नई दिल्ली: प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने शुक्रवार को Al Falah ग्रुप के चेयरमैन जवाद अहमद सिद्दीकी को दिल्ली में 45 करोड़ रुपये मूल्य की जमीन के कथित धोखाधड़ी मामले में गिरफ्तार किया। अधिकारियों ने बताया कि यह मामला “फर्जी दस्तावेज़ों” के जरिए संपत्ति के अधिग्रहण से जुड़ा है।
ED ने कहा कि जांच में सामने आया है कि इस जमीन के अधिग्रहण के लिए फर्जी दस्तावेज़ तैयार किए गए और उनका इस्तेमाल किया गया। जवाद अहमद सिद्दीकी, जो Tarbia Education Foundation के निदेशक और मुख्य शेयरहोल्डर हैं, को प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA), 2002 की धाराओं के तहत गिरफ्तार किया गया।
एजेंसी के अनुसार, जवाद अहमद सिद्दीकी ने विभिन्न अन्य व्यक्तियों के साथ मिलकर यह फर्जी दस्तावेज़ तैयार कर जमीन अधिग्रहित करने की योजना बनाई। यह जमीन खंड नंबर 792, गांव मदनपुर खदर, नई दिल्ली, जिसका क्षेत्रफल 1.146 एकड़ है, वर्तमान में लगभग 45 करोड़ रुपये मूल्य की है।
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जवाद अहमद सिद्दीकी को स्थानीय अदालत में पेश किया गया, जहाँ से उन्हें 4 अप्रैल तक ED की हिरासत में भेजा गया है ताकि उनके खिलाफ पूछताछ पूरी की जा सके।
फेडरल जांच एजेंसी ने कहा कि दस्तावेज़ों में उल्लिखित लेनदेन राशि केवल 75 लाख रुपये दिख रही है, जबकि वास्तविक राशि इससे कहीं अधिक पाई गई है। जांच अब भी जारी है और एजेंसी ने कहा कि पूरी धनराशि की ट्रैकिंग और अन्य लाभार्थियों तथा अधिग्रहित संपत्तियों की पहचान करने के प्रयास जारी हैं।
याद रहे कि 19 नवंबर 2025 को भी ED ने सिद्दीकी को पहले गिरफ्तार किया था। उस समय मामला Al Falah यूनिवर्सिटी की प्रमुख संस्थाओं द्वारा कथित धोखाधड़ी, वित्तीय अनियमितताओं और मान्यता दस्तावेज़ों में फर्जीवाड़े से जुड़ा था। उस केस की नींव दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच द्वारा दर्ज दो शिकायतों पर आधारित थी।
अंतरिम जांच में यह भी सामने आया कि Faridabad के Dhouj स्थित विश्वविद्यालय पर अधिक जांच की आवश्यकता थी, क्योंकि 10 नवंबर को दिल्ली के लाल किले के पास हुए ब्लास्ट मामले में कुछ डॉक्टरों की गिरफ्तारी हुई थी। इस ब्लास्ट में 15 लोगों की मौत हुई थी और कई घायल हुए थे। ED ने इस संदर्भ में भी यूनिवर्सिटी से जुड़े लोगों की भूमिका की जांच की थी।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रकार के मामलों में धन शोधन, फर्जी दस्तावेज़, और संपत्ति अधिग्रहण में धोखाधड़ी के पैटर्न आम हो गए हैं। उच्च शिक्षा संस्थाओं के शीर्ष अधिकारियों की संलिप्तता मामले को और गंभीर बनाती है।
ED ने इस मामले में पूरी तरह से सक्रिय भूमिका निभाते हुए हिरासत में लिए गए आरोपियों से धन के स्रोत, संबंधित संपत्तियों और अन्य संभावित लाभार्थियों की पहचान करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। अधिकारियों का कहना है कि इस मामले की गहन जांच के दौरान कोई भी कानूनी लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
अभियोजन अधिकारियों ने बताया कि आगे की जांच में यह भी देखना होगा कि विश्वविद्यालय की अन्य संस्थाओं और अधिकारियों का इस फर्जीवाड़े में कोई हाथ तो नहीं था। जांच के आधार पर ही आगे और गिरफ्तारी या कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
इस घटना ने शिक्षा संस्थानों में वित्तीय पारदर्शिता और संपत्ति अधिग्रहण के प्रबंधन की अनिवार्यता पर एक बार फिर से सवाल खड़े कर दिए हैं। ऐसे मामलों से न केवल संस्थानों की विश्वसनीयता पर असर पड़ता है, बल्कि सार्वजनिक विश्वास और कानून व्यवस्था की दिशा में भी चुनौती पैदा होती है।
