केंद्र सरकार ने जन्म और मृत्यु के दो साल से अधिक विलंबित पंजीकरण के लिए न्यायिक मंजूरी अनिवार्य करने का प्रस्ताव रखा है।

जन्म-मृत्यु के विलंबित पंजीकरण पर केंद्र सरकार सख्त: दो साल से अधिक देरी वाले मामलों में न्यायिक मंजूरी का प्रस्ताव

Team The420
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नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने जन्म और मृत्यु के विलंबित पंजीकरण की प्रक्रिया को और अधिक सख्त बनाने के लिए जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026 का मसौदा तैयार किया है। प्रस्तावित संशोधन के तहत जन्म या मृत्यु की घटना के दो वर्ष से अधिक समय बाद किए जाने वाले पंजीकरण के लिए अब प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट (Judicial Magistrate First Class) की अनुमति अनिवार्य करने का प्रस्ताव है। सरकार का उद्देश्य नागरिक पंजीकरण प्रणाली की विश्वसनीयता बढ़ाना और फर्जी या अत्यधिक विलंबित पंजीकरण पर रोक लगाना है।

संसद सदस्यों के बीच प्रसारित किए गए इस विधेयक को जल्द ही संसद में पेश किए जाने की संभावना है। प्रस्तावित संशोधन के अनुसार, विलंबित पंजीकरण की मौजूदा व्यवस्था में व्यापक बदलाव किए जाएंगे, ताकि जन्म और मृत्यु की समय पर सूचना देने को प्रोत्साहन मिले तथा लंबे समय बाद किए जाने वाले आवेदनों की अधिक गहन जांच हो सके।

वर्तमान में जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 के तहत यदि किसी जन्म या मृत्यु का पंजीकरण एक वर्ष से अधिक देरी से कराया जाता है, तो इसके लिए जिला मजिस्ट्रेट (DM), उपखंड मजिस्ट्रेट (SDM) या कार्यपालक मजिस्ट्रेट के आदेश की आवश्यकता होती है।

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प्रस्तावित संशोधन में देरी की अवधि के आधार पर दो-स्तरीय स्वीकृति प्रणाली लागू करने का प्रावधान किया गया है। यदि जन्म या मृत्यु की सूचना एक से दो वर्ष के भीतर दी जाती है, तो मौजूदा व्यवस्था जारी रहेगी और संबंधित क्षेत्राधिकार वाले जिला मजिस्ट्रेट, उपखंड मजिस्ट्रेट या कार्यपालक मजिस्ट्रेट की अनुमति आवश्यक होगी।

हालांकि, यदि पंजीकरण दो वर्ष से अधिक विलंब से कराया जाता है, तो मामले की जांच और स्वीकृति केवल प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश पर ही संभव होगी। इससे अत्यधिक विलंबित मामलों में स्वीकृति का अधिकार कार्यपालिका से न्यायपालिका के पास स्थानांतरित हो जाएगा और जांच का स्तर अधिक कड़ा हो जाएगा।

विधेयक में यह भी प्रस्तावित किया गया है कि संबंधित प्राधिकारी अनुमति देने से पहले जन्म या मृत्यु से संबंधित तथ्यों की सत्यता का अनिवार्य रूप से सत्यापन करेगा। इसके अलावा, विलंबित पंजीकरण के लिए निर्धारित शुल्क भी देना होगा, जिसकी राशि अधिनियम के तहत बनाए जाने वाले नियमों के माध्यम से अधिसूचित की जाएगी।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार का उद्देश्य फर्जी जन्म और मृत्यु प्रमाणपत्रों की संभावना को कम करना है, जबकि वास्तविक कारणों से देरी से आवेदन करने वाले लोगों के लिए कानूनी व्यवस्था भी बनी रहेगी। उनके अनुसार, प्रस्तावित संशोधन सार्वभौमिक पंजीकरण सुनिश्चित करने और प्रणाली के दुरुपयोग को रोकने के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास है।

जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 के तहत जन्म और मृत्यु का पंजीकरण अनिवार्य है तथा इनके आधार पर जारी प्रमाणपत्र महत्वपूर्ण कानूनी दस्तावेज माने जाते हैं। जन्म प्रमाणपत्र स्कूल में प्रवेश, आधार नामांकन, पासपोर्ट, मतदाता पंजीकरण, उत्तराधिकार दावे और विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए आवश्यक होता है।

इसी प्रकार, मृत्यु प्रमाणपत्र उत्तराधिकार संबंधी मामलों, बीमा दावों, पेंशन लाभ, संपत्ति हस्तांतरण, बैंक खातों के निपटान तथा सरकारी अभिलेखों को अद्यतन करने जैसी कई कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के लिए अनिवार्य दस्तावेज है।

विधेयक के साथ संलग्न उद्देश्य एवं कारण विवरण में भी कहा गया है कि अधिनियम के तहत जारी जन्म और मृत्यु प्रमाणपत्र किसी व्यक्ति के जन्म या मृत्यु के वैधानिक रूप से स्वीकार्य प्रमाण होते हैं। सरकार का मानना है कि प्रस्तावित संशोधन से नागरिक पंजीकरण प्रणाली अधिक पारदर्शी, विश्वसनीय और दुरुपयोग से सुरक्षित बनेगी।

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