धोखाधड़ी मामले में न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के बाद पूर्व अमेठी नगर पंचायत चेयरपर्सन चंद्रमा देवी।

पूर्व अमेठी नगर पंचायत चेयरपर्सन चंद्रमा देवी को धोखाधड़ी मामले में न्यायिक हिरासत में भेजा गया

Team The420
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सुलतानपुर: स्थानीय अदालत ने शुक्रवार को पूर्व अमेठी नगर पंचायत चेयरपर्सन चंद्रमा देवी को एक धोखाधड़ी मामले में न्यायिक हिरासत में भेज दिया। अदालत ने उनकी नियमित जमानत याचिका की सुनवाई के लिए 30 मार्च की तारीख तय की है।

अधिकारियों के अनुसार, चंद्रमा देवी को हिरासत में भेजने के बाद उनके स्वास्थ्य के मद्देनजर जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया है। मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. आर.के. मिश्रा ने पुष्टि की कि उन्हें चिकित्सकीय निगरानी में रखा गया है।

इससे पहले, उनकी अंतरिम जमानत याचिका अस्वीकृत कर दी गई थी। अधिवक्ता अरविंद सिंह राजा ने अदालत में यह तर्क दिया कि चंद्रमा देवी की तबीयत गंभीर है और उन्हें उचित चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जानी चाहिए। वहीं शिकायतकर्ता के वकील अज़ीज़ुर्रहमान और जिला सरकारी वकील राम अचल मिश्रा ने जमानत का विरोध किया।

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चंद्रमा देवी, जो जिले के पंचायत अध्यक्ष राजेश अग्रहरी की पत्नी हैं, ने उच्च न्यायालय के निर्देशानुसार गुरुवार को ACJM कार्यालय में आत्मसमर्पण किया। उनकी जमानत याचिका पहले वहां खारिज कर दी गई थी, जिसके बाद मामला जिला न्यायाधीश की अदालत में प्रस्तुत किया गया।

मामला एक शिकायत पर आधारित है, जिसे अमेठी के स्थानीय व्यापार नेता घनश्याम सोनी ने दर्ज कराया था। शिकायत में आरोप है कि चंद्रमा देवी ने अपने कार्यकाल के दौरान उनके मकान का नाम धोखाधड़ी से लल्लू प्रसाद सोनी, लालजी सोनी, पुजारी लाल सोनी और संगम लाल सोनी के नाम करवा दिया।

शिकायतकर्ता ने दावा किया कि संपत्ति के हस्तांतरण के लिए एक फर्जी प्रमाणपत्र जारी किया गया था। अदालत ने सभी आरोपियों को 8 फरवरी 2024 के लिए परीक्षण के लिए तलब किया था।

वहीं, रक्षा पक्ष का कहना है कि ऐसे प्रमाणपत्र नगर पंचायत के कार्यकारी अधिकारी द्वारा ही जारी किए जाते हैं, न कि चेयरपर्सन द्वारा। उनका दावा है कि चंद्रमा देवी को राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के कारण गलत तरीके से फंसाया गया है।

चंद्रमा देवी की हिरासत और अस्पताल में भर्ती ने इस मामले की गंभीरता को और बढ़ा दिया है। अधिकारियों का कहना है कि अदालत और प्रशासन दोनों ही स्वास्थ्य और कानूनी प्रक्रिया का संतुलन सुनिश्चित कर रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामले न केवल स्थानीय प्रशासन और राजनीतिक तंत्र की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हैं, बल्कि नागरिकों के विश्वास और संपत्ति अधिकारों की सुरक्षा के लिए भी चुनौतीपूर्ण साबित होते हैं।

जांच के दौरान अदालत ने सभी संबंधित दस्तावेजों और हस्ताक्षरों की सत्यता की पुष्टि करने के लिए आदेश जारी किए हैं। आगे की सुनवाई में अदालत यह तय करेगी कि आरोप सिद्ध होते हैं या नहीं और आवश्यकतानुसार आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

यह घटना उस संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है जब स्थानीय निकायों में भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी की शिकायतें बढ़ रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के मामलों में राजनीतिक प्रभाव, दस्तावेजों की जाँच और न्यायिक हस्तक्षेप आवश्यक होते हैं ताकि नागरिकों के अधिकार सुरक्षित रह सकें।

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