बांदा (उत्तर प्रदेश): उत्तर प्रदेश पुलिस ने चार लोगों को कथित रूप से क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय (RTO), उपजिलाधिकारी (SDM) और खनन विभाग के अधिकारी बनकर विभिन्न जिलों में वाहन चालकों से अवैध वसूली करने के आरोप में गिरफ्तार किया है। पुलिस का दावा है कि आरोपी ट्रक, डंपर और ई-रिक्शा चालकों को सरकारी कार्रवाई का भय दिखाकर उनसे नकदी वसूलते थे। मामले में व्यापक जांच जारी है।
पुलिस के अनुसार, कार्रवाई एक ई-रिक्शा चालक द्वारा दी गई सूचना के आधार पर की गई। चालक ने पुलिस को बताया कि मवई बाईपास क्षेत्र में कार सवार कुछ लोग स्वयं को सरकारी अधिकारी बताकर वाहन चालकों से कथित रूप से अवैध वसूली कर रहे हैं। सूचना मिलने के बाद पुलिस ने घेराबंदी कर वाहन को रोका और चार संदिग्धों को हिरासत में ले लिया।
गिरफ्तार आरोपियों की पहचान मध्य प्रदेश के रीवा निवासी सौरभ तथा उत्तर प्रदेश के चित्रकूट निवासी कमल, राजकुमार और संतोष कुमार के रूप में हुई है।
पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से कथित तौर पर वसूली में प्रयुक्त कार, ₹5,400 नकद, एक लैपटॉप, चार मोबाइल फोन तथा संदिग्ध फर्जी सरकारी दस्तावेजों से संबंधित एक फाइल बरामद करने का दावा किया है। मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संबंधित धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज कर आगे की विवेचना शुरू कर दी गई है।
जांच एजेंसियों के अनुसार, प्रारंभिक पूछताछ में आरोपियों ने कथित रूप से स्वीकार किया कि वे उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में इसी तरीके से वाहन चालकों को निशाना बनाते थे। पुलिस का आरोप है कि आरोपी सुनसान मार्गों और राजमार्गों पर खड़े होकर ट्रक, डंपर, ओवरलोड वाहनों और ई-रिक्शा चालकों को रोकते थे तथा स्वयं को RTO, SDM या खनन विभाग का अधिकारी बताकर कार्रवाई की धमकी देते थे।
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पुलिस का दावा है कि आरोपी मोबाइल फोन से वाहन और चालक की तस्वीरें लेते थे तथा लैपटॉप की सहायता से कथित फर्जी चालान या अन्य दस्तावेज तैयार कर वाहन जब्त करने अथवा भारी जुर्माना लगाने का भय दिखाते थे। जांचकर्ताओं के अनुसार, कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए कई चालक मौके पर ही नकद राशि दे देते थे, जिसे आरोपी आपस में बांट लेते थे।
जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि क्या यह गिरोह अन्य जिलों में दर्ज समान घटनाओं में भी शामिल रहा है। जब्त इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, डिजिटल रिकॉर्ड और बरामद दस्तावेजों का फोरेंसिक विश्लेषण कर संभावित पीड़ितों, अन्य सहयोगियों और पूरे कथित नेटवर्क की पहचान करने का प्रयास किया जा रहा है।
पुलिस यह भी जांच कर रही है कि बरामद दस्तावेज विशेष रूप से सरकारी अधिकारियों का प्रतिरूपण करने के उद्देश्य से तैयार किए गए थे या नहीं। साथ ही पड़ोसी जिलों की पुलिस से समन्वय कर पुराने मामलों का मिलान किया जा रहा है ताकि इस गिरोह की संभावित संलिप्तता की पुष्टि की जा सके।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, सरकारी अधिकारी बनकर प्रतिरूपण करना, फर्जी दस्तावेजों का उपयोग करना और जबरन वसूली करना गंभीर आपराधिक अपराध हैं, यदि आरोप साक्ष्यों से सिद्ध होते हैं। हालांकि केवल गिरफ्तारी, बरामदगी या पुलिस के आरोप किसी व्यक्ति का अपराध सिद्ध नहीं करते। अंतिम निर्णय न्यायालय उपलब्ध दस्तावेजी, डिजिटल और मौखिक साक्ष्यों के आधार पर करेगा तथा सभी आरोपी कानून के तहत दोष सिद्ध होने तक निर्दोष माने जाएंगे।
पुलिस का कहना है कि मामले की जांच जारी है। यदि विवेचना के दौरान नए साक्ष्य, अतिरिक्त पीड़ित या अन्य सहयोगियों की संलिप्तता सामने आती है, तो कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी।
