सहमति से लिव-इन संबंध में रह रहे वयस्क जोड़े को सुरक्षा देने का निर्देश देता इलाहाबाद हाईकोर्ट।

शादीशुदा पुरुष के साथ सहमति से लिव-इन रिश्ता अपराध नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Team The420
4 Min Read

प्रयागराज:  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि कोई शादीशुदा पुरुष किसी वयस्क महिला के साथ उसकी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रहता है, तो इसे आपराधिक अपराध नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में कानून और सामाजिक नैतिकता को अलग-अलग रखना जरूरी है।

यह टिप्पणी उस समय आई जब कोर्ट शाहजहांपुर के एक जोड़े द्वारा दायर आपराधिक रिट याचिका पर सुनवाई कर रहा था। याचिका में जोड़े ने अपने खिलाफ दर्ज पुलिस केस को रद्द करने और परिवार से मिल रही कथित धमकियों से सुरक्षा की मांग की थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वे दोनों वयस्क हैं और अपनी मर्जी से साथ रह रहे हैं।

“कानून और सामाजिक नैतिकता अलग-अलग हैं”

डिवीजन बेंच ने साफ कहा कि अगर कोई संबंध कानून के तहत अपराध नहीं है, तो समाज की नैतिक धारणाओं के आधार पर उसे अपराध नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने कहा कि न्यायिक निर्णय केवल कानूनी प्रावधानों के आधार पर होने चाहिए, न कि सामाजिक या व्यक्तिगत मान्यताओं के प्रभाव में।

FCRF Launches Premier CISO Certification Amid Rising Demand for Cybersecurity Leadership

अपहरण के आरोप को जोड़े ने बताया गलत

मामले की शुरुआत शाहजहांपुर के जैतीपुर थाने में दर्ज एक एफआईआर से हुई थी। महिला की मां ने आरोप लगाया था कि एक शादीशुदा व्यक्ति ने उसकी 18 वर्षीय बेटी का अपहरण कर उसे शादी के लिए मजबूर किया है।

हालांकि, हाईकोर्ट में दाखिल याचिका में जोड़े ने इन आरोपों को गलत बताया। महिला ने अदालत को बताया कि वह अपनी इच्छा से उस व्यक्ति के साथ रह रही है। उसने यह भी कहा कि परिवार से जान का खतरा होने के चलते उसने पहले पुलिस अधिकारियों से संपर्क किया था, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

पुलिस को सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश

अदालत ने कहा कि दो वयस्क यदि अपनी मर्जी से साथ रह रहे हैं, तो उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना पुलिस की जिम्मेदारी है। कोर्ट ने शाहजहांपुर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिया कि वे जोड़े की सुरक्षा सुनिश्चित करें और इसके लिए उन्हें व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया गया।

साथ ही अदालत ने महिला के परिवार के सदस्यों को निर्देश दिया कि वे जोड़े को किसी भी तरह की हानि न पहुंचाएं और न ही सीधे या परोक्ष रूप से उनसे संपर्क करें। अदालत ने यह भी आदेश दिया कि अगली सुनवाई तक याचिकाकर्ताओं की गिरफ्तारी नहीं की जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला

अपने आदेश में हाईकोर्ट ने Shakti Vahini vs Union of India मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें ऑनर किलिंग रोकने और वयस्कों की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश दिए गए थे। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में प्रशासन की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।

8 अप्रैल को अगली सुनवाई

मामले की अगली सुनवाई 8 अप्रैल को तय की गई है। अदालत ने राज्य पक्ष और महिला के परिवार को अपना पक्ष रखने के लिए समय दिया है।

कुल मिलाकर, यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता और वयस्कों के बीच सहमति से बने संबंधों को कानूनी संरक्षण देने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। अदालत ने दोहराया कि न्यायपालिका का काम कानून के तहत मौलिक अधिकारों की रक्षा करना है, न कि सामाजिक नैतिकता के आधार पर निर्णय देना।

हमसे जुड़ें

Share This Article