कोयंबटूर। तमिलनाडु के कोयंबटूर में सीबीआई मामलों की विशेष अदालत ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर बैंक से कर्ज लेने के मामले में दो सरकारी स्कूल शिक्षकों को दोषी ठहराते हुए साढ़े तीन साल के कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने दोनों दोषियों पर ₹1 लाख-₹1 लाख का जुर्माना भी लगाया। मामला भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2021 में लिए गए ऋण से जुड़ा है।
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि दोनों शिक्षकों ने बैंक से कर्ज हासिल करने के लिए अपनी सरकारी नौकरी और कार्यस्थल से संबंधित कथित तौर पर जाली दस्तावेज पेश किए थे। अदालत ने धोखाधड़ी और जालसाजी से जुड़े आरोपों में दोनों को दोषी माना।
मामले के अनुसार, एक दोषी उस समय कृष्णागिरि जिले में सरकारी स्कूल में शिक्षक के तौर पर कार्यरत था। उसने 2021 में भारतीय स्टेट बैंक की सत्यामंगलम शाखा से ₹13.50 लाख का ऋण लिया था। ऋण प्राप्त करने के लिए उसने ऐसे दस्तावेज जमा किए थे, जिनसे यह दिखाया गया कि वह इरोड जिले के एक सरकारी स्कूल में शिक्षक के रूप में कार्यरत है। जांच में बाद में इन दस्तावेजों को कथित तौर पर फर्जी पाया गया।
दूसरे दोषी की तैनाती उस समय धर्मपुरी जिले के एक सरकारी स्कूल में थी। उसने भी वर्ष 2021 में उसी बैंक शाखा से ₹12 लाख का ऋण हासिल किया। इसके लिए उसने कथित तौर पर ऐसे दस्तावेज प्रस्तुत किए, जिनमें उसे इरोड जिले में सरकारी स्कूल का शिक्षक बताया गया था। बैंक की जांच में उसके दस्तावेज भी कथित तौर पर जाली पाए गए।
ऋण मिलने के कुछ महीने बाद दोनों शिक्षकों ने अपने वेतन खाते बैंक में बदल दिए। इन्हीं खातों से हर महीने ऋण की किस्तें काटी जा रही थीं। वेतन खाते बदलने के बाद बैंक को ऋण की अदायगी को लेकर स्थिति संदिग्ध लगी। इसके बाद बैंक ने दोनों मामलों की आंतरिक जांच शुरू की।
Proposal for Conducting Cyber Crisis Drill, Tabletop Exercise (TTEx) & CCMP Readiness Exercise
जांच के दौरान बैंक को पता चला कि ऋण लेने के समय जमा किए गए नौकरी और तैनाती से संबंधित दस्तावेज वास्तविक रिकॉर्ड से मेल नहीं खाते थे। दस्तावेजों के कथित तौर पर फर्जी होने की जानकारी सामने आने के बाद बैंक ने 2024 में मामले की जांच के लिए केंद्रीय जांच एजेंसी में शिकायत दर्ज कराई।
केंद्रीय जांच एजेंसी ने शिकायत के आधार पर जांच शुरू की। जांच के दौरान ऋण आवेदन, बैंक रिकॉर्ड और शिक्षकों की नौकरी से जुड़े दस्तावेजों की पड़ताल की गई। जांच पूरी होने के बाद 2025 में दोनों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया गया। इसके बाद मामला विशेष अदालत में चला, जहां दस्तावेजों और अन्य साक्ष्यों के आधार पर दोनों शिक्षकों को धोखाधड़ी और जालसाजी का दोषी पाया गया।
फैसले के समय दोनों शिक्षक अदालत में मौजूद नहीं थे। अभियोजन पक्ष के अनुसार, दोनों अभी भी सरकारी सेवा में कार्यरत हैं। उनके फैसले के समय उपस्थित नहीं होने पर अदालत ने दोनों के खिलाफ गैर-जमानती वारंट भी जारी किए।
अदालत ने दोनों दोषियों को साढ़े तीन वर्ष के कारावास के साथ ₹1 लाख-₹1 लाख जुर्माने की सजा सुनाई। मामले में बैंक से ऋण लेने के लिए सरकारी शिक्षक होने और तैनाती से संबंधित कथित फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल को धोखाधड़ी और जालसाजी का आधार माना गया।
