₹200 रोज कमाने वाले मूर्ति विक्रेता को ₹19.84 करोड़ का इनकम टैक्स नोटिस, पहचान के दुरुपयोग या सिस्टम फेल होने की आशंका

गुजरात में ‘घोस्ट ट्रांजेक्शन’ का मामला: गरीब विक्रेता के नाम पर ₹20 करोड़ का खेल उजागर

Roopa
By Roopa
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अहमदाबाद: गुजरात के डाकोर कस्बे से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने आम लोगों के साथ-साथ अधिकारियों को भी चौंका दिया है। यहां एक गरीब मूर्ति विक्रेता के नाम पर करीब ₹19.84 करोड़ के लेनदेन दर्ज पाए गए हैं। हैरानी की बात यह है कि यह व्यक्ति रोजाना मुश्किल से ₹100 से ₹200 तक की कमाई करता है। इनकम टैक्स विभाग का नोटिस मिलने के बाद पूरे इलाके में चर्चा का माहौल है और मामले को लेकर कई गंभीर सवाल उठने लगे हैं।

मामले के केंद्र में डाकोर के गोमती घाट क्षेत्र में रहने वाला चिराग जगदीश भैया है, जो प्लास्टिक और फाइबर की छोटी मूर्तियां बनाकर और बेचकर अपना गुजारा करता है। उसकी आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर है कि वह किसी तरह अपने परिवार का भरण-पोषण कर पाता है। ऐसे में जब उसके पते पर इनकम टैक्स विभाग का नोटिस पहुंचा, तो वह पूरी तरह हैरान और परेशान हो गया।

नोटिस के अनुसार, चिराग के नाम पर वित्तीय वर्ष 2021–22 में ₹11.86 करोड़ और 2022–23 में ₹7.98 करोड़ के लेनदेन दर्ज किए गए हैं। कुल मिलाकर ₹19.84 करोड़ का ट्रांजेक्शन दिखाया गया है। यह आंकड़ा न केवल चिराग के लिए बल्कि उसके जानने वालों के लिए भी अविश्वसनीय है।

चिराग ने बताया कि उसे समझ नहीं आ रहा कि यह सब कैसे हुआ। उसने कहा कि उसकी आय इतनी नहीं है कि वह किसी वकील की मदद ले सके। उसने यह भी बताया कि जिस नोटिस पर ₹5,500 का डाक टिकट लगा है, वह भी उसकी कई दिनों की कमाई के बराबर है। इस स्थिति ने उसे मानसिक रूप से भी परेशान कर दिया है।

नोटिस मिलने के बाद चिराग ने अपने पड़ोसियों और स्थानीय लोगों से सलाह ली। जब दस्तावेजों की जांच की गई, तो सभी लोग हैरान रह गए। एक ऐसे व्यक्ति के नाम पर करोड़ों रुपये के लेनदेन दर्ज होना, जिसके पास न कोई संपत्ति है और न ही कोई स्थायी आय, कई गंभीर सवाल खड़े करता है।

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स्थानीय स्तर पर यह आशंका जताई जा रही है कि यह मामला पहचान पत्रों के दुरुपयोग से जुड़ा हो सकता है। संभावना है कि किसी ने चिराग के दस्तावेजों का इस्तेमाल कर फर्जी बैंक खाते या कंपनियां खोलीं और उनके जरिए बड़े पैमाने पर लेनदेन किया। कुछ लोग इसे इनकम टैक्स सिस्टम की तकनीकी गड़बड़ी भी मान रहे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में अक्सर कमजोर और अनजान लोगों को निशाना बनाया जाता है। उनके दस्तावेजों का इस्तेमाल कर शेल कंपनियां बनाई जाती हैं और अवैध लेनदेन को अंजाम दिया जाता है। इस तरह के मामलों में पीड़ित व्यक्ति को अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।

अब तक इस पूरे मामले में इनकम टैक्स विभाग की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। चिराग फिलहाल विभाग की ओर से किसी स्पष्टीकरण का इंतजार कर रहा है। उसकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि वह इतने बड़े आरोप का जवाब कैसे देगा और खुद को निर्दोष कैसे साबित करेगा।

यह मामला प्रशासनिक प्रक्रियाओं की खामियों को उजागर करता है और यह भी दिखाता है कि पहचान की सुरक्षा कितनी जरूरी है। यदि इस तरह के मामलों पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो निर्दोष लोगों को भारी आर्थिक और कानूनी संकट का सामना करना पड़ सकता है।

फिलहाल, इस घटना ने स्थानीय स्तर पर चिंता और बहस को जन्म दे दिया है। लोग पारदर्शी जांच और पीड़ित को जल्द राहत देने की मांग कर रहे हैं, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके।

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