₹2.38 करोड़ आयकर रिफंड घोटाले में टैक्स अधिकारी और पुलिसकर्मी समेत 7 दोषियों को सजा सुनाने के बाद चेन्नई की विशेष CBI अदालत।

आईटी रिफंड घोटाले में सख्त सजा: टैक्स अधिकारी और पुलिसकर्मी समेत 7 दोषी करार, 4 साल की कैद

Team The420
5 Min Read

चेन्नई: आयकर रिफंड में बड़े स्तर पर धोखाधड़ी करने के मामले में चेन्नई की विशेष अदालत ने सात लोगों को दोषी ठहराते हुए चार साल की सख्त कैद और कुल ₹2.4 लाख के जुर्माने की सजा सुनाई है। इस मामले में एक आयकर विभाग का कर्मचारी और एक पुलिसकर्मी भी शामिल है, जिसने सरकारी सिस्टम में सेंध लगाकर करोड़ों रुपये की हेराफेरी को अंजाम दिया।

दोषियों में आयकर विभाग का तत्कालीन सीनियर टैक्स असिस्टेंट बाबू प्रसाथ कुमार और उसका भाई प्रवीण कुमार शामिल हैं, जो वर्तमान में चेन्नई पुलिस में इंस्पेक्टर के पद पर तैनात है। इनके अलावा ट्रेवेलिन मैरियन कॉर्नेल, पी स्टीफन, ए गोपीकृष्णा, वेंकटेश और सी गुणसीलन को भी अदालत ने दोषी करार दिया है।

मामले की जांच के दौरान सामने आया कि आरोपियों ने वर्ष 2015 से 2019 के बीच आयकर रिफंड प्रक्रिया में गंभीर हेरफेर किया। फर्जी दस्तावेजों और काल्पनिक पहचान का इस्तेमाल कर सिस्टम के जरिए अवैध तरीके से रिफंड जनरेट किए गए। इस पूरे खेल से आयकर विभाग को करीब ₹2.38 करोड़ का नुकसान हुआ।

FCRF Launches Premier CISO Certification Amid Rising Demand for Cybersecurity Leadership

यह मामला दिसंबर 2019 में दर्ज किया गया था, जब आयकर विभाग के एक अधिकारी ने संदिग्ध रिफंड जारी होने की शिकायत की। शुरुआती जांच में ही यह स्पष्ट हो गया कि यह कोई साधारण गड़बड़ी नहीं, बल्कि सुनियोजित साजिश के तहत किया गया घोटाला है। इसके बाद विस्तृत जांच शुरू की गई, जिसमें डिजिटल रिकॉर्ड, दस्तावेज और वित्तीय लेनदेन की बारीकी से जांच की गई।

जांच एजेंसी को पता चला कि बाबू प्रसाथ कुमार ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए सिस्टम में सीधे हस्तक्षेप किया और फर्जी रिफंड प्रोसेस किए। इस दौरान उसने अवैध रूप से प्राप्त धन को छिपाने के लिए उसे अपने परिवार के सदस्यों और सहयोगियों के खातों में ट्रांसफर किया। इस तरह पैसों के स्रोत को छिपाने की कोशिश की गई।

जांच पूरी होने के बाद मार्च 2021 में आरोपियों के खिलाफ सात चार्जशीट दाखिल की गईं। अदालत में पेश किए गए साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर सभी आरोपियों को दोषी पाया गया। अदालत ने इसे गंभीर आर्थिक अपराध मानते हुए सख्त सजा सुनाई, ताकि इस तरह के मामलों पर रोक लगाई जा सके।

मामले के एक अहम पहलू के रूप में यह भी सामने आया कि पुलिस विभाग से जुड़े आरोपी प्रवीण कुमार पिछले कुछ दिनों से छुट्टी पर थे, लेकिन उन्होंने अपनी छुट्टी के लिए अदालत की कार्यवाही का कोई उल्लेख नहीं किया था। इस पर भी सवाल उठे हैं और विभागीय स्तर पर अलग से जांच की संभावना जताई जा रही है।

यह मामला सरकारी तंत्र के भीतर मौजूद कमजोरियों और सिस्टम के दुरुपयोग की एक बड़ी मिसाल बनकर सामने आया है। जिस सिस्टम का उद्देश्य पारदर्शिता और त्वरित सेवा देना है, उसी का इस्तेमाल कर करोड़ों की ठगी की गई। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि अंदरूनी मिलीभगत के बिना इस स्तर का घोटाला संभव नहीं है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों को रोकने के लिए न केवल तकनीकी निगरानी को मजबूत करना होगा, बल्कि कर्मचारियों की जवाबदेही भी तय करनी होगी। डिजिटल सिस्टम में लगातार ऑडिट, रियल-टाइम मॉनिटरिंग और संदिग्ध ट्रांजेक्शन की तुरंत पहचान जरूरी है।

अदालत के इस फैसले को एक सख्त संदेश के रूप में देखा जा रहा है कि आर्थिक अपराधों में शामिल लोगों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा। साथ ही यह मामला सरकारी संस्थानों के लिए भी चेतावनी है कि वे अपनी आंतरिक प्रक्रियाओं को और अधिक सुरक्षित और पारदर्शी बनाएं।

जांच एजेंसियों का मानना है कि इस तरह के संगठित घोटालों के पीछे अक्सर बड़े नेटवर्क होते हैं। ऐसे में इस मामले से जुड़े अन्य संभावित कड़ियों की भी पड़ताल की जा रही है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश हो सके।

हमसे जुड़ें

Share This Article