लखनऊ। राजधानी में अवैध और नियमों के विपरीत संचालित अस्पतालों के खिलाफ स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई पर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि जांच में दोषी पाए जाने के बाद अस्पताल बंद कराने का आदेश जारी कर दिया जाता है, लेकिन कुछ समय बाद संचालक उसी भवन में नाम और बोर्ड बदलकर दोबारा अस्पताल शुरू कर देते हैं। कुछ मामलों में नए नाम से संचालन शुरू होने के बाद पंजीकरण या संचालन की अनुमति दिए जाने की बात भी सामने आई है। इससे कार्रवाई की प्रभावशीलता और अस्पतालों की निगरानी व्यवस्था सवालों के घेरे में है।
डेनियल से क्राउन, भवन वही और अस्पताल का नाम नया
फैजुल्लागंज बंधा रोड स्थित डेनियल हॉस्पिटल एंड ट्रॉमा सेंटर का मामला इसी तरह के आरोपों का उदाहरण है। जांच के बाद अस्पताल के संचालन के खिलाफ कार्रवाई की गई थी। इसके बाद संचालक ने अस्पताल का बोर्ड हटाकर संचालन बंद कर दिया था। अब आरोप है कि उसी भवन में क्राउन हॉस्पिटल के नाम से दोबारा अस्पताल चल रहा है।
भवन और स्थान वही होने के बावजूद अस्पताल का नाम बदल गया है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि पुराने अस्पताल के खिलाफ हुई कार्रवाई के बाद उसी परिसर में शुरू हुए नए संस्थान की वैधानिक स्थिति की जांच किस स्तर पर की गई। साथ ही यह भी सवाल है कि पुराने संचालक और नए अस्पताल के बीच संबंधों की पड़ताल की गई या नहीं।
मौत के मामले के बाद किसान अस्पताल का पंजीकरण
दुबग्गा स्थित किसान हॉस्पिटल भी स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े करने वाले मामलों में शामिल है। यहां हड्डी के ऑपरेशन के बाद एक युवक की मौत का मामला सामने आया था। उस समय अस्पताल के पास पंजीकरण नहीं होने की बात सामने आई थी। आरोप है कि इंटरनेट के माध्यम से मरीजों को भर्ती करने की प्रक्रिया अपनाई जा रही थी।
मामला सामने आने के बाद अस्पताल के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की अपेक्षा की गई, लेकिन बाद में उसके पंजीकरण किए जाने का दावा सामने आया। इससे सवाल उठा कि जिस संस्थान के संचालन के दौरान पंजीकरण की स्थिति स्पष्ट नहीं थी और जहां इलाज के बाद मरीज की मौत का मामला सामने आया, उसे नियमित करने से पहले विभाग ने किन मानकों और दस्तावेजों की जांच की।
ऑक्सीजन बंद हुआ तो एवन के नाम से संचालन का आरोप
ठाकुरगंज स्थित ऑक्सीजन हॉस्पिटल में पिछले साल इलाज के दौरान एक बच्चे की मौत हुई थी। परिजनों ने इलाज में लापरवाही के आरोप लगाए थे। इसके बाद अपर निदेशक और मुख्य चिकित्सा अधिकारी स्तर से जांच कराई गई। करीब छह महीने बाद आई दोनों जांच रिपोर्टों में अस्पताल को दोषी ठहराए जाने की बात सामने आई।
इसके बाद मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने इसी महीने अस्पताल का संचालन बंद करने की कार्रवाई की और पुलिस को रिपोर्ट भेजी। हालांकि आरोप है कि उसी भवन में करीब एक महीने से एवन हॉस्पिटल के नाम से नया अस्पताल संचालित हो रहा है। इस अस्पताल के पंजीकरण नहीं होने की बात भी सामने आई है। इसके बावजूद संचालन रोकने की कार्रवाई नहीं होने से विभाग की निगरानी पर सवाल उठ रहे हैं।
Proposal for Conducting Cyber Crisis Drill, Tabletop Exercise (TTEx) & CCMP Readiness Exercise
अर्पण से धनवंतरी, पुराने स्थान पर संचालन जारी
विभूतिखंड स्थित अर्पण अस्पताल का मामला भी नाम बदलकर संचालन शुरू करने के आरोपों से जुड़ा है। करीब तीन वर्ष पहले अस्पताल से जुड़े चार दलालों को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेजा था। इसके बाद उप मुख्यमंत्री के निर्देश पर अस्पताल के संचालन पर रोक लगाए जाने की बात सामने आई थी।
कुछ महीने बाद आरोप है कि संचालक ने अस्पताल का नाम बदलकर धनवंतरी कर दिया और उसी स्थान से संचालन शुरू कर दिया। इसके बाद स्वास्थ्य विभाग की ओर से धनवंतरी अस्पताल का पंजीकरण किए जाने की जानकारी सामने आई। अस्पताल का संचालन अब भी जारी बताया जा रहा है। इससे सवाल उठता है कि पुराने संस्थान पर कार्रवाई के बाद उसी भवन और प्रबंधन से जुड़े नए नाम वाले अस्पताल के पंजीकरण के दौरान किन बिंदुओं की जांच की गई।
शिवा हॉस्पिटल पर जांच में दोष, फिर भी नहीं लगा ताला
शिवा हॉस्पिटल में जच्चा-बच्चा की मौत के मामले के बाद स्वास्थ्य विभाग ने जांच कराई। अधिकारियों के अनुसार जांच में अस्पताल को दोषी पाए जाने की बात सामने आई। इसके बावजूद भवन पर ताला लगाने की कार्रवाई नहीं हुई। विभाग का कहना है कि अस्पताल के संचालन पर पहले ही रोक लगाई जा चुकी है।
अब पुलिस को रिपोर्ट भेजकर मुकदमा दर्ज कराने और आगे की कार्रवाई कराने की बात कही जा रही है। इस मामले में भी सवाल है कि संचालन रोकने के आदेश के बाद उसकी जमीन पर वास्तविक अमल की निगरानी कौन करेगा और यदि अस्पताल दोबारा मरीज भर्ती करता है तो तत्काल कार्रवाई की जिम्मेदारी किस अधिकारी की होगी।
कागजी आदेश से आगे निगरानी की चुनौती
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के अनुसार जांच में दोषी पाए गए अस्पतालों की रिपोर्ट पुलिस को भेजी गई है और मुकदमा दर्ज होने के बाद आगे की कार्रवाई पुलिस स्तर से पूरी की जानी है। सीएमओ डॉ. एनबी सिंह के मुताबिक, जांच में दोषी पाए गए अस्पतालों के खिलाफ रिपोर्ट भेजी गई है और जो अस्पताल अवैध पाए जाएंगे, उनका संचालन रोका जाएगा।
हालांकि नाम बदलकर उसी भवन में अस्पताल शुरू होने के आरोपों ने व्यवस्था की एक बड़ी चुनौती सामने रखी है। अस्पताल बंद करने का आदेश तभी प्रभावी माना जा सकता है, जब उसके बाद परिसर में गतिविधियों की नियमित निगरानी हो। नए नाम से पंजीकरण के लिए आवेदन होने पर पुराने संस्थान के खिलाफ कार्रवाई, भवन, संचालक, चिकित्सकीय स्टाफ और प्रबंधन से जुड़े रिकॉर्ड की भी जांच जरूरी है। इन मामलों ने यह सवाल सामने ला दिया है कि अवैध अस्पतालों के खिलाफ कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित न रहकर जमीन पर भी प्रभावी ढंग से लागू हो रही है या नहीं।
