व्हाट्सएप वीडियो कॉल पर खुद को NIA अधिकारी बताकर गिरफ्तारी की धमकी दी, RBI में सत्यापन के नाम पर कराई रकम ट्रांसफर; कंपनी के एमडी की पहचान और फोटो का भी दुरुपयोग, पुलिस ने शुरू की जांच

फर्जी NIA गिरफ्तारी वारंट दिखाकर ₹3.2 लाख की साइबर ठगी: बेंगलुरु में निजी कंपनी के कर्मचारी को बनाया ‘डिजिटल अरेस्ट’ का शिकार

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By Roopa
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बेंगलुरु: कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में डिजिटल अरेस्ट से जुड़ी साइबर ठगी का एक और मामला सामने आया है। एक निजी कंपनी में वेयरहाउस इंचार्ज के पद पर कार्यरत 46 वर्षीय कर्मचारी से खुद को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) का अधिकारी बताने वाले साइबर ठगों ने गिरफ्तारी वारंट का डर दिखाकर ₹3.2 लाख की ठगी कर ली। आरोपियों ने व्हाट्सएप वीडियो कॉल के जरिए पीड़ित को यह विश्वास दिलाया कि उसके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी हो चुका है और तत्काल कार्रवाई से बचने के लिए उसे निर्धारित राशि जमा करनी होगी। बाद में जब पीड़ित ने अपने कार्यालय के प्रबंध निदेशक (एमडी) को पूरी घटना बताई, तब उसे एहसास हुआ कि वह साइबर ठगी का शिकार बन चुका है।

पुलिस में दर्ज शिकायत के अनुसार, घटना 1 अगस्त की है। पीड़ित को लगातार कई व्हाट्सएप वीडियो कॉल आए। कॉल करने वाले व्यक्ति ने अपना नाम वी. कुमार बताते हुए दावा किया कि वह NIA शाखा का अधिकारी है। उसने कहा कि पीड़ित का नाम एक गंभीर मामले में सामने आया है और उसके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया जा चुका है। आरोपी ने गिरफ्तारी से बचने के लिए तत्काल निर्देशों का पालन करने का दबाव बनाया।

शिकायत में कहा गया है कि ठगों ने पीड़ित को लगातार मानसिक दबाव में रखा और विश्वास दिलाया कि यदि उसने तुरंत ₹3.2 लाख जमा नहीं किए तो उसे गिरफ्तार कर लिया जाएगा। भय और घबराहट के माहौल में पीड़ित ने बताए गए बैंक खाते में पूरी राशि ट्रांसफर कर दी।

रकम स्थानांतरित होने के बाद आरोपियों ने पीड़ित को भरोसा दिलाया कि यह धनराशि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के पास सत्यापन के लिए जमा की जा रही है और जांच पूरी होने के 24 घंटे के भीतर पूरी रकम वापस कर दी जाएगी। इसी झूठे आश्वासन के कारण पीड़ित को कुछ समय तक किसी धोखाधड़ी का संदेह नहीं हुआ।

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हालांकि, बाद में जब उसने अपने कार्यालय के प्रबंध निदेशक को पूरी घटना की जानकारी दी, तो उन्हें तुरंत समझ में आ गया कि यह डिजिटल अरेस्ट से जुड़ी साइबर ठगी है। इसके बाद पीड़ित ने राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 पर संपर्क किया, जहां उसकी शिकायत दर्ज की गई और उसे स्थानीय पुलिस में औपचारिक शिकायत दर्ज कराने की सलाह दी गई।

पीड़ित ने अपनी शिकायत में यह भी आरोप लगाया कि साइबर ठगों ने उसके कंपनी के प्रबंध निदेशक की फोटो और पहचान का भी दुरुपयोग किया। इससे आशंका जताई जा रही है कि आरोपियों ने सोशल मीडिया या अन्य सार्वजनिक स्रोतों से कंपनी से जुड़ी जानकारी जुटाकर ठगी की पूरी साजिश को अधिक विश्वसनीय बनाने की कोशिश की।

पुलिस ने मामला दर्ज कर धनराशि के लेनदेन, बैंक खातों, मोबाइल नंबरों, व्हाट्सएप कॉल रिकॉर्ड और अन्य डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर जांच शुरू कर दी है। अधिकारियों का कहना है कि लेनदेन की श्रृंखला का विश्लेषण कर यह पता लगाया जा रहा है कि ठगी की रकम किन खातों में भेजी गई और उसके बाद उसे किस प्रकार आगे स्थानांतरित किया गया।

प्रख्यात साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह का कहना है कि डिजिटल अरेस्ट गिरोह लोगों में भय पैदा कर तत्काल निर्णय लेने के लिए मजबूर करते हैं। कोई भी केंद्रीय जांच एजेंसी या कानून प्रवर्तन संस्था व्हाट्सएप वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी वारंट दिखाकर धनराशि जमा कराने का निर्देश नहीं देती। यदि कोई व्यक्ति खुद को NIA, CBI, ED, पुलिस या किसी अन्य सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर बैंक खाते में पैसे जमा कराने या जांच के नाम पर रकम ट्रांसफर करने को कहे, तो ऐसे दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करनी चाहिए और तुरंत राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन 1930 या साइबर क्राइम पोर्टल पर शिकायत दर्ज करानी चाहिए। विशेषज्ञों के अनुसार, सतर्कता और समय पर शिकायत ही इस तरह की साइबर ठगी से बचाव का सबसे प्रभावी उपाय है।

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