11 वाटर कैरियर पदों की भर्ती में अंकों से कथित छेड़छाड़ का मामला; डिस्चार्ज याचिकाएं खारिज होने के बाद ट्रायल शुरू, दोनों आरोपियों ने आरोपों से किया इनकार

2011 चंडीगढ़ पुलिस भर्ती घोटाला: पूर्व DSP और इंस्पेक्टर पर मुकदमे की सुनवाई शुरू, अदालत ने भ्रष्टाचार और जालसाजी के आरोप तय किए

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By Roopa
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चंडीगढ़: वर्ष 2011 के चर्चित चंडीगढ़ पुलिस भर्ती घोटाले में अदालत ने पूर्व उप पुलिस अधीक्षक (DSP) जगबीर सिंह और इंस्पेक्टर नसीब सिंह के खिलाफ नियमित सुनवाई शुरू कर दी है। दोनों आरोपियों की डिस्चार्ज याचिकाएं खारिज होने के बाद अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश की अदालत ने भ्रष्टाचार, आपराधिक साजिश, जालसाजी, जाली दस्तावेजों के उपयोग और लोक सेवक द्वारा आपराधिक न्यासभंग से संबंधित आरोप तय किए हैं। दोनों आरोपियों ने अदालत में खुद को निर्दोष बताते हुए मुकदमे का सामना करने की बात कही है। मामले की अगली सुनवाई 9 सितंबर को अभियोजन पक्ष के साक्ष्य दर्ज करने के लिए निर्धारित की गई है।

अभियोजन के अनुसार यह मामला वर्ष 2010 में भारतीय रिजर्व बटालियन, चंडीगढ़ में वाटर कैरियर (क्लास-IV) के 11 पदों की भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा है। इन पदों के लिए कुल 22,036 अभ्यर्थियों ने आवेदन किया था, जिनमें से 827 उम्मीदवार पहले ट्रेड टेस्ट में सफल घोषित हुए। अंतिम परिणाम तैयार करने के दौरान संकलन समिति ने अंकों के आवंटन में कथित विसंगतियां पाईं, जिसके बाद पूरी भर्ती प्रक्रिया रद्द कर दी गई। बाद में कराई गई जांच में मूल अंकतालिकाओं में कथित काटछांट, बदलाव और अनियमितताओं की बात सामने आने पर मामला विजिलेंस को सौंपा गया और प्राथमिकी दर्ज की गई।

अदालत ने पूर्व DSP जगबीर सिंह और इंस्पेक्टर नसीब सिंह के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(2) तथा भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी (आपराधिक साजिश), 467 (जालसाजी), 471 (जाली दस्तावेज को असली के रूप में उपयोग करना) और 409 (लोक सेवक द्वारा आपराधिक न्यासभंग) के तहत आरोप तय किए हैं। अदालत का कहना है कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री प्रथम दृष्टया मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त आधार प्रस्तुत करती है।

इंस्पेक्टर नसीब सिंह ने अपनी डिस्चार्ज याचिका में दावा किया था कि उन्हें पक्षपातपूर्ण और त्रुटिपूर्ण जांच के कारण झूठा फंसाया गया है। उनका कहना था कि पहले ट्रेड टेस्ट के दौरान उनकी भूमिका केवल चयन समिति के अध्यक्ष की सहायता करने और अभ्यर्थियों को अंक देने तक सीमित थी। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि जिन कथित परिवर्तनों का उल्लेख किया गया है, वे जालसाजी की श्रेणी में नहीं आते तथा केंद्रीय फॉरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (CFSL) की रिपोर्ट भी कथित बदलाव उनके द्वारा किए जाने की पुष्टि नहीं करती।

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पूर्व DSP जगबीर सिंह ने भी अदालत से राहत मांगते हुए कहा कि उन्होंने लगभग 37 वर्षों तक बेदाग सेवा दी और उन्हें बिना पर्याप्त साक्ष्यों के इस मामले में शामिल किया गया। बचाव पक्ष ने दलील दी कि उनके खिलाफ अंकतालिका में किसी प्रकार की ओवरराइटिंग, सुधार या बदलाव करने का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है। साथ ही यह भी कहा गया कि जांच के दौरान जिन 77 अभ्यर्थियों के बयान दर्ज किए गए, उनमें किसी ने भी भर्ती प्रक्रिया या आरोपियों के खिलाफ पक्षपात अथवा भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगाया।

दूसरी ओर अभियोजन पक्ष ने अदालत को बताया कि अंतिम परिणाम संकलन समिति की रिपोर्ट में अंकों में गंभीर अनियमितताओं और मूल रिकॉर्ड में बदलाव का उल्लेख किया गया था। इसके बाद विजिलेंस जांच कराई गई और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपपत्र दाखिल किया गया। अदालत ने नसीब सिंह की याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा कि अभियोजन का आरोप है कि उन्होंने अन्य सदस्यों के साथ मिलकर अभ्यर्थियों के मूल अंकों में कथित रूप से बढ़ोतरी और कटौती की। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि रिकॉर्ड में 24 ऐसे संशोधन पाए गए हैं, जिन पर प्रथम दृष्टया नसीब सिंह के हस्ताक्षर या प्रारंभिक अक्षर मौजूद हैं, जिसकी पुष्टि CFSL रिपोर्ट से होती है।

हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इन परिवर्तनों का उद्देश्य किसी अभ्यर्थी को अनुचित लाभ पहुंचाना था या वे किसी वास्तविक त्रुटि को सुधारने के लिए किए गए थे, इसका अंतिम निर्णय मुकदमे के दौरान दोनों पक्षों के साक्ष्य और जिरह के बाद ही किया जाएगा। पूर्व DSP जगबीर सिंह के संबंध में अदालत ने कहा कि इस चरण पर उनके द्वारा स्वयं अंकतालिका में बदलाव किए जाने के पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं, लेकिन यह प्रश्न कि क्या वे कथित साजिश का हिस्सा थे या उन्हें अंकों में किए गए बदलावों की जानकारी थी, इसका निर्धारण केवल ट्रायल के दौरान साक्ष्यों के मूल्यांकन के बाद ही संभव होगा।

फिलहाल दोनों आरोपी न्यायिक प्रक्रिया का सामना कर रहे हैं और अभियोजन पक्ष आगामी सुनवाई में अपने गवाहों और दस्तावेजी साक्ष्यों को अदालत के समक्ष प्रस्तुत करेगा। इस लंबे समय से लंबित भर्ती घोटाले के मुकदमे की सुनवाई अब नियमित रूप से आगे बढ़ेगी, जिससे यह तय होगा कि भर्ती प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और अंकों में बदलाव के लिए आपराधिक जिम्मेदारी किस पर बनती है।

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