बॉम्बे हाई कोर्ट ने मंगलवार को उद्योगपति अनिल अंबानी को ब्लैक मनी एक्ट से जुड़े एक मामले में बड़ी राहत देते हुए अंतरिम सुरक्षा प्रदान की है। अदालत ने निर्देश दिया है कि याचिका के अंतिम निपटारे तक उनके खिलाफ किसी भी तरह की जबरन कार्रवाई, अभियोजन या दंडात्मक कदम नहीं उठाए जाएंगे।
यह आदेश न्यायमूर्ति बी.पी. कोलाबावाला और न्यायमूर्ति फिरदौस पूनावाला की खंडपीठ ने दिया। अदालत ने यह भी संज्ञान लिया कि इसी कानून की विभिन्न धाराओं को चुनौती देने वाली अन्य याचिकाएं पहले से ही हाई कोर्ट में लंबित हैं।
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अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह अनिल अंबानी की याचिका पर अपना विस्तृत जवाब दाखिल करे। मामले की अंतिम सुनवाई बाद में निर्धारित की जाएगी।
अदालत में पेश विवरण के अनुसार, आयकर विभाग द्वारा अनिल अंबानी के खिलाफ पहले ही एक मूल्यांकन आदेश पारित किया जा चुका है। इसके खिलाफ उन्होंने आयकर अपीलीय आयुक्त के समक्ष अपील भी दायर की है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये वैधानिक कार्यवाही जारी रह सकती है, लेकिन इस दौरान किसी भी प्रकार की दंडात्मक या जबरन कार्रवाई नहीं की जाएगी।
यह मामला आयकर विभाग के उन आरोपों से जुड़ा है, जिनमें कहा गया है कि अनिल अंबानी ने अपने आयकर रिटर्न में विदेशी संपत्तियों और बैंक खातों का खुलासा नहीं किया। अगस्त 2022 में जारी नोटिस में लगभग ₹420 करोड़ की टैक्स चोरी का आरोप लगाया गया था, जो स्विट्जरलैंड के दो बैंक खातों में मौजूद ₹814 करोड़ से अधिक की कथित अघोषित विदेशी संपत्तियों से जुड़ा है।
विभाग ने यह भी दावा किया है कि अनिल अंबानी का कुछ विदेशी संस्थाओं में लाभकारी स्वामित्व था, जिनमें बहामास स्थित एक ट्रस्ट और ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स में पंजीकृत एक कंपनी शामिल है। आरोप है कि इन संपत्तियों को कानून के तहत अनिवार्य रूप से घोषित नहीं किया गया।
आयकर विभाग के अनुसार, इस मामले में कुल अघोषित विदेशी धन ₹814 करोड़ से अधिक है और उस पर लगभग ₹420 करोड़ कर देयता बनती है। विभाग ने ब्लैक मनी एक्ट के तहत सख्त धाराओं में कार्रवाई शुरू की है, जिनमें जानबूझकर विदेशी संपत्तियों का खुलासा न करने पर कठोर दंड और कारावास का प्रावधान है।
हालांकि, अनिल अंबानी ने हाई कोर्ट में दायर याचिका में ब्लैक मनी एक्ट की कुछ धाराओं की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है। उनका तर्क है कि 2015 में लागू यह कानून उन कथित लेनदेन पर लागू नहीं हो सकता जो 2006–07 और 2010–11 के मूल्यांकन वर्षों से संबंधित हैं।
याचिका में यह भी कहा गया है कि ऐसे मामलों में कानून को पूर्वव्यापी रूप से लागू करना संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है और यह विधायी शक्ति का अतिक्रमण है। इसी आधार पर उन्होंने पूरी कार्यवाही रद्द करने की मांग की है।
हाई कोर्ट ने प्रारंभिक सुनवाई के बाद कहा कि चूंकि इसी तरह के मुद्दों पर पहले से ही याचिकाएं लंबित हैं, इसलिए इस मामले को भी उन्हीं के साथ सुना जाएगा। अदालत ने इस स्तर पर मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की।
अदालत के इस अंतरिम आदेश का प्रभाव यह हुआ है कि अब अंतिम निर्णय तक अनिल अंबानी के खिलाफ कोई तत्काल दंडात्मक कदम नहीं उठाया जा सकेगा। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में अदालतें अक्सर तब राहत देती हैं जब कानून की संवैधानिकता स्वयं जांच के दायरे में हो।
केंद्र सरकार को अब इस याचिका पर अपना जवाब दाखिल करना होगा, जिसके बाद मामले की विस्तृत सुनवाई आगे बढ़ेगी।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह ब्लैक मनी एक्ट की व्याख्या और पूर्वव्यापी लागू होने के सवाल से जुड़ा है, जिसका असर कई अन्य लंबित मामलों पर भी पड़ सकता है।
फिलहाल, हाई कोर्ट की अंतरिम राहत ने अनिल अंबानी को बड़ी राहत दी है और मामले की अगली सुनवाई तक स्थिति यथास्थिति बनी रहेगी।
