नई दिल्ली। रक्षा क्षेत्र की कंपनी एसएमपीपी के खिलाफ कथित भ्रष्टाचार के मामले में जांच तेज होने के बाद भारतीय सेना के साथ उसके करीब 10 मौजूदा अनुबंध भी जांच के दायरे में आ गए हैं। इन अनुबंधों का कुल मूल्य 2,000 करोड़ से अधिक बताया जा रहा है। इनमें गोला-बारूद, लक्ष्य पर हमला करने वाले स्वचालित ड्रोन, खुफिया जानकारी जुटाने वाले ड्रोन और सुरक्षा उपकरणों की आपूर्ति से जुड़े सौदे शामिल हैं। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की प्राथमिकी में कंपनी के शीर्ष प्रबंधन पर सार्वजनिक क्षेत्र की रक्षा कंपनी म्यूनिशंस इंडिया लिमिटेड के एक अधिकारी को कथित रिश्वत देकर करीब 500 करोड़ का ठेका हासिल करने का आरोप है।
मामले के सामने आने के बाद रक्षा मंत्रालय में कंपनी के साथ जारी कारोबारी संबंधों और खरीद प्रक्रियाओं की समीक्षा की जा रही है। बताया जा रहा है कि कुछ अनुबंध इसी वर्ष किए गए थे, जबकि अन्य के तहत आपूर्ति की प्रक्रिया जारी है। कंपनी के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी के कारण रक्षा मंत्रालय के साथ उसके कारोबारी लेनदेन पर रोक लगाने की कार्रवाई भी विचाराधीन है। हालांकि, मौजूदा अनुबंधों को लेकर अंतिम फैसला संबंधित नियमों और प्रत्येक मामले की परिस्थितियों के आधार पर लिया जाएगा।
दस अनुबंधों के भविष्य पर फैसला करेगा मंत्रालय
मौजूदा खरीद नियमों के तहत, भ्रष्टाचार के मामले में प्राथमिकी दर्ज होने के बाद संबंधित कंपनी को रक्षा खरीद प्रक्रिया से बाहर करने की कार्रवाई की जा सकती है। इसका असर उन मामलों पर भी पड़ सकता है जिनमें कंपनी प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया के बाद चयनित हो चुकी है, लेकिन अनुबंध की आपूर्ति अभी पूरी नहीं हुई है।
रक्षा मंत्रालय के स्तर पर ऐसे मामलों की समीक्षा के लिए समिति गठित किए जाने की संभावना है। यह समिति उन अनुबंधों के भविष्य पर विचार करेगी जिन पर हस्ताक्षर हो चुके हैं, लेकिन जिनके तहत पूरी आपूर्ति अभी बाकी है। प्रत्येक अनुबंध के संबंध में अलग-अलग निर्णय लिया जा सकता है।
नियमों के अनुसार, यदि किसी अनुबंध पर हस्ताक्षर हो चुके हैं, लेकिन उसका क्रियान्वयन शुरू नहीं हुआ है, तो संबंधित विभाग के सचिव को उसे जारी रखने या बंद करने का फैसला करने का अधिकार हो सकता है। ऐसे में एसएमपीपी के साथ हुए अनुबंधों की स्थिति, आपूर्ति की प्रगति और रक्षा तैयारियों पर उनके संभावित प्रभाव को ध्यान में रखा जाएगा।
रक्षा उपकरणों की आपूर्ति पर पड़ सकता है असर
एसएमपीपी के साथ सेना के अनुबंधों में विभिन्न प्रकार के रक्षा उपकरण शामिल बताए गए हैं। इनमें गोला-बारूद, लोइटरिंग म्यूनिशंस यानी लक्ष्य की तलाश में कुछ समय तक हवा में रहने के बाद हमला करने वाले हथियार, खुफिया जानकारी जुटाने वाले ड्रोन और सैनिकों की सुरक्षा से जुड़े उपकरण शामिल हैं।
यदि किसी अनुबंध को बीच में रोकने या समाप्त करने का फैसला किया जाता है, तो संबंधित उपकरणों की आपूर्ति और रखरखाव की व्यवस्था पर असर पड़ सकता है। हालांकि, रक्षा मंत्रालय के पास पहले से आपूर्ति किए जा चुके उपकरणों के लिए आवश्यक स्पेयर पार्ट्स और सेवाओं की खरीद जारी रखने का विकल्प हो सकता है, ताकि उन्हें परिचालन के योग्य बनाए रखा जा सके।
इसमें जेट इंजन से चलने वाले आत्मघाती ड्रोन जैसे उपकरण भी शामिल हैं, जिनकी सेवा और रखरखाव के लिए निरंतर तकनीकी सहायता की जरूरत हो सकती है। ऐसे मामलों में किसी कंपनी के खिलाफ कार्रवाई और सेना की परिचालन संबंधी जरूरतों के बीच संतुलन बनाना महत्वपूर्ण होगा।
500 करोड़ के सौदे में कथित रिश्वतखोरी की जांच
सीबीआई के अनुसार, कंपनी के शीर्ष प्रबंधन पर आरोप है कि उसने म्यूनिशंस इंडिया लिमिटेड के एक अधिकारी को कथित तौर पर रिश्वत देकर 500 करोड़ का ऑर्डर हासिल करने की कोशिश की या उसे हासिल किया। इसी मामले में दर्ज प्राथमिकी के बाद कंपनी के अन्य रक्षा अनुबंध भी जांच के दायरे में आ गए हैं।
फिलहाल आरोपों की जांच जारी है और किसी भी आरोपी के खिलाफ दोष सिद्ध नहीं हुआ है। जांच एजेंसी को कथित रिश्वतखोरी से जुड़े साक्ष्यों की पड़ताल करने के साथ यह भी निर्धारित करना होगा कि रक्षा खरीद प्रक्रिया में किसी अन्य व्यक्ति या अधिकारी की भूमिका थी या नहीं।
एसएमपीपी ने इस मामले में टिप्पणी के अनुरोध पर तत्काल कोई जवाब नहीं दिया था।
बुलेटप्रूफ जैकेट की आपूर्ति पर भी उठे थे सवाल
एसएमपीपी पहले भी विवादों में रह चुकी है। वर्ष 2019 में सेना के लिए बुलेटप्रूफ जैकेट की आपूर्ति से जुड़े उसके एक बड़े अनुबंध पर सवाल उठे थे। उस समय आरोप सामने आए थे कि परीक्षण के दौरान पश्चिमी देशों में निर्मित घटकों का इस्तेमाल किया गया, जबकि वास्तविक आपूर्ति के दौरान बड़ी संख्या में चीनी मूल के घटकों का उपयोग किया गया।
इस मामले ने रक्षा उपकरणों की गुणवत्ता, आपूर्ति शृंखला और खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर चिंताएं पैदा की थीं। मौजूदा जांच के बीच कंपनी के पुराने विवाद का भी उल्लेख किया जा रहा है, हालांकि दोनों मामलों के बीच किसी प्रत्यक्ष संबंध की पुष्टि नहीं हुई है।
अब रक्षा मंत्रालय को यह तय करना होगा कि कथित भ्रष्टाचार के मामले में कंपनी के खिलाफ लागू नियमों के तहत क्या कार्रवाई की जाए और सेना की मौजूदा जरूरतों को किस तरह पूरा किया जाए। 2,000 करोड़ से अधिक के अनुबंधों पर होने वाला फैसला न केवल कंपनी के कारोबारी भविष्य, बल्कि संबंधित रक्षा उपकरणों की आपूर्ति व्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
