भारत में साइबर अपराध एक लाख पार

AI से फर्जी पहचान का खतरा बढ़ा, नकली ID से जुड़े सर्च में 3,826% उछाल

Roopa
By Roopa
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नई दिल्ली: जनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के तेजी से प्रसार ने पहचान संबंधी धोखाधड़ी का खतरा बढ़ा दिया है। “AI identity fraud” से जुड़े वैश्विक ऑनलाइन सर्च में पिछले एक साल में 3,826% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है और ऐसे सर्च की संख्या करीब 14,000 प्रति माह तक पहुंच गई है। पिछले तीन महीनों में भी इस तरह की खोज में 24% की अतिरिक्त वृद्धि हुई है। यह रुझान बताता है कि AI आधारित उपकरणों की आसान उपलब्धता ने नकली पहचान और फर्जी दस्तावेज तैयार करने की बाधा को काफी कम कर दिया है।

पहले नकली पहचान दस्तावेज तैयार करने के लिए तकनीकी जानकारी, विशेष उपकरण और काफी समय की जरूरत होती थी। अब जनरेटिव AI और आसानी से उपलब्ध डिजिटल टूल्स के कारण कम तकनीकी क्षमता वाले लोग भी ऐसे दस्तावेज तैयार करने की कोशिश कर सकते हैं, जो पहली नजर में वास्तविक दिखाई दें। इससे पारंपरिक पहचान जांच की कमजोरियां सामने आ रही हैं, खासकर उन जगहों पर जहां कर्मचारी कुछ सेकंड में ID देखकर निर्णय लेते हैं।

पांच सेकंड की जांच अब पर्याप्त नहीं

रिटेल, हॉस्पिटैलिटी और मनोरंजन जैसे क्षेत्रों में कर्मचारियों को अक्सर ग्राहक की पहचान या उम्र की पुष्टि तेजी से करनी होती है। भीड़, ग्राहकों का दबाव और कम समय में निर्णय लेने की जरूरत के कारण केवल दस्तावेज देखकर उसकी वास्तविकता का अनुमान लगाना मुश्किल हो सकता है।

AI की मदद से तैयार किए गए नकली दस्तावेज इस समस्या को और गंभीर बना रहे हैं। ऐसी परिस्थितियों में केवल यह देखना कि ID देखने में असली लग रही है या नहीं, पर्याप्त सुरक्षा उपाय नहीं माना जा सकता।

सिंथेटिक पहचान भी बढ़ा रही चुनौती

AI आधारित धोखाधड़ी केवल नकली दस्तावेजों तक सीमित नहीं है। अपराधी चोरी की वास्तविक व्यक्तिगत जानकारी को फर्जी विवरण के साथ जोड़कर सिंथेटिक पहचान तैयार कर सकते हैं। ऐसी पहचान अलग-अलग सत्यापन प्रक्रियाओं में वास्तविक व्यक्ति जैसी दिखाई दे सकती है।

इससे बैंकिंग, वित्तीय सेवाओं, भर्ती, रियल एस्टेट, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में जोखिम बढ़ रहा है। रिमोट भर्ती के दौरान कंपनियां उम्मीदवारों के दस्तावेज डिजिटल रूप में प्राप्त करती हैं और कई बार आमने-सामने मुलाकात के बिना ही प्रक्रिया पूरी कर देती हैं। ऐसे मामलों में यह सुनिश्चित करना कठिन हो सकता है कि प्रस्तुत दस्तावेज वास्तव में उसी व्यक्ति का है।

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हर ग्राहक पर समान जांच से बढ़ सकता है दबाव

बढ़ते खतरे के बीच कंपनियों के सामने चुनौती यह है कि सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करते समय वैध ग्राहकों के लिए प्रक्रिया अनावश्यक रूप से जटिल न हो। प्रत्येक ग्राहक से एक जैसी अतिरिक्त जानकारी या कई स्तर की जांच कराने से सेवा में देरी और ग्राहक अनुभव पर असर पड़ सकता है।

