जयपुर: बैंक ऑफ महाराष्ट्र में धोखाधड़ी से लोन मंजूर कर सरकारी बैंक को करीब ₹3.61 करोड़ का नुकसान पहुंचाने के मामले में जयपुर की विशेष सीबीआई अदालत ने पूर्व शाखा प्रबंधक समेत तीन आरोपियों को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई है। अदालत ने गोपालपुरा बाईपास शाखा के तत्कालीन शाखा प्रबंधक राम भरोसे मीना को सात साल के कठोर कारावास और ₹2.60 लाख के जुर्माने की सजा दी। मामले में शामिल दो निजी आरोपियों दीप राम मीना और वीर सिंह मीना को तीन-तीन साल के कठोर कारावास के साथ ₹25-25 हजार का जुर्माना लगाया गया।
सीबीआई के अनुसार, मामला बैंक ऑफ महाराष्ट्र की जयपुर स्थित गोपालपुरा बाईपास शाखा में वर्ष 2015 के दौरान कथित तौर पर की गई वित्तीय अनियमितताओं से जुड़ा है। आरोप था कि तत्कालीन शाखा प्रबंधक राम भरोसे मीना ने दो निजी व्यक्तियों दीप राम मीना और वीर सिंह मीना के साथ मिलकर आपराधिक साजिश रची और बैंक नियमों को दरकिनार करते हुए कई खातों में ऋण स्वीकृत किए।
जांच एजेंसी के मुताबिक, यह कथित धोखाधड़ी 15 जनवरी 2015 से 6 मई 2015 के बीच की गई। इस अवधि में कुल 17 खातों में ऋण मंजूर किए गए। जांच में आरोप लगाया गया कि इन ऋणों को स्वीकृत करते समय निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। कई मामलों में उचित ऋण आवेदन, जरूरी दस्तावेज और पर्याप्त सिक्योरिटी उपलब्ध नहीं थी। इसके बावजूद बैंक की ओर से ऋण राशि जारी कर दी गई।
सीबीआई ने आरोप लगाया था कि बैंक में अपने पद का इस्तेमाल करते हुए राम भरोसे मीना ने ऋण स्वीकृति की प्रक्रिया को प्रभावित किया। दोनों निजी आरोपियों पर भी इस कथित साजिश में सहयोग करने और अवैध तरीके से ऋण हासिल करने में भूमिका निभाने का आरोप लगाया गया। जांच एजेंसी का दावा था कि आरोपियों ने दस्तावेजों और बैंकिंग प्रक्रिया में हेरफेर का सहारा लेकर ऋण वितरण कराया, जिससे बैंक को लगभग ₹3.61 करोड़ का वित्तीय नुकसान हुआ।
मामले की शुरुआत बैंक ऑफ महाराष्ट्र के जयपुर क्षेत्रीय कार्यालय की शिकायत से हुई थी। 9 नवंबर 2016 को शिकायत के आधार पर सीबीआई ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की। जांच के दौरान बैंक रिकॉर्ड, ऋण खातों से संबंधित दस्तावेज और अन्य साक्ष्यों की पड़ताल की गई। जांच पूरी होने के बाद सीबीआई ने 30 मार्च 2019 को राम भरोसे मीना, दीप राम मीना और वीर सिंह मीना के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया।
इसके बाद न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ी और विशेष सीबीआई अदालत ने 1 दिसंबर 2021 को तीनों आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए। आरोप तय होने के बाद मामले में सुनवाई शुरू हुई। अभियोजन पक्ष की ओर से पेश किए गए साक्ष्यों और दस्तावेजों की अदालत में जांच की गई। बचाव पक्ष ने भी अपने तर्क रखे और आरोपों का विरोध किया।
करीब एक दशक तक चली जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद बुधवार, 12 अगस्त 2026 को विशेष सीबीआई अदालत ने तीनों आरोपियों को दोषी ठहराया। अदालत ने मामले में उपलब्ध साक्ष्यों और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद पूर्व शाखा प्रबंधक राम भरोसे मीना को सात साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। इसके अलावा उन पर ₹2.60 लाख का जुर्माना लगाया गया।
वहीं, दीप राम मीना और वीर सिंह मीना को तीन-तीन साल के कठोर कारावास की सजा मिली। दोनों पर ₹25-25 हजार का जुर्माना भी लगाया गया। अदालत का फैसला बैंकिंग व्यवस्था में पद के दुरुपयोग और निर्धारित प्रक्रियाओं को दरकिनार कर ऋण मंजूर करने के मामलों में न्यायिक कार्रवाई के तौर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
यह मामला वर्ष 2015 में कथित रूप से किए गए ऋण घोटाले से शुरू होकर 2016 में एफआईआर, 2019 में आरोपपत्र और 2021 में आरोप तय होने के बाद आखिरकार 2026 में सजा तक पहुंचा। फैसले ने यह भी स्पष्ट किया कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक में ऋण स्वीकृति से जुड़ी प्रक्रियाओं में कथित अनियमितता और मिलीभगत के आरोपों पर लंबी जांच के बाद दोष साबित होने पर कठोर सजा हो सकती है।
