राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने पश्चिम बंगाल के कथित ‘एंटी-गुंडा’ विधेयक को NDPS कानून और समानांतर निवारक निरोध व्यवस्था से जुड़े सवालों के बीच पुनर्विचार के लिए राज्य को लौटाया है।

राष्ट्रपति मुर्मू ने लौटाया बंगाल का ‘एंटी-गुंडा’ विधेयक, एनडीपीएस कानून से टकराव पर पुनर्विचार के निर्देश

Team The420
5 Min Read

कोलकाता। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने पश्चिम बंगाल विधानसभा से पारित पश्चिम बंगाल सार्वजनिक सुरक्षा और असामाजिक गतिविधियों पर नियंत्रण विधेयक, जिसे आम तौर पर ‘एंटी-गुंडा’ विधेयक कहा जा रहा है, को शुक्रवार को पुनर्विचार के लिए राज्य सरकार के पास वापस भेज दिया। विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजे जाने के बाद केंद्र सरकार की ओर से इसके कुछ प्रावधानों और केंद्रीय कानूनों के साथ संभावित टकराव को लेकर आपत्तियां उठाई गई थीं। इसके बाद राष्ट्रपति ने विधेयक पर पुनर्विचार के लिए इसे राज्य को लौटा दिया।

केंद्र की मुख्य आपत्ति विधेयक में मादक पदार्थों से जुड़े अपराधों को ‘गुंडा’ की परिभाषा में शामिल किए जाने को लेकर है। प्रस्तावित कानून में ऐसे व्यक्ति को ‘गुंडा’ की श्रेणी में रखने का प्रावधान है, जो स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 के तहत दंडनीय अपराध करता है, करने का प्रयास करता है, उसके लिए उकसाता है, उसे बढ़ावा देता है, उसका वित्तपोषण करता है या उसे सुगम बनाता है।

केंद्र सरकार की ओर से तैयार किए गए नोट में कहा गया कि यह प्रावधान मादक पदार्थों से जुड़े मामलों में निवारक निरोध की ऐसी व्यवस्था तैयार कर सकता है, जो पहले से मौजूद केंद्रीय कानून से समानांतर हो। केंद्र ने स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थों की अवैध तस्करी में शामिल लोगों के निवारक निरोध के लिए 1988 के संबंधित केंद्रीय कानून का उल्लेख किया है।

FCRF Launches India-Focused BFSI Compliance Certification for Emerging Governance Professionals

नोट में कहा गया कि प्रस्तावित प्रावधान के कारण मादक पदार्थों से जुड़े मामलों में दो समानांतर निवारक निरोध व्यवस्थाएं बनने का सवाल उठ सकता है। इससे संविधान के अनुच्छेद 254 के तहत केंद्रीय और राज्य कानूनों के बीच असंगति या टकराव का मुद्दा पैदा हो सकता है। केंद्र ने सुझाव दिया है कि विधेयक की संबंधित धारा से एनडीपीएस अधिनियम, 1985 के तहत अपराधों का संदर्भ हटाया जाए, ताकि मौजूदा केंद्रीय कानूनी व्यवस्था के साथ दोहराव और टकराव से बचा जा सके।

राज्य सचिवालय के अधिकारियों के अनुसार, विधेयक को कुछ संशोधनों के बाद विधानसभा में दोबारा पारित कराया जा सकता है। इसके बाद इसे राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए फिर से भेजने की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। अधिकारियों ने इसे राज्य सरकार की उस योजना के लिए झटका बताया, जिसके तहत विधेयक को जल्द प्रभावी करने की तैयारी थी।

विधेयक को पश्चिम बंगाल विधानसभा ने जून के अंत में पारित किया था। हालांकि, राष्ट्रपति की मंजूरी लंबित होने के कारण इसे अब तक अधिनियम के रूप में लागू नहीं किया गया है। राज्य सरकार ने इससे पहले कलकत्ता हाई कोर्ट को भी बताया था कि ‘एंटी-गुंडा’ कानून को अभी अधिसूचित नहीं किया गया है और वह प्रभावी नहीं हुआ है।

राष्ट्रपति की ओर से विधेयक लौटाए जाने के बाद राज्य में राजनीतिक प्रतिक्रिया भी सामने आई। तृणमूल कांग्रेस के एक धड़े, वाम दलों और कांग्रेस ने इस फैसले का स्वागत किया। बंगाल कांग्रेस अध्यक्ष शुभंकर सरकार ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार इस कानून के जरिए विपक्ष की आवाज दबाने की कोशिश कर रही थी। यह आरोप राजनीतिक प्रतिक्रिया के रूप में सामने आया है और राज्य सरकार के विधेयक को लेकर अपने तर्क अलग रहे हैं।

इसी क्रम में राज्य विधानसभा ने सार्वजनिक और निजी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने वालों की संपत्ति जब्त करने और उसकी नीलामी से संबंधित सार्वजनिक व्यवस्था कानून में संशोधन भी किया था। इस संशोधन को राज्य में लागू किए जाने की जानकारी दी गई है। इसके तहत सार्वजनिक या निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों से क्षतिपूर्ति वसूलने और संबंधित संपत्तियों पर कार्रवाई का प्रावधान बताया गया है।

राज्य में दोनों विधायी उपायों को अलग-अलग हिस्सों के रूप में देखा गया है। एक व्यवस्था असामाजिक गतिविधियों में कथित रूप से शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई और निवारक निरोध से संबंधित है, जबकि दूसरी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की स्थिति में आर्थिक क्षतिपूर्ति और संपत्ति संबंधी कार्रवाई से जुड़ी है। अब ‘एंटी-गुंडा’ विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी नहीं मिलने के बाद इसके प्रावधानों में संभावित संशोधन और विधानसभा की अगली कार्रवाई पर नजर रहेगी।

हमसे जुड़ें

Share This Article