संदिग्ध लेनदेन की कड़ियां तलाशने के दौरान खातों पर रोक से व्यापारियों और आम लोगों के भुगतान अटके; किसी खाते में अनजाने में ₹1 या छोटी रकम आने के बाद भी कार्रवाई, वेतन और कारोबार के खर्चों पर असर

कानपुर में साइबर ठगी की जांच का असर कारोबार पर, नौ महीने में 5,500 बैंक खाते फ्रीज; ₹92 करोड़ की ठगी दर्ज

Roopa
By Roopa
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कानपुर। साइबर ठगी के मामलों में रकम के लेनदेन की कड़ियां तलाशने के लिए की जा रही कार्रवाई का असर अब कारोबारियों और आम खाताधारकों पर भी दिखाई दे रहा है। कानपुर में वर्ष 2026 के पहले नौ महीनों के दौरान साइबर ठगी से जुड़े करीब 255 मुकदमे दर्ज किए गए, जबकि संदिग्ध लेनदेन की जांच के सिलसिले में लगभग 5,500 बैंक खाते फ्रीज कराए गए। इन मामलों में 92 करोड़ रुपये से अधिक की ठगी दर्ज हुई। खातों पर रोक लगने से कई लोगों के पैसे अटक गए हैं, वहीं कारोबारियों को भुगतान, कर्मचारियों के वेतन और रोजमर्रा के खर्चों में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

पुलिस की कार्रवाई का उद्देश्य साइबर अपराध से जुड़ी रकम की आवाजाही का पता लगाना और संदिग्ध खातों के माध्यम से धन के हस्तांतरण को रोकना है। लेकिन कुछ मामलों में खाताधारकों का कहना है कि उनके खाते में किसी अनजान स्रोत से छोटी रकम आने के बाद भी खाते पर रोक लगा दी गई। ऐसे मामलों में खाताधारकों को यह स्पष्ट कराने के लिए जांच अधिकारियों और बैंक के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं कि संबंधित लेनदेन का साइबर अपराध से क्या संबंध है।

आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी से सितंबर 2026 के बीच दर्ज मामलों में करीब 1.25 करोड़ रुपये फ्रीज किए गए, जबकि लगभग 24 लाख रुपये की बरामदगी हुई। इससे पहले पूरे वर्ष 2025 में साइबर ठगी से जुड़े 429 मुकदमों में 41.97 करोड़ रुपये की ठगी दर्ज की गई थी और 4.45 करोड़ रुपये बरामद किए गए थे। मौजूदा वर्ष के आंकड़े बताते हैं कि साइबर अपराध की जांच के साथ-साथ संदिग्ध वित्तीय लेनदेन की पहचान और प्रभावित खाताधारकों की समस्याओं का समाधान भी बड़ी चुनौती बना हुआ है।

एक रुपये के लेनदेन के बाद खाते पर रोक

स्वरूप नगर निवासी अंबिका कपूर का मामला इस समस्या को सामने लाता है। उनके अनुसार, 2 अप्रैल 2024 को उनके एचडीएफसी बैंक खाते में किसी अज्ञात स्रोत से एक रुपये आए थे। इसके बाद एक स्थानीय रेस्तरां के प्रबंधक के खाते से 1.80 लाख रुपये निकलने के मामले में पुलिस ने उनका बैंक खाता फ्रीज करा दिया। अंबिका का कहना है कि तब से अब तक उनके खाते पर लगी रोक नहीं हट सकी है।

इसी तरह, नेहरू नगर के एक इलेक्ट्रॉनिक्स कारोबारी के खाते में 2,500 रुपये आने के बाद खाता फ्रीज कर दिया गया। रतनलाल नगर में रहने वाले एक कर्मचारी के खाते में 1,500 रुपये आने के बाद उसका बचत खाता भी कई महीनों तक फ्रीज रहा। इन मामलों में खाताधारकों की परेशानी इस बात से बढ़ जाती है कि छोटी रकम के लेनदेन के बाद लगी रोक के कारण खाते में मौजूद अन्य धनराशि तक उनकी पहुंच प्रभावित हो सकती है।

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कारोबारियों के सामने भुगतान का संकट

बैंक खातों पर रोक लगने से व्यापारिक गतिविधियों पर भी असर पड़ सकता है। कारोबारी खाते से कर्मचारियों का वेतन, दुकान का किराया, बिजली बिल और आपूर्तिकर्ताओं के भुगतान किए जाते हैं। ऐसे में खाते के लंबे समय तक फ्रीज रहने पर भुगतान अटक सकते हैं। चेक बाउंस होने या समय पर रकम नहीं मिलने से कारोबारी संबंधों और बाजार में साख पर भी असर पड़ने की आशंका रहती है।

व्यापार मंडल के एक पदाधिकारी ने कहा कि साइबर ठगी की जांच में अनजाने में फंसने वाले कारोबारियों की समस्याओं को ध्यान में रखते हुए कार्रवाई की जानी चाहिए। उनके मुताबिक, संदिग्ध रकम की जांच जरूरी है, लेकिन ऐसी व्यवस्था भी होनी चाहिए जिससे वैध कारोबारी गतिविधियां लंबे समय तक बाधित न रहें।

खाता फ्रीज होने पर क्या करें

बैंकिंग क्षेत्र से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, साइबर अपराध की जांच के दौरान पुलिस या साइबर सेल के निर्देश पर किसी खाते पर रोक लगाई जा सकती है। खाताधारक को सबसे पहले अपनी बैंक शाखा से संपर्क करके रोक का कारण, संबंधित पुलिस थाने या साइबर सेल की जानकारी, शिकायत का संदर्भ नंबर और जांच अधिकारी का विवरण लेना चाहिए।

इसके बाद संबंधित जांच अधिकारी को लिखित आवेदन देकर लेनदेन की प्रकृति स्पष्ट करनी चाहिए। यदि रकम किसी वैध व्यापारिक गतिविधि, सामान की बिक्री या सेवा के भुगतान के रूप में आई है, तो उसके समर्थन में दस्तावेज देना उपयोगी हो सकता है। आवेदन के साथ पहचान पत्र, पैन कार्ड, बैंक स्टेटमेंट और संबंधित बिल या इनवॉइस संलग्न किए जा सकते हैं।

खाते पर लगी रोक हटाने का निर्णय संबंधित जांच और लागू कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर करता है। इसलिए केवल बैंक से संपर्क करना पर्याप्त नहीं हो सकता; खाताधारक को उस पुलिस इकाई के समक्ष भी अपना पक्ष रखना पड़ सकता है, जिसके निर्देश पर कार्रवाई हुई है।

साइबर ठगी की रकम का पता लगाने और पीड़ितों के पैसे बचाने के लिए संदिग्ध लेनदेन की जांच महत्वपूर्ण है। साथ ही, जिन खाताधारकों का अपराध से कोई संबंध नहीं है, उनकी शिकायतों की समयबद्ध समीक्षा और वैध लेनदेन के प्रमाणों की जांच भी जरूरी है, ताकि साइबर अपराध पर कार्रवाई के साथ सामान्य बैंकिंग और कारोबार अनावश्यक रूप से प्रभावित न हों।

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