नई दिल्ली। जी समूह के संस्थापक सुभाष चंद्र से जुड़े मामले में ₹6.5 करोड़ के समझौते ने दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC) के तहत कंपनियों के समाधान की प्रक्रिया पर एक बार फिर सवाल खड़े किए हैं। बैंकों के ₹22,000 करोड़ से अधिक के स्वीकृत दावों के मुकाबले समझौते की रकम काफी कम रही। इसी बीच प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने IBC और धनशोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत कथित धोखाधड़ी का पता लगाने को अपनी प्रमुख जांच प्राथमिकताओं में शामिल किया है। एजेंसी ऐसे मामलों की दोबारा पड़ताल कर रही है, जिनमें कथित मिलीभगत, असामान्य रूप से बड़े हेयरकट और प्रमोटरों के दोबारा संपत्ति हासिल करने के प्रयास सामने आए हैं।
पिछले दो वर्षों में एजेंसी ने दिवाला प्रक्रिया में कथित हेरफेर से जुड़े करीब एक दर्जन मामलों की जांच की है। इनमें क्रेडिटर्स कमेटी (CoC) में प्रमोटर समूह से जुड़ी कंपनियों का प्रभाव, फर्जी या प्रॉक्सी बोलीदाताओं के जरिए कंपनी को दोबारा हासिल करने की कोशिश, संपत्तियों का कम मूल्यांकन और समाधान पेशेवरों की कथित भूमिका जैसे आरोप शामिल हैं। जांच का एक प्रमुख पहलू यह भी है कि कहीं दिवाला प्रक्रिया का इस्तेमाल उन प्रमोटरों या उनसे जुड़ी संस्थाओं को अप्रत्यक्ष रूप से फायदा पहुंचाने के लिए तो नहीं किया गया।
अल्केमिस्ट समूह से जुड़े मामले में ED 2016 से ₹1,840 करोड़ से अधिक के कथित धनशोधन की जांच कर रही थी। 2021 में अल्केमिस्ट लिमिटेड के खिलाफ कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) शुरू हुई। इसके बाद बनी CoC में समूह से जुड़ी तीन कंपनियों का करीब 99 प्रतिशत मतदान अधिकार था। ये कंपनियां धनशोधन जांच में भी सामने आई थीं। समाधान पेशेवर का भी समूह से पुराना संबंध रहा था। ED ने आरोप लगाया कि इस व्यवस्था का इस्तेमाल PMLA के तहत जब्त संपत्तियों को दोबारा हासिल करने और IBC की धारा 32A के तहत पुराने अपराधों से जुड़ी देनदारी से राहत पाने के लिए किया गया। NCLT ने फरवरी के आदेश में CIRP को धोखाधड़ी और मिलीभगत से प्रभावित माना और प्रक्रिया को वापस ले लिया। बाद में कलकत्ता हाईकोर्ट ने CBI को प्रक्रिया की जांच करने को कहा।
सनस्टार ओवरसीज मामले में ED ने आरोप लगाया कि कंपनी को उसकी अपनी रकम के जरिए दिवाला प्रक्रिया में दोबारा हासिल करने की कोशिश की गई। कंपनी पर ₹1,274.14 करोड़ के स्वीकृत दावे थे, जबकि CIRP के तहत उसका अधिग्रहण ₹196 करोड़ में हुआ। एजेंसी के मुताबिक, खरीदार संस्था के पास पर्याप्त अपनी पूंजी नहीं थी और कंपनी से कथित तौर पर रकम निकालकर उसे उपलब्ध कराई गई। जुलाई 2024 में तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया और ₹294.19 करोड़ की संपत्तियां कुर्क की गईं।
रिचा इंडस्ट्रीज मामले में कथित ₹236 करोड़ की बैंक धोखाधड़ी की जांच के दौरान एजेंसी ने आरोप लगाया कि प्रमोटरों ने एक पूर्व कर्मचारी को बेनामीदार बनाकर सारिगा कंस्ट्रक्शंस नाम की कंपनी बनाई। इस कंपनी ने CoC में मतदान अधिकार हासिल किए और बाद में रिचा इंडस्ट्रीज को दोबारा हासिल करने के लिए समाधान योजना पेश की। ED ने समाधान पेशेवर पर भी कथित मिलीभगत का आरोप लगाया। कंपनी के परिसमापन के बाद अक्टूबर 2025 में उसे चालू इकाई के रूप में बेचा गया और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को ₹696 करोड़ के स्वीकृत दावों के मुकाबले केवल ₹40.29 करोड़ मिले।
