प्रयागराज (उत्तर प्रदेश): इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि किसी व्यक्ति ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सरकारी नौकरी प्राप्त की है, तो ऐसी नियुक्ति शुरू से ही अवैध (Void Ab Initio) मानी जाएगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में सेवा समाप्त करने से पहले विस्तृत विभागीय जांच (Departmental Inquiry) कराना आवश्यक नहीं है। हालांकि, प्रत्येक मामले का निर्णय उसके तथ्यों और लागू कानून के आधार पर किया जाएगा।
खंडपीठ ने यह टिप्पणी उत्तर प्रदेश सरकार की विशेष अपील स्वीकार करते हुए की और वर्ष 2008 में एकलपीठ द्वारा पारित आदेश को निरस्त कर दिया। इसके साथ ही वर्ष 2007 में मुरादाबाद मंडल कारागार के वरिष्ठ अधीक्षक द्वारा बंदी रक्षक रणवीर सिंह की सेवा समाप्त करने के आदेश को बरकरार रखा।
अदालत के समक्ष प्रस्तुत अभिलेखों के अनुसार, रणवीर सिंह की नियुक्ति वर्ष 1992 में अनुसूचित जनजाति (ST) आरक्षण श्रेणी के अंतर्गत हुई थी। वर्ष 2007 में नियुक्ति संबंधी दस्तावेजों के सत्यापन के दौरान संबंधित जाति प्रमाणपत्र की जांच कराई गई, जिसमें जिला प्रशासन ने उसे फर्जी बताया। इसके बाद संबंधित कर्मचारी को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया और उसकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं। साथ ही उसके विरुद्ध आपराधिक मामला भी दर्ज किया गया।
इस कार्रवाई को कर्मचारी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। एकलपीठ ने वर्ष 2008 में सेवा समाप्ति का आदेश रद्द करते हुए कहा था कि नियुक्ति के लगभग 15–16 वर्ष बाद कार्रवाई की गई और विभागीय जांच नहीं कराई गई। एकलपीठ ने आरक्षण संबंधी पहलुओं पर भी टिप्पणी की थी। इसके विरुद्ध राज्य सरकार ने विशेष अपील दायर की।
खंडपीठ ने अपने निर्णय में कहा कि कर्मचारी ने कभी भी उस जांच रिपोर्ट को चुनौती नहीं दी, जिसमें उसका जाति प्रमाणपत्र फर्जी पाया गया था। न्यायालय ने कहा कि यदि नियुक्ति धोखाधड़ी या जाली दस्तावेजों के आधार पर प्राप्त की गई हो, तो वह कानून की दृष्टि में प्रारंभ से ही अस्तित्वहीन मानी जाएगी। ऐसे मामलों में विस्तृत विभागीय जांच की आवश्यकता नहीं होती और कारण बताओ नोटिस देकर भी कार्रवाई की जा सकती है।
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अपील लंबित रहने के दौरान कर्मचारी द्वारा किए गए कार्य के बदले जो वेतन और अन्य वैध भुगतान प्राप्त हुए हैं, उनकी वसूली नहीं की जाएगी।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह निर्णय उन मामलों में महत्वपूर्ण है जहां सरकारी नियुक्ति फर्जी प्रमाणपत्र, जाली दस्तावेज या धोखाधड़ी के आधार पर प्राप्त करने का आरोप हो। उनका कहना है कि अदालत ने यह सिद्धांत दोहराया है कि यदि नियुक्ति की नींव ही अवैध हो, तो ऐसी नियुक्ति को नियमित सेवा सुरक्षा का लाभ नहीं मिल सकता। साथ ही, प्रत्येक मामले में तथ्यों, उपलब्ध साक्ष्यों और संबंधित वैधानिक प्रावधानों का स्वतंत्र मूल्यांकन आवश्यक रहेगा।
विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि यह फैसला सभी सरकारी कर्मचारियों पर समान रूप से स्वतः लागू नहीं माना जा सकता। जिन मामलों में दस्तावेजों की प्रामाणिकता, धोखाधड़ी या अन्य विवादित तथ्य जांच के अधीन हों, वहां न्यायालय परिस्थितियों के अनुसार अलग दृष्टिकोण अपना सकता है।
यह निर्णय फर्जी प्रमाणपत्रों के आधार पर सरकारी सेवाओं में नियुक्ति से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल माना जा रहा है और भविष्य में ऐसे मामलों के निपटारे में मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में उद्धृत किया जा सकता है।
