर रहे हैं। यदि एजेंसी की ओर से संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया, तो मामला आगे और तूल पकड़ सकता है। विश्वविद्यालयों में प्रवेश प्रक्रिया के बीच उठे इन सवालों ने हजारों छात्रों की चिंता बढ़ा दी है, जो अब यह जानना चाहते हैं कि उनकी मेरिट और प्रवेश अवसरों पर इस विवाद का क्या प्रभाव पड़ेगा।

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