BHU में प्रोफेसर अमित रस्तोगी ने आरोप लगाया है कि रेजिडेंट डॉक्टरों ने फ्रैक्चर उपचार से जुड़े उनके शोधपत्र से उनका नाम हटाकर उसे अपने नाम से प्रकाशित कराया।

BHU में रिसर्च ऑथरशिप विवाद: प्रोफेसर का दावा—रेजिडेंट डॉक्टरों ने नाम हटाकर अपने नाम से प्रकाशित कराया शोधपत्र

Team The420
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वाराणसी। शैक्षणिक और चिकित्सा अनुसंधान जगत में शोध की विश्वसनीयता को लेकर एक नया विवाद सामने आया है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के ट्रॉमा सेंटर स्थित ऑर्थोपेडिक्स विभाग में एक शोधपत्र की ऑथरशिप को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। विभाग के वरिष्ठ चिकित्सक और शोधकर्ता प्रो. अमित रस्तोगी ने आरोप लगाया है कि उनके द्वारा किए गए शोधकार्य को विभाग के कुछ रेजिडेंट डॉक्टरों ने उनका नाम हटाकर अपने नाम से एक वैज्ञानिक जर्नल में प्रकाशित करा लिया। मामले के सामने आने के बाद संस्थान स्तर पर जांच शुरू कर दी गई है और संबंधित शोधपत्र को वापस लेने की प्रक्रिया भी प्रारंभ कर दी गई है।

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विवाद फ्रैक्चर उपचार और उससे संबंधित चिकित्सीय प्रक्रियाओं पर किए गए एक शोध से जुड़ा है। प्रो. अमित रस्तोगी का कहना है कि उन्होंने इस विषय पर विस्तृत अध्ययन और शोध कार्य किया था। उसी अवधि में विभाग का एक सीनियर रेजिडेंट अपनी शैक्षणिक थीसिस तैयार कर रहा था। आरोप है कि शोध कार्य पूरा होने के बाद संबंधित रेजिडेंट और उसके सहयोगियों ने उसी अध्ययन को वैज्ञानिक जर्नल में अपने नाम से प्रकाशित करा दिया, जबकि मूल शोधकर्ता और उनके योगदान का उल्लेख नहीं किया गया।

प्रोफेसर का कहना है कि उन्हें इस प्रकाशन की जानकारी सीधे तौर पर नहीं मिली थी। बाद में कुछ शुभचिंतकों और अकादमिक सहयोगियों ने उन्हें बताया कि उनके शोध से संबंधित सामग्री एक जर्नल में प्रकाशित हो चुकी है। जब उन्होंने प्रकाशित शोधपत्र का अध्ययन किया तो पाया कि उसमें उनका नाम शामिल नहीं था। इसके बाद उन्होंने मामले पर आपत्ति दर्ज कराते हुए संस्थान के संबंधित अधिकारियों को शिकायत सौंपी।

शोध और अकादमिक प्रकाशनों में ऑथरशिप का मुद्दा अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। अंतरराष्ट्रीय शोध मानकों के अनुसार किसी भी वैज्ञानिक अध्ययन में वास्तविक बौद्धिक, तकनीकी या विश्लेषणात्मक योगदान देने वाले व्यक्तियों को उचित श्रेय दिया जाना आवश्यक होता है। यदि किसी शोधकर्ता के योगदान को जानबूझकर नजरअंदाज किया जाता है या उसका नाम हटाकर किसी अन्य व्यक्ति का नाम जोड़ा जाता है, तो इसे शोध नैतिकता के गंभीर उल्लंघन के रूप में देखा जाता है।

मामले की शिकायत मिलने के बाद संस्थान प्रशासन ने इसे गंभीरता से लिया है। आईएमएस-बीएचयू के डीन रिसर्च प्रो. मनोज पांडेय ने शिकायत प्राप्त होने की पुष्टि करते हुए इसे आगे की कार्रवाई के लिए संबंधित प्रशासनिक स्तर पर भेज दिया है। वहीं संस्थान के निदेशक प्रो. एस.एन. शंखवार ने भी स्वीकार किया है कि मामले की जांच चल रही है और अंतिम रिपोर्ट आने के बाद स्थिति स्पष्ट होगी। जांच के दौरान यह देखा जाएगा कि शोध के विभिन्न चरणों में किसका कितना योगदान था और प्रकाशन प्रक्रिया में स्थापित नियमों का पालन किया गया या नहीं।

सूत्रों के अनुसार, यदि आरोप प्रथम दृष्टया सही पाए जाते हैं तो संबंधित वैज्ञानिक जर्नल को औपचारिक रूप से पत्र भेजकर विवादित शोधपत्र को वापस लेने या रिट्रैक्ट करने का अनुरोध किया जा सकता है। अकादमिक जगत में किसी शोधपत्र का रिट्रैक्शन एक गंभीर कार्रवाई मानी जाती है, जो आमतौर पर शोध नैतिकता के उल्लंघन, डेटा संबंधी त्रुटियों या ऑथरशिप विवादों के मामलों में की जाती है।

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पिछले एक वर्ष के दौरान आईएमएस-बीएचयू में शोध कार्यों से जुड़े कई विवाद सामने आ चुके हैं। संस्थान में सात शोधपत्रों पर आपत्तियां दर्ज की गई थीं, जिनमें से तीन को संबंधित जर्नलों द्वारा वापस लेना पड़ा। इनमें साहित्यिक चोरी, शोध चित्रों पर आपत्तियां और पुराने डेटा के कथित दुरुपयोग जैसे आरोप शामिल थे। इन घटनाओं ने शोध गुणवत्ता और निगरानी तंत्र को लेकर भी सवाल खड़े किए थे।

विशेषज्ञों का मानना है कि उच्च शिक्षण और चिकित्सा संस्थानों में शोध की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए ऑथरशिप, डेटा प्रबंधन और प्रकाशन प्रक्रिया से जुड़े नियमों का कड़ाई से पालन आवश्यक है। फिलहाल बीएचयू प्रशासन की जांच पर सभी की नजरें टिकी हैं, क्योंकि उसके निष्कर्ष न केवल इस विवादित शोधपत्र का भविष्य तय करेंगे बल्कि संस्थान में शोध नैतिकता को लेकर आगे की दिशा भी निर्धारित कर सकते हैं।

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