धारा 133A, 132 और 132A के मामलों पर अनिवार्य स्क्रूटनी; FY 2026-27 के लिए नए दिशानिर्देश जारी

CBDT का बड़ा कदम: डिजिटल ट्रैकिंग और फेसलेस असेसमेंट से और सख्त होगी ITR जांच

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By Roopa
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नई दिल्ली। केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड Central Board of Direct Taxes ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए आयकर रिटर्न की कंपल्सरी स्क्रूटनी से जुड़े नए दिशानिर्देश जारी किए हैं, जिनके तहत चयन प्रक्रिया को और अधिक स्पष्ट और सख्त बनाया गया है।

इन नए निर्देशों के अनुसार स्क्रूटनी चयन प्रणाली में कोई बड़ा संरचनात्मक बदलाव नहीं किया गया है, लेकिन मौजूदा नियमों को अधिक व्यवस्थित तरीके से लागू करने पर जोर दिया गया है। कंपल्सरी स्क्रूटनी का अर्थ उन मामलों से है जिनमें आयकर रिटर्न को जोखिम विश्लेषण के बजाय निर्धारित श्रेणियों के आधार पर अनिवार्य रूप से विस्तृत जांच के लिए चुना जाता है। यह प्रक्रिया कंप्यूटर-असिस्टेड स्क्रूटनी चयन प्रणाली (CASS) से अलग होती है, जहां डेटा एनालिटिक्स और जोखिम पैरामीटर के आधार पर चयन किया जाता है।

नए दिशानिर्देशों के तहत धारा 133A के अंतर्गत किए गए सर्वे मामलों को अनिवार्य स्क्रूटनी में शामिल किया जाएगा, बशर्ते वे 1 अप्रैल 2024 के बाद किए गए हों। इसी प्रकार धारा 132 और 132A के तहत आने वाले सर्च और रिक्विजिशन मामलों को भी अनिवार्य जांच के दायरे में रखा गया है। यदि ऐसे सर्च या रिक्विजिशन 1 सितंबर 2024 के बाद किए गए हैं, तो जांच केवल संबंधित आकलन वर्ष तक सीमित रहेगी। इन मामलों में चयन स्वतः प्रणाली के आधार पर किया जाएगा और किसी अतिरिक्त जोखिम मूल्यांकन की आवश्यकता नहीं होगी।

आयकर विभाग द्वारा चयनित मामलों में करदाताओं को धारा 143(2) के तहत नोटिस जारी किया जाएगा, जिसके बाद उन्हें अपने सभी आवश्यक दस्तावेज, वित्तीय रिकॉर्ड और स्पष्टीकरण ऑनलाइन प्रस्तुत करने होंगे। पूरी प्रक्रिया फेसलेस असेसमेंट प्रणाली के तहत संचालित की जाएगी, जिससे करदाता और अधिकारी के बीच प्रत्यक्ष संपर्क समाप्त हो जाता है और मूल्यांकन डिजिटल माध्यम से पूरा किया जाता है।

विभागीय सूत्रों के अनुसार, इस प्रणाली का मुख्य उद्देश्य कर जांच प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, तेज और तकनीकी रूप से सक्षम बनाना है। अधिकारियों का मानना है कि डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम के विस्तार से संदिग्ध वित्तीय गतिविधियों की पहचान पहले की तुलना में अधिक तेजी से और सटीक तरीके से की जा सकेगी।

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विशेषज्ञों का कहना है कि नए दिशानिर्देशों का व्यापक करदाताओं पर सीमित प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि यह मुख्य रूप से उन्हीं मामलों पर लागू होंगे जिनमें असामान्य लेनदेन या उच्च जोखिम संकेत पाए जाते हैं। सामान्य आयकर रिटर्न फाइल करने वाले छोटे और मध्यम करदाताओं पर इसका कोई विशेष अतिरिक्त दबाव नहीं पड़ेगा।

कर विशेषज्ञों के अनुसार, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा एनालिटिक्स के बढ़ते उपयोग से आयकर विभाग की क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इससे न केवल गलत या संदिग्ध रिटर्न की पहचान आसान हुई है, बल्कि अनावश्यक स्क्रूटनी मामलों की संख्या भी कम होने लगी है। इस बदलाव को कर प्रशासन में एक महत्वपूर्ण तकनीकी सुधार के रूप में देखा जा रहा है।

सरकारी सूत्रों के अनुसार, कंपल्सरी स्क्रूटनी के तहत आने वाले मामलों में करदाताओं को समय पर प्रतिक्रिया देना और सभी आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराना अनिवार्य होगा। किसी भी प्रकार की देरी या अधूरी जानकारी को गंभीरता से लिया जा सकता है, जिससे मूल्यांकन प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

विभाग ने यह भी संकेत दिया है कि भविष्य में तकनीकी सुधारों को और तेज किया जाएगा, जिससे जोखिम आधारित चयन प्रणाली और अधिक मजबूत और सटीक बन सके। कुल मिलाकर, नए दिशानिर्देश कर अनुपालन को मजबूत करने, कर चोरी पर रोक लगाने और राजस्व प्रणाली को अधिक पारदर्शी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माने जा रहे हैं।

अधिकारियों का मानना है कि इन सुधारों से न केवल जांच प्रक्रिया अधिक प्रभावी होगी, बल्कि लंबित मामलों में भी कमी आएगी और आयकर प्रशासन की समग्र दक्षता में सुधार देखने को मिलेगा।

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