नई दिल्ली। साइबर ठगों की एक डिजिटल अरेस्ट की साजिश का पता दिल्ली पुलिस को दूसरी ठगी की रकम का पीछा करते हुए चला। ₹67.30 लाख की कथित साइबर ठगी की जांच के दौरान पैसों का लेनदेन एक ऐसे बैंक खाते तक पहुंचा, जिसे शुरू में पुलिस ने ठगी के नेटवर्क से जुड़ा संभावित म्यूल खाता माना। लेकिन जांच आगे बढ़ी तो सामने आया कि खाता किसी अपराधी का नहीं, बल्कि जनकपुरी में अकेली रहने वाली एक वरिष्ठ नागरिक का था। पुलिस जब महिला के घर पहुंची, तब वह खुद कथित डिजिटल अरेस्ट के जाल में फंसी हुई थीं।
मामला 20 सितंबर को राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर दर्ज ₹67,30,300 की कथित डिजिटल अरेस्ट ठगी से शुरू हुआ। दिल्ली पुलिस की इंटेलिजेंस फ्यूजन एंड स्ट्रैटेजिक ऑपरेशंस इकाई इस मामले में ठगी की रकम के प्रवाह की जांच कर रही थी। जांच के दौरान रकम एक एक्सिस बैंक खाते तक पहुंची। यह खाता कर्नाटक के नागोरी में स्थित एक निजी कंपनी के नाम पर था। पुलिस ने खाते से जुड़े लेनदेन की पड़ताल शुरू की तो उसमें आगे भेजी गई रकम की एक कड़ी साउथ इंडियन बैंक के बचत खाते तक पहुंची।
शुरुआत में जांचकर्ताओं के सामने यह सवाल था कि क्या साउथ इंडियन बैंक का खाता भी ठगों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला म्यूल खाता है या फिर इसका खाताधारक खुद साइबर अपराधियों का शिकार है। खाते की जानकारी और लेनदेन के तरीके की जांच के बाद पुलिस को पता चला कि यह एक वास्तविक व्यक्ति का खाता है और कथित तौर पर उसका इस्तेमाल उसकी जानकारी के बिना साइबर ठगी में किया जा रहा था।
पुलिस ने खाते से जुड़े पते की जांच की तो उसका संबंध पश्चिमी दिल्ली के जनकपुरी से मिला। जांच टीम महिला के घर पहुंची तो पता चला कि वह वरिष्ठ नागरिक हैं और अकेली रहती हैं। पुलिस के अनुसार, टीम के पहुंचने के समय महिला कथित तौर पर डिजिटल अरेस्ट में थीं और काफी तनाव में थीं। ठगों ने उन्हें फोन पर यह विश्वास दिलाया था कि वह गंभीर आपराधिक जांच में फंस गई हैं।
महिला को कथित तौर पर बताया गया कि उनके आधार विवरण का संबंध मनी लॉन्ड्रिंग से मिला है। इसके अलावा ठगों ने उनके बैंक खाते को जम्मू-कश्मीर में हुए एक विस्फोट से जोड़ने का दावा किया। इस तरह उन्हें यह डर दिखाया गया कि उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई हो सकती है और उनके बैंक खाते फ्रीज कर दिए जाएंगे।
Proposal for Conducting Cyber Crisis Drill, Tabletop Exercise (TTEx) & CCMP Readiness Exercise
ठगी के लिए आरोपियों ने खुद को जांच एजेंसी के अधिकारी के तौर पर पेश किया। पुलिस के मुताबिक, महिला को एक महिला ने फोन किया और खुद को केंद्रीय जांच ब्यूरो की अधिकारी बताया। इसके बाद कथित तौर पर उन्हें बताया गया कि उनके सभी बैंक खाते फ्रीज किए जा सकते हैं। डर और दबाव बनाकर उनसे करीब ₹60 लाख ट्रांसफर करा लिए गए।
पुलिस की समय पर पहुंच ने महिला को आगे की ठगी से बचा लिया। जांच के दौरान उनकी अन्य वित्तीय संपत्तियों, जिसमें म्यूचुअल फंड और शेयर भी शामिल थे, को सुरक्षित रखने में मदद मिली। पुलिस ने जनकपुरी थाने के प्रभारी अधिकारी के साथ समन्वय किया और स्थानीय पुलिसकर्मी को भी महिला के घर भेजा गया।
इसके बाद महिला को साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 के माध्यम से शिकायत दर्ज कराने में मदद की गई। पुलिस के अनुसार, शिकायत दर्ज हो चुकी है और मामले में आगे कानूनी कार्रवाई की जा रही है। ई-एफआईआर की प्रक्रिया शुरू करने के साथ ही ठगी की रकम का पता लगाने और उसे फ्रीज कराने के प्रयास किए जा रहे हैं।
डिजिटल अरेस्ट साइबर ठगी का ऐसा तरीका है, जिसमें अपराधी पुलिस, केंद्रीय जांच ब्यूरो, प्रवर्तन निदेशालय, सीमा शुल्क या अन्य सरकारी एजेंसियों के अधिकारी बनकर लोगों को डराते हैं। पीड़ित को बताया जाता है कि उसका नाम किसी अपराध, मनी लॉन्ड्रिंग या अन्य आपराधिक गतिविधि से जुड़ा है और गिरफ्तारी से बचने के लिए उसे अपराधियों के निर्देशों का पालन करना होगा।
ऐसे मामलों में ठग पीड़ित को फोन या वीडियो कॉल पर लंबे समय तक बनाए रखते हैं। वे गिरफ्तारी, पूछताछ, बैंक खाते फ्रीज होने या संपत्ति जब्त होने का डर दिखाकर रकम ट्रांसफर कराने की कोशिश करते हैं। कई मामलों में पीड़ित को परिवार या पुलिस से संपर्क नहीं करने दिया जाता।
जनकपुरी का मामला यह भी दिखाता है कि साइबर अपराध में पैसों का मनी ट्रेल किसी दूसरे संभावित पीड़ित तक पहुंचने में महत्वपूर्ण सुराग बन सकता है। इस मामले में ₹67.30 लाख की कथित ठगी की जांच के दौरान सामने आया बैंक खाता पुलिस को एक ऐसी वरिष्ठ नागरिक तक ले गया, जो खुद ठगों के दबाव में थीं और अपनी बाकी वित्तीय संपत्ति गंवाने के खतरे में थीं।
