चंडीगढ़: पूर्व सैनिकों और उनके आश्रितों के इलाज के लिए संचालित एक्स-सर्विसमैन कंट्रीब्यूटरी हेल्थ स्कीम (ECHS) में कथित बड़े फर्जीवाड़े की जांच कर रही केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को कई चौंकाने वाले तथ्य मिले हैं। जांच एजेंसी के मुताबिक, इस मामले में फर्जी मेडिकल रिकॉर्ड और कथित तौर पर बढ़ा-चढ़ाकर तैयार किए गए बिलों के जरिए सरकार से मेडिकल रिइंबर्समेंट हासिल किया गया। शुरुआती जांच में घोटाले की रकम 100 करोड़ रुपये से अधिक होने का अनुमान सामने आया है।
जांच में आरोप है कि मरीजों को ऐसी परिस्थितियों में अस्पताल में भर्ती दिखाया गया, जब वास्तव में उन्हें भर्ती कराने की जरूरत नहीं थी। कुछ मामलों में एक ही मरीज को अलग-अलग तारीखों में अलग-अलग अस्पतालों में भर्ती दिखाए जाने की जानकारी मिली है। इसके अलावा फर्जी टेस्ट रिपोर्ट, मेडिकल दस्तावेज और दवाओं के बढ़े हुए बिल तैयार कर ECHS के तहत भुगतान के लिए क्लेम पेश किए जाने का आरोप है।
CBI ने इस मामले में मंथन हेल्थकेयर, धर्म अस्पताल, केयर पार्टनर हार्ट सेंटर और दो बिल क्लर्क सहित आठ आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। जांच एजेंसी अब मामले की चार्जशीट तैयार करने की प्रक्रिया में है। जांच के दौरान मंथन हेल्थकेयर के निदेशक डॉ. विकास शर्मा और डॉ. रिंपल गुप्ता की भूमिका को भी कथित फर्जीवाड़े के प्रमुख सूत्रधार के तौर पर जांचा गया है।
जांच एजेंसी के अनुसार, सेक्टर-38 स्थित मंथन हेल्थकेयर खुद ECHS के पैनल में शामिल नहीं था। आरोप है कि इसके बावजूद दूसरे अस्पतालों के साथ कथित मिलीभगत कर मरीजों से जुड़े रिकॉर्ड तैयार कराए गए और उन्हीं दस्तावेजों के आधार पर ECHS से मेडिकल रिइंबर्समेंट हासिल किया गया। जांच में सेक्टर-15 स्थित धर्म अस्पताल और सेक्टर-19 स्थित केयर पार्टनर हार्ट सेंटर के ECHS डेस्क की भूमिका भी जांच के दायरे में है।
इमरजेंसी एडमिशन से रेफरल तक कथित खेल
CBI को जांच के दौरान ऐसे संकेत मिले हैं, जिनसे एक संगठित नेटवर्क के काम करने की आशंका पैदा हुई है। आरोप है कि मरीजों को पहले इमरजेंसी में भर्ती दिखाया जाता था। इसके बाद उनकी स्थिति के आधार पर रेफरल किए जाने का रिकॉर्ड तैयार किया जाता और दूसरे अस्पताल में इलाज दिखाया जाता था। इसी प्रक्रिया के दौरान मेडिकल जांच, डायग्नोस्टिक रिपोर्ट और दवाओं के बिल तैयार कर ECHS के तहत भुगतान का दावा किया जाता था।
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इस तरह के मामलों में कागजी रिकॉर्ड की विश्वसनीयता और डिजिटल सिस्टम में दर्ज जानकारी का मिलान जांच का अहम हिस्सा बन गया है। प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के मुताबिक, डिजिटल हेल्थ रिकॉर्ड और बिलिंग डेटा में मौजूद पैटर्न किसी संगठित धोखाधड़ी की पहचान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उनके अनुसार, जब एक ही व्यक्ति की भर्ती, जांच, दवा और भुगतान से जुड़ी प्रविष्टियां अलग-अलग संस्थानों में असामान्य तरीके से दोहराई जाती हैं, तो डेटा मिलान के जरिए पूरे नेटवर्क की कड़ियों तक पहुंचा जा सकता है।
एक ही मरीज के नाम पर कई जगह भर्ती
जांच में हेमादेवी, बलदेव राम, टेक चंद और संध्या देवी सहित कुछ मरीजों के रिकॉर्ड सामने आए हैं। इन मरीजों को अलग-अलग अस्पतालों में कई बार भर्ती दिखाए जाने की जानकारी मिली है। अब CBI संबंधित तारीखों और अस्पताल रिकॉर्ड का मिलान कर यह पता लगाने में जुटी है कि मरीज वास्तव में वहां भर्ती हुए थे या उनके नाम का इस्तेमाल केवल क्लेम हासिल करने के लिए किया गया।
जांच एजेंसी को मंथन हेल्थकेयर और धर्म अस्पताल के बीच एक कथित एग्रीमेंट भी मिला है। दस्तावेज पर हस्ताक्षर नहीं होने के बावजूद इसमें कथित फर्जी क्लेम से हासिल रकम को बराबर हिस्सों में बांटने का उल्लेख होने की बात सामने आई है। CBI अब इस दस्तावेज की प्रामाणिकता, संभावित लेनदेन और संबंधित लोगों की भूमिका की पुष्टि कर रही है।
मामले में आगे की जांच से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि कथित फर्जी क्लेम का वास्तविक दायरा कितना बड़ा था और इसमें कौन-कौन से अस्पताल, कर्मचारी तथा अन्य लोग शामिल थे। चार्जशीट दाखिल होने के बाद जांच एजेंसी के आरोपों और जुटाए गए साक्ष्यों की तस्वीर और स्पष्ट होगी।
