मुंबई। बॉम्बे हाईकोर्ट ने मुंबई की एक स्लम पुनर्विकास परियोजना से जुड़े विवाद में एलएंडटी समूह की कंपनियों, अडानी समूह से जुड़ी एक कंपनी और अन्य पक्षों को बड़ा झटका देते हुए उनकी याचिकाएं खारिज कर दी हैं। अदालत ने कहा कि वाणिज्यिक मुकदमे को प्रारंभिक चरण में समाप्त कराने का प्रयास अनावश्यक था और इससे मामले के त्वरित निस्तारण में बाधा उत्पन्न हुई। इसी के साथ अदालत ने चार पक्षों पर ₹2-2 लाख का जुर्माना लगाया, जिससे कुल लागत ₹8 लाख हो गई।
मामला केएस चामणकर एंटरप्राइजेज और उसके साझेदार द्वारा दायर एक वाणिज्यिक मुकदमे से जुड़ा है। फर्म का आरोप है कि उसे एक महत्वपूर्ण स्लम पुनर्विकास परियोजना से हटाने के लिए सुनियोजित साजिश रची गई। वादी का दावा है कि उसे पहले तीन स्लम सोसायटियों के पुनर्विकास के लिए डेवलपर नियुक्त किया गया था और उसने पुनर्वास भवन का निर्माण भी कराया था। इसके बावजूद बाद में उसे परियोजना से बाहर कर दिया गया और उसकी जगह दूसरे डेवलपर को नियुक्त कर दिया गया।
FCRF Launches Chief AI Officer Certification to Build India’s AI Governance Leaders
फर्म ने अदालत में आरोप लगाया कि कुछ प्रभावशाली कंपनियों, मध्यस्थों और संबंधित अधिकारियों की मिलीभगत से उसे परियोजना से हटाया गया। मुकदमे में धोखाधड़ी, साजिश, दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई और परियोजना पर नियंत्रण हासिल करने के लिए कथित रूप से की गई मिलीभगत जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। फर्म का कहना है कि उसे हटाने की पूरी प्रक्रिया पूर्वनियोजित थी और इसका उद्देश्य परियोजना का नियंत्रण अन्य पक्षों को सौंपना था।
इस मुकदमे को चुनौती देते हुए एलएंडटी एशियन रियल्टी प्रोजेक्ट एलएलपी, एलएंडटी रियल्टी लिमिटेड, शिव इंफ्रा विजन प्राइवेट लिमिटेड, स्लम पुनर्वास प्राधिकरण (एसआरए) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी तथा अडानी समूह से जुड़ी कंपनी पोर्ट्समाउथ बिल्डकॉन प्राइवेट लिमिटेड सहित कई पक्षों ने अदालत में अलग-अलग आवेदन दायर किए थे। इन याचिकाओं में मुकदमे को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज करने की मांग की गई थी।
प्रतिवादियों का तर्क था कि वादी के पास मुकदमा दायर करने का पर्याप्त आधार नहीं है, मामला समयसीमा संबंधी कानूनी बाधाओं से प्रभावित है और वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम के तहत आवश्यक पूर्व-मध्यस्थता प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ कानूनी प्रावधानों के कारण मुकदमे की सुनवाई नहीं हो सकती।
हालांकि अदालत ने इन सभी दलीलों को खारिज कर दिया। न्यायालय ने कहा कि वादी द्वारा लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया सुनवाई योग्य हैं और मुकदमे में ऐसे कई तथ्यात्मक एवं कानूनी प्रश्न मौजूद हैं जिनका निर्णय केवल विस्तृत सुनवाई और साक्ष्यों के परीक्षण के बाद ही किया जा सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस स्तर पर मुकदमे को खारिज करना उचित नहीं होगा।
अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा कि स्थापित कानूनी सिद्धांतों के बावजूद प्रतिवादियों द्वारा कई तकनीकी आपत्तियां उठाई गईं और बड़ी संख्या में न्यायिक निर्णयों का हवाला देकर अदालत का काफी समय लिया गया। न्यायालय के अनुसार, इस प्रकार के प्रयास वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम के उस उद्देश्य के विपरीत हैं जिसका लक्ष्य मामलों का शीघ्र और प्रभावी निस्तारण सुनिश्चित करना है।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी माना कि समयसीमा, कानूनी बाधाओं और अन्य आपत्तियों से जुड़े प्रश्न ऐसे मुद्दे हैं जिनका निर्णय मुकदमे की पूर्ण सुनवाई के दौरान किया जाना चाहिए। इन्हें केवल प्रारंभिक स्तर पर तकनीकी आधार बनाकर मुकदमे को समाप्त करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह संदेश जाता है कि गंभीर आरोपों वाले मामलों में केवल तकनीकी आधारों पर मुकदमों को समाप्त कराने के प्रयासों को अदालतें आसानी से स्वीकार नहीं करेंगी। विशेष रूप से उन मामलों में जहां धोखाधड़ी, साजिश और प्रशासनिक मिलीभगत जैसे आरोप लगाए गए हों, अदालतें तथ्यों की गहराई से जांच को प्राथमिकता देती हैं।
अब इस मामले की नियमित सुनवाई आगे बढ़ेगी, जिसमें कथित धोखाधड़ी, डेवलपर परिवर्तन की प्रक्रिया, संबंधित संस्थाओं की भूमिका और परियोजना से जुड़े अन्य विवादित पहलुओं की विस्तार से जांच होगी। अदालत ने जुर्माना लगाए गए सभी पक्षों को दो सप्ताह के भीतर निर्धारित राशि जमा करने का निर्देश दिया है। यह मामला मुंबई की स्लम पुनर्विकास परियोजनाओं में पारदर्शिता, जवाबदेही और डेवलपर चयन प्रक्रियाओं को लेकर भी महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न खड़ा कर रहा है, जिस पर आने वाले समय में और गहन न्यायिक परीक्षण होने की संभावना है।
