फर्जी अधिकारियों ने मनी लॉन्ड्रिंग केस में फंसाने की धमकी देकर कराया ट्रांसफर; कई खातों में पैसा भेजवाकर रचा गया हाई-टेक साइबर जाल

‘डिजिटल अरेस्ट’ का खौफ, ₹15 करोड़ की ठगी: बेलगावी के कारोबारी को वीडियो कॉल पर बना लिया शिकार

Roopa
By Roopa
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बेलगावी। कर्नाटक के बेलगावी में “डिजिटल अरेस्ट” के नाम पर साइबर ठगी का एक बड़ा और चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां एक बुजुर्ग कारोबारी से करीब ₹15 करोड़ की ठगी कर ली गई। यह मामला दर्शाता है कि किस तरह साइबर अपराधी अब तकनीक और मनोवैज्ञानिक दबाव का इस्तेमाल कर लोगों को बड़े पैमाने पर निशाना बना रहे हैं।

जानकारी के मुताबिक, पीड़ित कारोबारी को एक वीडियो कॉल आया, जिसमें कॉल करने वालों ने खुद को सरकारी अधिकारी बताया। उन्होंने दावा किया कि कारोबारी का बैंक खाता मनी लॉन्ड्रिंग जैसे गंभीर अपराध में शामिल पाया गया है और उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की तैयारी चल रही है। अचानक मिले इस आरोप और गिरफ्तारी की धमकी से कारोबारी बुरी तरह घबरा गया।

ठगों ने पूरे घटनाक्रम को बेहद पेशेवर तरीके से अंजाम दिया। वीडियो कॉल के दौरान उन्होंने खुद को जांच एजेंसी का अधिकारी बताते हुए कारोबारी को “डिजिटल अरेस्ट” में होने का दावा किया। उसे निर्देश दिया गया कि वह कॉल डिस्कनेक्ट न करे और जांच पूरी होने तक सहयोग करे। इसी दौरान उससे कहा गया कि उसकी संपत्ति और बैंक खातों की जांच के लिए कुछ रकम “वेरिफिकेशन” के तौर पर अलग-अलग खातों में ट्रांसफर करनी होगी।

डर और मानसिक दबाव में आए कारोबारी ने ठगों की बातों पर भरोसा कर लिया और कई किस्तों में बड़ी रकम अलग-अलग बैंक खातों में ट्रांसफर कर दी। ठग लगातार यह भरोसा दिलाते रहे कि जांच पूरी होने के बाद पूरी रकम वापस कर दी जाएगी। लेकिन कुछ समय बाद जब संपर्क टूट गया, तब कारोबारी को एहसास हुआ कि वह एक बड़े साइबर फ्रॉड का शिकार हो चुका है।

मामले की शिकायत दर्ज होने के बाद जांच शुरू की गई। शुरुआती कार्रवाई में कई संदिग्ध बैंक खातों को चिन्हित कर फ्रीज किया गया है, जिनमें से एक खाते में करीब ₹90 लाख की राशि भी पाई गई है। इससे संकेत मिलता है कि ठगी की रकम को तेजी से अलग-अलग खातों में घुमाया गया।

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जांच एजेंसियों को आशंका है कि इस पूरे नेटवर्क के तार देश के बाहर तक जुड़े हो सकते हैं। साइबर अपराधी अक्सर फर्जी कॉल सेंटर, वीओआईपी नंबर और डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर अपनी पहचान छिपाते हैं और पीड़ित को भ्रमित करते हैं।

इस तरह के मामलों में “डिजिटल अरेस्ट” एक नया ट्रेंड बनकर उभरा है, जिसमें ठग खुद को पुलिस, सीबीआई या अन्य एजेंसियों का अधिकारी बताकर लोगों को घंटों तक वीडियो कॉल पर रोके रखते हैं। इस दौरान पीड़ित को मानसिक रूप से इतना दबाव में डाल दिया जाता है कि वह बिना सोचे-समझे पैसे ट्रांसफर कर देता है।

प्रसिद्ध साइबर क्राइम विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, “साइबर अपराधी सोशल इंजीनियरिंग का इस्तेमाल कर लोगों के मन में डर पैदा करते हैं। ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं है, लेकिन ठग इसे सच साबित करने के लिए नकली दस्तावेज और फर्जी पहचान का सहारा लेते हैं।”

विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में सबसे जरूरी है सतर्क रहना और किसी भी अनजान कॉल या संदेश पर तुरंत प्रतिक्रिया देने से बचना। कोई भी वैध एजेंसी कभी भी फोन या वीडियो कॉल पर पैसे ट्रांसफर करने के लिए नहीं कहती।

लोगों को सलाह दी गई है कि यदि इस तरह का कोई कॉल आए तो घबराएं नहीं, तुरंत कॉल काट दें और संबंधित बैंक या आधिकारिक हेल्पलाइन नंबर पर संपर्क करें। साथ ही, किसी भी स्थिति में अपनी निजी जानकारी, बैंक डिटेल, ओटीपी या पहचान संबंधी दस्तावेज साझा न करें।

यह मामला एक बार फिर चेतावनी देता है कि डिजिटल युग में अपराध के तरीके बदल चुके हैं, और सतर्कता ही सबसे बड़ा बचाव है।

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