बेंगलुरु में साइबर ठगी का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां 60 वर्षीय गृहिणी को “डिजिटल अरेस्ट” के नाम पर दो महीने तक मानसिक दबाव में रखकर ₹98.4 लाख की ठगी कर ली गई। आरोपियों ने खुद को दिल्ली पुलिस और साइबर क्राइम यूनिट के अधिकारी बताकर महिला को मनी लॉन्ड्रिंग मामले में फंसाने का डर दिखाया और धीरे-धीरे उसकी पूरी बचत हड़प ली।
मामला बेंगलुरु के बोम्मनहल्ली क्षेत्र का है, जहां पीड़िता ने 5 जून को अपने परिजनों को पूरी घटना बताई, जिसके बाद साइबर क्राइम पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई।
शिकायत के अनुसार, 18 मार्च को महिला को एक अनजान नंबर से कॉल आया। कॉलर ने खुद को दिल्ली पुलिस का अधिकारी बताया और बाद में व्हाट्सएप के जरिए उसे “DCP भीष्म सिंह” नाम के व्यक्ति से जोड़ा गया।
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इसके बाद ठगों ने दावा किया कि महिला के पहचान दस्तावेजों का उपयोग मनी लॉन्ड्रिंग केस में किया गया है और उसके खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज हैं। उन्होंने यहां तक धमकी दी कि उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट से गिरफ्तारी वारंट जारी हो चुका है।
डर और मानसिक दबाव बनाने के लिए आरोपियों ने महिला को लगातार निगरानी में रहने की बात कही और उसकी दिनभर की गतिविधियों की जानकारी लेते रहे। एक अन्य आरोपी “रवि कुमार” नाम से व्हाट्सएप पर लगातार संपर्क में रहा और खुद को जांच टीम का हिस्सा बताता रहा।
जांच के नाम पर ठगों ने महिला को यह विश्वास दिलाया कि उसके बैंक खातों को “वेरिफाई” करना जरूरी है और उसे सभी धनराशि बताए गए खातों में ट्रांसफर करनी होगी, जिसे बाद में वापस कर दिया जाएगा।
भयभीत होकर महिला ने अपने बैंक खातों से बड़ी रकम अलग-अलग ट्रांजेक्शन के जरिए ट्रांसफर कर दी। बाद में आरोपियों ने उसे अतिरिक्त धन जुटाने के लिए अपने सोने के गहने गिरवी रखने के लिए भी मजबूर किया, जिसे भी ठगों के बताए खातों में भेज दिया गया।
पूरे दो महीनों में महिला से कुल ₹98.4 लाख की ठगी की गई।
घटना सामने आने के बाद परिवार ने तुरंत पुलिस को सूचना दी और साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज कराया गया।
पुलिस ने बताया कि यह मामला “डिजिटल अरेस्ट” स्कैम का हिस्सा है, जिसमें अपराधी खुद को कानून प्रवर्तन एजेंसी का अधिकारी बताकर पीड़ित को मानसिक रूप से नियंत्रित करते हैं और लगातार डर व दबाव बनाकर पैसे ट्रांसफर कराते हैं।
साइबर क्राइम पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता और आईटी एक्ट की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। शुरुआती जांच में यह भी सामने आया है कि यह एक संगठित साइबर फ्रॉड नेटवर्क है, जो कॉल, व्हाट्सएप और वीडियो कॉल के जरिए लोगों को फंसाता है और म्यूल अकाउंट्स के जरिए रकम को कई परतों में ट्रांसफर करता है ताकि ट्रेल छिपाई जा सके।
विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में अपराधी पीड़ित को पूरी तरह अलग-थलग कर देते हैं, जिससे वे मानसिक दबाव में आकर किसी से सलाह नहीं ले पाते।
इस बीच साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व IPS अधिकारी प्रोफेसर त्रिवेणी सिंह ने कहा कि ऐसे “डिजिटल अरेस्ट” मामलों में अपराधी सबसे पहले भय का माहौल बनाते हैं और फिर पीड़ित को लगातार निगरानी में रखकर निर्णय लेने की क्षमता कमजोर कर देते हैं। उन्होंने कहा कि कोई भी सरकारी एजेंसी कभी भी व्हाट्सएप या कॉल पर पैसे ट्रांसफर करने या गुप्त जांच के नाम पर दबाव नहीं डालती, इसलिए ऐसे किसी भी कॉल को तुरंत संदेह की नजर से देखना चाहिए।
पुलिस अब उन बैंक खातों, मोबाइल नंबरों और डिजिटल ट्रांजेक्शन की जांच कर रही है जिनका उपयोग इस ठगी में किया गया। साथ ही म्यूल अकाउंट नेटवर्क को भी ट्रेस किया जा रहा है।
अधिकारियों ने लोगों से अपील की है कि किसी भी अनजान कॉल, वीडियो कॉल या मैसेज पर खुद को पुलिस या जांच एजेंसी का अधिकारी बताने वाले व्यक्ति पर भरोसा न करें और किसी भी स्थिति में पैसे ट्रांसफर न करें।
पिछले कुछ समय में देशभर में “डिजिटल अरेस्ट” स्कैम के मामलों में तेजी देखी गई है, जहां अपराधी नकली गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर लोगों से बड़ी रकम वसूल रहे हैं।
फिलहाल मामले की जांच जारी है और साइबर पुलिस ने जल्द ही आरोपियों की पहचान कर गिरफ्तारी की संभावना जताई है।
यह घटना एक बार फिर दिखाती है कि साइबर अपराधी किस तरह तकनीक, मनोवैज्ञानिक दबाव और झूठे अधिकार का इस्तेमाल कर लोगों को निशाना बना रहे हैं, जिससे डिजिटल सतर्कता और जागरूकता बेहद जरूरी हो गई है।