Proposal for Conducting Cyber Crisis Drill, Tabletop Exercise (TTEx) & CCMP Readiness Exercise
गुरुग्राम के यूनिवर्सल बिल्डवेल मामले में कंपनी की जमीन की बिक्री में कथित हेरफेर की जांच हुई। एजेंसी ने दो बिचौलियों से करीब ₹50 लाख की अस्पष्ट नकदी मिलने और डिजिटल साक्ष्यों में IBC प्रक्रिया से बाहर कथित भुगतान तथा पहले से तय और दबाई गई बोलियों के संकेत मिलने की बात कही। क्रिश फ्लोरेंस एस्टेट और एंगल इंफ्रास्ट्रक्चर मामले में भी प्रमोटर और समाधान पेशेवर के बीच कथित मिलीभगत तथा संपत्ति के कम मूल्यांकन की जांच की गई। हालांकि, एंगल इंफ्रा के समाधान पेशेवर ने आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि उन्होंने IBC के नियमों के तहत काम किया।
अमटेक ऑटो समूह की 15 कंपनियां भी दिवाला प्रक्रिया से गुजरीं। इन पर ₹34,000 करोड़ से अधिक के दावे थे और औसतन करीब 81 प्रतिशत हेयरकट के बाद ऋणदाताओं को लगभग ₹6,300 करोड़ मिले। ED ने आरोप लगाया कि प्रमोटरों ने NCLT प्रक्रिया शुरू होने से पहले संपत्तियां फ्रंट कंपनियों और बेनामी लोगों को कम मूल्य पर हस्तांतरित कीं। एजेंसी ने करीब 500 कथित शेल कंपनियों का भी पता लगाने का दावा किया, जिनके पास ₹6,000 करोड़ से अधिक की संपत्तियां थीं। इस मामले में ₹6,261 करोड़ की संपत्तियां कुर्क की गई हैं।
अन्य मामलों में भी ग्राहक अग्रिम राशि को संबंधित संस्थाओं में भेजने, फर्जी लेनदेन, बेनामी संपत्तियां बनाने और CoC की संरचना प्रभावित करने के आरोप सामने आए हैं। रिलायंस कम्युनिकेशंस मामले में ₹40,000 करोड़ से अधिक की कथित बैंक धोखाधड़ी की रकम से मैनहट्टन में संपत्ति खरीदने और उसके बिक्री धन को संदिग्ध निवेश व्यवस्था के जरिए भेजने का आरोप है। JVL Agro मामले में करीब ₹1,992 करोड़ की बैंक धोखाधड़ी से जुड़े आरोपों की जांच हुई।
भूषण पावर एंड स्टील मामले में ₹47,204 करोड़ की कथित बैंक धोखाधड़ी के बीच कंपनी का समाधान करीब ₹19,350 करोड़ में हुआ। ED ने पूर्व प्रमोटरों से जुड़ी कथित तौर पर हटाई गई संपत्तियों पर कार्रवाई की और करीब ₹4,938 करोड़ की संपत्तियां कुर्क कीं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इसमें से ₹4,025 करोड़ सफल समाधान आवेदक को वापस किए गए।
इन मामलों के बीच ED की जांच का फोकस इस बात पर है कि IBC की समाधान प्रक्रिया वास्तविक प्रतिस्पर्धी बोली और पारदर्शी मूल्यांकन के आधार पर हुई या नहीं। क्रेडिटर्स कमेटी में प्रमोटर-संबंधित संस्थाओं के प्रभाव, समाधान पेशेवरों की भूमिका, संपत्तियों के मूल्यांकन और बड़े हेयरकट के कारणों की पड़ताल के जरिए एजेंसी यह भी देख रही है कि कहीं दिवाला प्रक्रिया का इस्तेमाल कर्जदाताओं के हितों को नुकसान पहुंचाकर पुराने प्रमोटरों या उनसे जुड़े पक्षों को लाभ पहुंचाने के लिए तो नहीं किया गया।
