लखनऊ: हजारों करोड़ रुपये के कथित जीएसटी घोटाले में मास्टरमाइंड भगवान सिंह उर्फ भूरा प्रधान की गिरफ्तारी के बाद जांच अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिख रही है। विशेष जांच दल (SIT) को आरोपी के कब्जे से मिले डिजिटल उपकरणों ने ऐसे चौंकाने वाले साक्ष्य सामने रखे हैं, जिनसे विभागीय स्तर पर हड़कंप मच गया है। जांच का फोकस अब उन अधिकारियों और कर्मचारियों पर है, जिन पर इस पूरे नेटवर्क को संरक्षण देने का आरोप है।
प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि यह सिंडिकेट किसी एक राज्य तक सीमित नहीं था, बल्कि अंतरराज्यीय स्तर पर फैला हुआ था। कई जिलों की पहचान की गई है, जहां यह नेटवर्क सक्रिय रूप से काम कर रहा था और स्थानीय स्तर पर अधिकारियों के साथ इसकी सीधी सांठगांठ थी। आरोपी का मूल ठिकाना मथुरा जिले का हताना (कोसीकलां) बताया जा रहा है, जिसे पूरे ऑपरेशन का कंट्रोल सेंटर माना जा रहा है।
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SIT को मिले डिजिटल साक्ष्यों में व्हाट्सएप चैट, कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) और अन्य इलेक्ट्रॉनिक डेटा शामिल हैं, जिनके आधार पर अब संदिग्ध अधिकारियों की भूमिका की गहन पड़ताल की जा रही है। सूत्रों के अनुसार, इन चैट्स में रिश्वत के लेनदेन के लिए कोड वर्ड्स का इस्तेमाल किया जाता था, ताकि सीधे तौर पर किसी वित्तीय लेनदेन का उल्लेख न हो। जांच में यह भी सामने आया है कि ट्रकों को बिना जांच या कार्रवाई के छोड़ने के लिए प्रति ट्रक ₹20,000 से ₹30,000 तक की तय दर थी।
सबसे चौंकाने वाला खुलासा करीब ₹250 करोड़ रुपये के कथित ‘सुविधा शुल्क’ का है, जिसे वर्षों के दौरान विभिन्न अधिकारियों और कर्मचारियों में बांटे जाने की बात सामने आई है। आरोपी के मोबाइल फोन से 20 से अधिक वरिष्ठ जीएसटी अधिकारियों के संपर्क नंबर और उनके साथ हुई बातचीत के रिकॉर्ड बरामद किए गए हैं। अब इन सभी संपर्कों की फॉरेंसिक जांच कर उनकी भूमिका तय की जा रही है।
छापेमारी के दौरान 535 फर्जी फर्मों से जुड़े दस्तावेज भी जब्त किए गए हैं, जिनका कुल टर्नओवर ₹5,473 करोड़ से अधिक दर्शाया गया था। जांच में करीब ₹989 करोड़ की जीएसटी चोरी और अवैध इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) क्लेम के प्रमाण भी सामने आए हैं। इन फर्जी कंपनियों के जरिए टैक्स सिस्टम में बड़े पैमाने पर हेराफेरी की गई, जिससे सरकारी राजस्व को भारी नुकसान पहुंचा।
सूत्र बताते हैं कि भूरा प्रधान लंबे समय तक जांच एजेंसियों से बचने के लिए अत्याधुनिक तकनीकी तरीकों का इस्तेमाल करता रहा। वह लंदन आधारित वर्चुअल नंबर का उपयोग करता था, जिससे उसकी वास्तविक लोकेशन ट्रेस करना बेहद मुश्किल हो जाता था। इसके अलावा, एन्क्रिप्टेड व्हाट्सएप चैट के जरिए वह नेटवर्क के सदस्यों और कथित रूप से जुड़े अधिकारियों से संपर्क बनाए रखता था और निर्देश देता था।
जांच एजेंसियां अब पिछले दस वर्षों के दौरान इस नेटवर्क से जुड़े सभी संदिग्ध लेनदेन की पड़ताल कर रही हैं। डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर एक विस्तृत सूची तैयार की जा रही है, जिसमें उन सभी व्यक्तियों के नाम शामिल हैं, जिन्होंने इस कथित घोटाले से लाभ उठाया। इस सूची का मिलान बैंकिंग ट्रांजेक्शन, कॉल रिकॉर्ड और अन्य तकनीकी साक्ष्यों से किया जा रहा है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए विभागीय स्तर पर बड़े पैमाने पर कार्रवाई की तैयारी है। जिन अधिकारियों के नाम सामने आए हैं, उनके खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई के साथ-साथ आपराधिक मुकदमे दर्ज किए जाने की भी संभावना है।
इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि टैक्स प्रशासन में तकनीकी खामियों और अंदरूनी मिलीभगत का फायदा उठाकर किस तरह बड़े स्तर पर घोटालों को अंजाम दिया जा सकता है। आने वाले दिनों में SIT की जांच से और भी बड़े खुलासे होने की उम्मीद जताई जा रही है।
