250 से अधिक नकली रसीदें सामने आईं; सरकारी खातों में जमा हुए बिना गबन हुआ पैसा, प्रतिबंध कानूनों के पालन पर उठे सवाल

₹50 लाख का लिकर परमिट घोटाला उजागर: अहमदाबाद सिविल हॉस्पिटल में फर्जी रसीदों का खेल, तीन कर्मचारी गिरफ्तार

Roopa
By Roopa
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अहमदाबाद: मेडिकल आधार पर लिकर परमिट जारी करने की प्रक्रिया में बड़ा घोटाला अहमदाबाद सिविल हॉस्पिटल में सामने आया है, जिसने गुजरात में लागू शराबबंदी कानूनों के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। करीब ₹50 लाख के इस घोटाले में फर्जी भुगतान रसीदों के जरिए सरकारी धन के गबन का मामला उजागर हुआ है।

प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि हॉस्पिटल के लिकर परमिट विभाग से जुड़े तीन कर्मचारियों को इस मामले में गिरफ्तार किया गया है। यह घोटाला तब सामने आया जब परमिट जारी करने के रिकॉर्ड और Patient Welfare Committee से जुड़े वित्तीय दस्तावेजों में गड़बड़ियां पाई गईं।

बिना भुगतान के जारी की गईं नकली रसीदें

जांच एजेंसियों के अनुसार, कम से कम 257 रसीदें पूरी तरह फर्जी पाई गईं। इन रसीदों को लिकर परमिट के भुगतान के वैध प्रमाण के रूप में दिखाया गया, जबकि संबंधित राशि कभी भी सरकारी खातों में जमा नहीं हुई।

गुजरात के कड़े शराबबंदी कानूनों के तहत मेडिकल कारणों से लिकर परमिट जारी करने के लिए निर्धारित शुल्क—नए परमिट के लिए ₹25,000 और नवीनीकरण के लिए ₹20,000—का भुगतान केवल अधिकृत ऑनलाइन माध्यम से करना अनिवार्य है।

इसके बावजूद, कई मामलों में बिना किसी वास्तविक लेनदेन के आवेदकों को रसीदें दे दी गईं, जो नियमों का स्पष्ट उल्लंघन दर्शाता है।

संगठित तरीके से किया गया घोटाला

जांच में यह भी सामने आया कि आरोपियों ने सिस्टम की खामियों का फायदा उठाते हुए फर्जी भुगतान स्वीकृति जारी की और सीधे आवेदकों से पैसा वसूला। इस तरह आधिकारिक प्रक्रिया को दरकिनार कर रकम का गबन किया गया।

एक मामले में नौ आवेदकों से वसूले गए ₹1.80 लाख भी इसी तरह हड़पे जाने की पुष्टि हुई है। इससे संकेत मिलता है कि यह कोई एकल घटना नहीं, बल्कि सुनियोजित और लगातार चलने वाला घोटाला था।

सूत्रों के मुताबिक, आरोपियों ने उन लोगों को निशाना बनाया जिन्हें भुगतान प्रक्रिया की पूरी जानकारी नहीं थी, खासकर वे लोग जिन्हें मेडिकल जरूरत के चलते जल्दी परमिट चाहिए होता है।

गिरफ्तारी के बाद आंतरिक जांच शुरू

घोटाले के सामने आने के बाद तीन कर्मचारियों, जिनमें एक वरिष्ठ क्लर्क भी शामिल है, को हिरासत में लिया गया। उनकी भूमिका और इस पूरे नेटवर्क में उनकी भागीदारी की गहराई से जांच की जा रही है।

हॉस्पिटल प्रशासन ने भी तुरंत आंतरिक जांच शुरू की और विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर संबंधित अधिकारियों को सौंप दी। इसी रिपोर्ट के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई शुरू की गई।

फिलहाल अधिकारी वित्तीय रिकॉर्ड, डिजिटल लेनदेन और दस्तावेजों की जांच कर रहे हैं, ताकि घोटाले के पूरे दायरे और इसमें शामिल अन्य संभावित लोगों का पता लगाया जा सके।

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शराबबंदी कानूनों के पालन पर उठे सवाल

इस घटना ने गुजरात में शराबबंदी कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राज्य में शराब पर पूर्ण प्रतिबंध है, लेकिन मेडिकल परमिट के जरिए सीमित अनुमति दी जाती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि निगरानी तंत्र मजबूत न हो और आंतरिक नियंत्रण कमजोर हो, तो इस तरह के सिस्टम का दुरुपयोग आसानी से किया जा सकता है। फर्जी रसीदों का इस्तेमाल इसी कमी को उजागर करता है।

बड़े नेटवर्क की संभावना, जांच जारी

जांच एजेंसियां इस बात की भी पड़ताल कर रही हैं कि क्या यह घोटाला सिर्फ हॉस्पिटल तक सीमित है या इसके तार किसी बड़े नेटवर्क से जुड़े हैं। बड़ी संख्या में फर्जी रसीदों के सामने आने से आशंका है कि यह गतिविधि लंबे समय से चल रही थी।

अधिकारियों द्वारा पुराने परमिट रिकॉर्ड की भी जांच की जा रही है, ताकि और अनियमितताओं का पता लगाया जा सके और संभावित पीड़ितों की पहचान हो सके।

पारदर्शिता और सख्त निगरानी की जरूरत

यह मामला सरकारी संस्थानों में पारदर्शिता और सख्त निगरानी की आवश्यकता को उजागर करता है। विशेषज्ञों ने रियल-टाइम सत्यापन प्रणाली, स्वचालित भुगतान ट्रैकिंग और नियमित ऑडिट लागू करने की सिफारिश की है।

अधिकारियों ने लोगों से अपील की है कि वे किसी भी सरकारी सेवा के लिए भुगतान केवल अधिकृत प्लेटफॉर्म के माध्यम से ही करें और रसीद की सत्यता की पुष्टि अवश्य करें।

₹50 लाख का यह लिकर परमिट घोटाला अहमदाबाद सिविल हॉस्पिटल यह साफ करता है कि कड़े नियमों के बावजूद यदि निगरानी कमजोर हो, तो भ्रष्टाचार के लिए रास्ते बन सकते हैं।

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