कोच्चि। केरल हाईकोर्ट ने ₹15.85 करोड़ के एसएनडीपी माइक्रोफाइनेंस धोखाधड़ी मामले में अभियोजन स्वीकृति की जरूरत को लेकर राज्य सरकार और उसके कानूनी प्रतिनिधियों के अलग-अलग रुख पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि सरकार का रुख और सतर्कता अभियोजक की दलीलें एक-दूसरे से अलग दिखाई दे रही हैं। मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर को होगी।
न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन की पीठ के समक्ष 18 सितंबर को सुनवाई के दौरान सतर्कता के विशेष लोक अभियोजक ने संबंधित सरकारी आदेश और पिछड़ा वर्ग विकास विभाग की सचिव की रिपोर्ट पेश की। रिपोर्ट में कहा गया था कि मामले में आरोपियों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति जरूरी नहीं है, क्योंकि संबंधित लोग सरकारी अधिकारी नहीं बल्कि निजी व्यक्ति हैं। हालांकि, विशेष लोक अभियोजक ने अदालत के समक्ष कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के प्रावधानों के तहत अभियोजन स्वीकृति आवश्यक है। उन्होंने यह भी बताया कि महाधिवक्ता ने भी इसी तरह की राय विभाग को दी थी।
अदालत ने इस स्थिति पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब सरकार का एक विभाग अभियोजन स्वीकृति की जरूरत से इनकार कर रहा है और सरकारी पक्ष की ओर से पेश कानूनी अधिकारी इसके विपरीत राय रख रहे हैं, तो राज्य का आधिकारिक रुख स्पष्ट होना चाहिए। अदालत ने इस मतभेद को प्रशासनिक और कानूनी जिम्मेदारी के लिहाज से गंभीर माना।
सुनवाई के दौरान अदालत ने विशेष लोक अभियोजक से यह भी पूछा कि यदि उनकी कानूनी राय थी कि अभियोजन स्वीकृति आवश्यक है, तो क्या उन्होंने विभाग के सचिव को इस संबंध में स्पष्ट रूप से सलाह दी थी। अदालत ने कहा कि सरकारी वकील के तौर पर अदालत में दी गई दलील व्यक्तिगत राय नहीं, बल्कि सरकार की आधिकारिक कानूनी स्थिति के आधार पर होनी चाहिए।
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अदालत ने अभियोजन पक्ष से यह भी पूछा कि यदि विभाग ने ऐसा आदेश जारी किया था जिसमें स्वीकृति की आवश्यकता से इनकार किया गया, तो क्या अभियोजक ने उस आदेश को अपनी कानूनी राय के अनुरूप नहीं होने की बात विभाग को बताई थी। सुनवाई के दौरान पीठ ने अभियोजन पक्ष की कार्यप्रणाली पर भी कड़ी मौखिक टिप्पणी की।
इसके बाद राज्य की ओर से पेश स्टेट अटॉर्नी ने मामले में सरकार का पक्ष रखा। अदालत ने कहा कि कुछ मामलों में सरकार अभियोजन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में सक्रिय दिखाई देती है, जबकि कुछ अन्य मामलों में देरी की स्थिति नजर आती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी स्थिति स्वीकार्य नहीं हो सकती और मामले में उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन होना चाहिए।
यह मामला वर्ष 2020 में दायर दो याचिकाओं से जुड़ा है, जिनमें एसएनडीपी माइक्रोफाइनेंस मामले की जांच के लिए सक्षम अधिकारी की अध्यक्षता में विशेष जांच दल गठित करने की मांग की गई थी। मूल अपराध वर्ष 2016 में सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो की ओर से दर्ज किया गया था। मामले में एसएनडीपी योगम से जुड़े पदाधिकारियों और केरल स्टेट बैकवर्ड क्लासेस डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के तत्कालीन अधिकारियों की कथित भूमिका की जांच की जा रही है।
पिछली सुनवाई में अदालत ने विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव को, जो व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित हुए थे, जांच अधिकारी की ओर से मांगी गई अभियोजन स्वीकृति पर एक सप्ताह के भीतर निर्णय लेने और आदेश पारित करने का निर्देश दिया था। अदालत ने यह भी कहा था कि अगली तारीख पर अधिकारी को दोबारा उपस्थित होना होगा, जब तक कि निर्णय वाला आदेश अदालत के समक्ष पेश न कर दिया जाए।
मौजूदा सुनवाई में याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि मामले में शामिल कुछ आरोपी भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 2(सी)(12) के तहत लोक सेवक की श्रेणी में आते हैं और इसलिए उनके खिलाफ अभियोजन के लिए स्वीकृति जरूरी है। सतर्कता के विशेष लोक अभियोजक ने भी सचिव की रिपोर्ट में व्यक्त राय से असहमति जताते हुए स्वीकृति को आवश्यक बताया।
अदालत ने मामले को 22 सितंबर 2026 को फिर सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है। साथ ही जांच अधिकारी को अभियोजन स्वीकृति के लिए प्रस्तुत की गई अंतिम रिपोर्ट या रिपोर्टों की प्रतियां अदालत में पेश करने का निर्देश दिया गया है।