इसलिए जोखिम आधारित पहचान सत्यापन मॉडल को अधिक प्रभावी विकल्प माना जा रहा है। इसमें सामान्य और कम जोखिम वाले मामलों में सरल प्रक्रिया रखी जाती है, जबकि संदिग्ध गतिविधि या अधिक जोखिम वाले मामलों में अतिरिक्त सत्यापन लागू किया जाता है।

चिप, UV और MRZ से दस्तावेज की जांच

डिजिटल पहचान सत्यापन में केवल ID की तस्वीर देखने के बजाय दस्तावेज की वास्तविक सुरक्षा विशेषताओं की जांच महत्वपूर्ण हो सकती है। आधुनिक सत्यापन प्रणालियां दस्तावेज में मौजूद चिप, UV और IR विशेषताओं तथा MRZ जैसे डेटा क्षेत्रों की जांच कर सकती हैं।

इसके बाद जोखिम के स्तर के आधार पर लिवनेस डिटेक्शन और बायोमेट्रिक मिलान जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है। लिवनेस जांच यह पता लगाने में मदद करती है कि सत्यापन प्रक्रिया के सामने वास्तविक व्यक्ति मौजूद है, जबकि बायोमेट्रिक मिलान उस व्यक्ति की पहचान को संबंधित दस्तावेज या रिकॉर्ड से जोड़ने में मदद करता है।

विशेषज्ञ बोले- AI ने पहचान धोखाधड़ी का तरीका बदला

प्रख्यात साइबर क्राइम विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने कहा कि AI के कारण फर्जी पहचान तैयार करने की लागत और तकनीकी बाधाएं कम हुई हैं। पहले जालसाजों को दस्तावेजों की नकल तैयार करने के लिए विशेष कौशल की जरूरत होती थी, लेकिन अब AI आधारित उपकरण नकली सामग्री को अधिक विश्वसनीय बनाने में मदद कर सकते हैं।

उन्होंने कहा कि केवल दस्तावेज देखकर पहचान की पुष्टि करने वाली व्यवस्था अब पर्याप्त नहीं है। कंपनियों को दस्तावेज की तकनीकी विशेषताओं, व्यक्ति की वास्तविक मौजूदगी, बायोमेट्रिक मिलान और लेनदेन या व्यवहार से जुड़े संकेतों को एक साथ देखने वाली व्यवस्था विकसित करनी चाहिए। साथ ही, जोखिम कम होने पर ग्राहक प्रक्रिया सरल और जोखिम बढ़ने पर जांच अधिक सख्त रखनी चाहिए।

व्यवहार आधारित संकेत भी होंगे महत्वपूर्ण

कंपनियां पहचान सत्यापन के साथ ग्राहक के व्यवहार और पिछली गतिविधियों से जुड़े संकेतों का इस्तेमाल भी कर सकती हैं। किसी खाते या ग्राहक की गतिविधि सामान्य पैटर्न से अलग दिखाई देने पर अतिरिक्त जांच शुरू की जा सकती है।

इस व्यवस्था में मानव कर्मचारियों की भूमिका खत्म नहीं होगी, बल्कि बदल सकती है। सामान्य मामलों में तकनीकी प्रणालियां शुरुआती जांच संभाल सकती हैं, जबकि अस्पष्ट या उच्च जोखिम वाले मामलों को मानव समीक्षा के लिए भेजा जा सकता है।

AI के दौर में पहचान सुरक्षा का प्रभावी मॉडल वही होगा जिसमें सुरक्षा और ग्राहक सुविधा के बीच संतुलन बना रहे। जोखिम बढ़ने के साथ जांच की गहराई बढ़ाने वाला यह तरीका कंपनियों को मजबूत सुरक्षा देने के साथ वैध ग्राहकों के लिए अनावश्यक बाधाएं कम करने में मदद कर सकता है।

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