प्रयागराज: साइबर अपराधों की जांच में लंबे समय से उठ रहे विवादों के बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम और दूरगामी असर वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि अब पुलिस या कोई भी जांच एजेंसी किसी व्यक्ति का पूरा बैंक खाता फ्रीज नहीं कर सकेगी। केवल उसी रकम पर रोक लगाई जाएगी, जिसके साइबर अपराध से जुड़े होने का स्पष्ट और ठोस आधार हो। बाकी वैध राशि का इस्तेमाल खाताधारक सामान्य रूप से कर सकेगा।
यह फैसला ऐसे समय आया है जब देशभर में डिजिटल अरेस्ट, ऑनलाइन निवेश ठगी और फिशिंग जैसे मामलों में तेजी आई है, और जांच एजेंसियां संदिग्ध लेनदेन के आधार पर पूरे खाते सीज कर रही थीं। इससे आम नागरिकों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था, क्योंकि वे अपनी ही मेहनत की कमाई तक नहीं पहुंच पा रहे थे।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि बिना पूर्व सूचना किसी व्यक्ति का बैंक खाता फ्रीज करना न केवल अनुचित है, बल्कि यह उसके आजीविका और वित्तीय अधिकारों का उल्लंघन भी है। अदालत ने माना कि इस तरह की कार्रवाई से व्यक्ति की दैनिक जिंदगी और व्यवसायिक गतिविधियां ठप हो जाती हैं, जो न्यायसंगत नहीं है।
यह आदेश कई याचिकाओं की सुनवाई के दौरान आया, जिनमें खाताधारकों ने आरोप लगाया था कि उनके खातों को बिना किसी स्पष्ट कारण, बिना एफआईआर और बिना सूचना के अनिश्चितकाल के लिए फ्रीज कर दिया गया। अदालत ने इन दलीलों को गंभीरता से लेते हुए पाया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा-106 के प्रावधानों का कई मामलों में गलत तरीके से उपयोग किया जा रहा है।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि जब भी पुलिस या कोई जांच एजेंसी बैंक को खाते पर रोक लगाने का आदेश देगी, तो उसे लिखित रूप में उस सटीक राशि का उल्लेख करना होगा, जो संदिग्ध है। साथ ही खाताधारक को इसकी जानकारी देना भी अनिवार्य होगा, ताकि वह कानूनी रूप से अपनी बात रख सके। इसके अलावा, खाताधारक को यह अधिकार भी दिया गया है कि वह संबंधित क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन देकर खाते को डीफ्रीज कराने की मांग कर सकता है।
अदालत ने बैंकों को भी सख्त निर्देश दिए हैं कि वे इस आदेश की प्रति मिलने के एक सप्ताह के भीतर ऐसे सभी खातों का संचालन बहाल करें, जो याचिकाओं के दायरे में आते हैं। हालांकि, जिन राशियों पर स्पष्ट संदेह है, उन्हें ही फ्रीज रखा जाएगा।
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इस फैसले में अदालत ने एक और महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि असंज्ञेय अपराधों में केवल पुलिस रिपोर्ट के आधार पर मजिस्ट्रेट द्वारा समन जारी करना कानूनन गलत है। ऐसे मामलों में विधिसम्मत प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है। एक मामले में अदालत ने मजिस्ट्रेट द्वारा जारी समन को रद्द करते हुए नए सिरे से आदेश पारित करने के निर्देश दिए।
साइबर अपराध विशेषज्ञों ने इस फैसले को संतुलित और समय की जरूरत बताया है। प्रसिद्ध साइबर क्राइम विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने कहा, “साइबर अपराधों की जांच में तेजी जरूरी है, लेकिन इसके नाम पर आम नागरिकों के वैध अधिकारों को बाधित करना उचित नहीं है। यह फैसला जांच एजेंसियों को जवाबदेह बनाता है और सुनिश्चित करता है कि केवल संदिग्ध राशि पर ही कार्रवाई हो, न कि पूरे खाते पर।”
उन्होंने यह भी कहा कि हाल के वर्षों में साइबर ठग ‘म्यूल अकाउंट’ का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसमें अनजान या लालच में आए लोगों के खातों का उपयोग किया जाता है। ऐसे में जांच एजेंसियों के लिए जरूरी है कि वे तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर सटीक कार्रवाई करें, न कि व्यापक और मनमानी रोक लगाएं।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भविष्य में साइबर जांच के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा। इससे न केवल जांच प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और जवाबदेह होगी, बल्कि आम नागरिकों को भी राहत मिलेगी, जो अब तक बिना किसी स्पष्ट कारण के अपने बैंक खातों तक पहुंच से वंचित हो जाते थे।
हाईकोर्ट के इस फैसले को डिजिटल युग में कानून और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
