डिजिटल अरेस्ट जैसी साइबर ठगी में गंवाए ₹2 लाख की राशि फ्रीज होने के बावजूद वापस नहीं कर रहा था बैंक; उपभोक्ता आयोग ने सेवा में कमी मानते हुए रकम लौटाने और ₹20,000 मुआवजा व मुकदमे का खर्च देने का निर्देश दिया

साइबर ठगी के शिकार वरिष्ठ नागरिक को बड़ी राहत: उपभोक्ता आयोग ने HDFC बैंक को ₹2.20 लाख लौटाने का दिया आदेश

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By Roopa
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चंडीगढ़: चंडीगढ़ जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने साइबर ठगी के एक मामले में वरिष्ठ नागरिक के पक्ष में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए HDFC बैंक को फ्रीज की गई ₹2 लाख की राशि लौटाने और ₹20,000 मुआवजा एवं वाद व्यय का भुगतान करने का आदेश दिया है। आयोग ने माना कि पीड़ित ने साइबर ठगी की सूचना समय पर बैंक और पुलिस दोनों को दे दी थी तथा बैंक द्वारा मांगी गई सभी औपचारिकताएं भी पूरी कर दी थीं। इसके बावजूद बैंक ने राशि वापस करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया, जो सेवा में स्पष्ट कमी है।

आयोग का यह आदेश 9 जून को सुनाया गया। पीठ ने कहा कि शिकायतकर्ता की राशि को बिना किसी उचित कारण या स्पष्ट जवाब के लंबे समय तक रोके रखना बैंक की लापरवाही को दर्शाता है। आयोग ने यह भी टिप्पणी की कि एक वरिष्ठ नागरिक को बार-बार बैंक के चक्कर लगाने के लिए मजबूर किया गया, जिससे उसे मानसिक पीड़ा, असुविधा और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा।

मामले के अनुसार शिकायतकर्ता बलविंदर सिंह ने बताया कि 3 अप्रैल 2024 को उन्हें एक अज्ञात व्यक्ति का फोन आया। कॉल करने वालों ने दावा किया कि उनके बेटे को मादक पदार्थों से जुड़े मामले में हिरासत में लिया गया है। आरोपियों ने उनकी बातचीत एक ऐसे व्यक्ति से भी कराई, जिसने खुद को उनका बेटा बताकर बात की। इसके बाद कथित तौर पर बेटे को गंभीर कानूनी कार्रवाई से बचाने के नाम पर उन्हें तत्काल ₹2 लाख एक HDFC बैंक खाते में ट्रांसफर करने के लिए कहा गया।

डरे और घबराए बलविंदर सिंह ने बताए गए बैंक खाते में ₹2 लाख भेज दिए। बाद में जब उन्होंने अपने वास्तविक बेटे से संपर्क किया तो उन्हें पता चला कि वह पूरी तरह सुरक्षित है और उनके साथ साइबर ठगी हुई है। इसके तुरंत बाद उन्होंने संबंधित बैंक शाखा पहुंचकर ट्रांसफर की गई राशि को फ्रीज कराने में सफलता हासिल की। साथ ही चंडीगढ़ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई और उसकी प्रति भी बैंक को उपलब्ध कराई।

शिकायतकर्ता का आरोप था कि राशि फ्रीज होने के बावजूद बैंक ने कई बार लिखित अनुरोध और व्यक्तिगत संपर्क के बाद भी पैसे वापस नहीं किए। बैंक की ओर से कोई स्पष्ट कारण भी नहीं बताया गया। लगातार प्रयास विफल रहने पर उन्होंने जिला उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया और बैंक पर सेवा में कमी का आरोप लगाया।

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सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि नोटिस दिए जाने के बावजूद HDFC बैंक की सेक्टर-22 शाखा आयोग के समक्ष पेश नहीं हुई। इसके बाद आयोग ने बैंक के खिलाफ एकपक्षीय सुनवाई की। आयोग ने अपने आदेश में कहा कि बैंक की अनुपस्थिति से उसके खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकलता है और यह दर्शाता है कि शिकायतकर्ता के आरोपों का उसके पास कोई प्रभावी जवाब नहीं था। परिणामस्वरूप शिकायतकर्ता के तथ्यों का कोई खंडन नहीं हुआ।

आयोग ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि राशि वापस करने में कोई कानूनी बाधा, न्यायालय का रोक आदेश या अन्य वैध कारण मौजूद था। आयोग ने कहा कि जब यह निर्विवाद है कि राशि मूल रूप से शिकायतकर्ता की थी और उसने घटना की सूचना तुरंत बैंक व पुलिस को दे दी थी, तब बैंक की जिम्मेदारी थी कि वह निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने के बाद उचित समय के भीतर शिकायतकर्ता के अनुरोध पर निर्णय लेकर उसे सूचित करता।

आयोग ने कहा कि बिना किसी समाधान के शिकायतकर्ता की राशि लंबे समय तक रोके रखना सेवा में कमी की श्रेणी में आता है। विशेष रूप से शिकायतकर्ता एक वरिष्ठ नागरिक हैं, जिन्हें बार-बार बैंक के चक्कर लगाने पड़े और इससे उन्हें आर्थिक परेशानी के साथ मानसिक कष्ट भी झेलना पड़ा।

इन परिस्थितियों को देखते हुए आयोग ने शिकायत को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए HDFC बैंक को निर्देश दिया कि वह शिकायतकर्ता के खाते में फ्रीज की गई ₹2 लाख की राशि तुरंत जारी करे। इसके अलावा मानसिक उत्पीड़न, असुविधा और मुकदमे के खर्च के मद में ₹20,000 अतिरिक्त भुगतान भी करे। यह फैसला साइबर ठगी के मामलों में पीड़ितों के अधिकारों और बैंकों की जवाबदेही को लेकर एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है।

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