हैदराबाद। तेलंगाना हाईकोर्ट ने कथित 5.10 करोड़ के बैंक ऋण धोखाधड़ी मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के समन को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केंद्रीय अपराध शाखा और केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) में आपराधिक मामले लंबित होने या कर्ज चुकाने के लिए एकमुश्त समझौते की पेशकश करने से ईडी की स्वतंत्र जांच पर रोक नहीं लगती।
न्यायमूर्ति जे. श्रीनिवास राव ने कहा कि धनशोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) की धारा 50 के तहत ईडी को समन जारी करने का अधिकार है और इस मामले में हस्तक्षेप करने का कोई कानूनी या अधिकार क्षेत्र संबंधी आधार नहीं बनता।
पारुचुरी कुमार और एक अन्य याचिकाकर्ता ने ईडी की कार्रवाई को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। उनकी दलील थी कि कथित बैंक ऋण धोखाधड़ी से जुड़े मामले पहले से ही हैदराबाद की केंद्रीय अपराध शाखा और सीबीआई के पास लंबित हैं। याचिकाकर्ताओं ने ऋण की रकम चुकाने के लिए एकमुश्त समझौता करने की इच्छा भी जताई थी। उनका पक्ष था कि इन परिस्थितियों में ईडी की ओर से जारी समन को जारी रखने का औचित्य नहीं है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इन दलीलों को समन रद्द करने के लिए पर्याप्त नहीं माना। अदालत ने कहा कि अलग-अलग एजेंसियों के पास मामले लंबित होने से ईडी की वैधानिक शक्तियां समाप्त नहीं हो जातीं। इसी तरह, कर्ज चुकाने के लिए प्रस्तावित समझौता भी अपने आप में जांच रोकने का आधार नहीं है। न्यायालय ने समन जारी करने की प्रक्रिया में ऐसा कोई कानूनी दोष नहीं पाया, जिसके आधार पर उसमें हस्तक्षेप किया जा सके। इसके बाद याचिका खारिज कर दी गई।
पीएमएलए की धारा 50 के तहत समन का अधिकार
इस मामले में अदालत के सामने प्रमुख सवाल ईडी की ओर से जारी समन की वैधानिकता का था। पीएमएलए की धारा 50 के तहत ईडी को निर्धारित परिस्थितियों में लोगों को बुलाने, बयान दर्ज करने और जांच से संबंधित जानकारी हासिल करने का अधिकार प्राप्त है। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की दलीलों पर विचार करने के बाद समन को रद्द करने का आधार नहीं पाया।
अदालत के फैसले के अनुसार, किसी अन्य एजेंसी के पास आपराधिक कार्यवाही लंबित रहने मात्र से ईडी की जांच स्वतः समाप्त नहीं होती। इसी तरह, वित्तीय देनदारी चुकाने के लिए समझौते का प्रस्ताव भी जांच के दौरान उठाए गए सवालों का अंतिम समाधान नहीं माना जा सकता। इसलिए याचिकाकर्ताओं को राहत देने से इनकार कर दिया गया।
हालांकि, समन को चुनौती देने वाली याचिका खारिज होने का अर्थ यह नहीं है कि कथित बैंक धोखाधड़ी के आरोप अदालत में साबित हो गए हैं। यह आदेश मुख्य रूप से ईडी के समन जारी करने के अधिकार और उसमें न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता से संबंधित है। मामले में आरोपों की अंतिम स्थिति जांच और आगे की कानूनी कार्यवाही पर निर्भर करेगी।
